जॉन अब्राहम ने फ़िल्म 'परमाणु' क्यों बनाई

  • सुप्रिया सोगले
  • मुंबई से, बीबीसी हिंदी के लिए
जॉन अब्राहम

नब्बे का दशक. शक्तिशाली देश उसे माना जाता था जिसके पास परमाणु हथियार होते थे.

अमरीका इस समय तक हज़ार से ज़्यादा परमाणु परीक्षण कर चुका था. उसी के नक्शे कदम पर चीन भी 43 टेस्ट कर चुका था.

परमाणु शक्ति संपन्न देशों की दौड़ में शामिल होने के लिए भारत 1998 में गुप्त तरीके से पोखरण में परमाणु परीक्षण करता है और खुद को उस कतार में शामिल कर लेता है.

इस सच्ची घटना पर आधारित फ़िल्म 'परमाणु' शुक्रवार को देश के सिनेमाघरों में रिलीज हुई. फ़िल्म में मुख्य भूमिका में हैं जॉन अब्राहम.

जॉन के लिए यह फ़िल्म करना आसान नहीं था. पहले भी वो 'काबूल एक्स्प्रेस' और 'मद्रास कैफ़े' जैसी फ़िल्में कर चुके हैं पर 'परमाणु' को लेकर वो थोड़ा नर्वस थे.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा कि बतौर अभिनेता-निर्माता उनका लक्ष्य है कि वो अच्छी फ़िल्में करें और दर्शकों के बीच बेहतर कहानियां प्रस्तुत करे.

उन्होंने कहा, "फ़िल्म संजीदा विषय पर है और मैं नहीं चाहता कि कोई बाहरी इसकी आलोचना करे. यह फ़िल्म पाकिस्तान, चीन या अमरीका विरोधी नहीं है. फ़िल्म भारत के उस गौरवांवित करने वाले पल का बखान करती है."

जॉन कहते हैं कि वो इस फ़िल्म के हर सीन के लिए उत्साहित थे. उन्होंने कहा, "मुझे अपने आर्ट फॉर्म से बहुत प्यार है. बतौर अभिनेता मैं 15 सालों में परिपक्व हुआ हूं. 'परमाणु' बेहतर हो, इसके लिए मैं हर सीन के लिए उत्साहित रहता था."

हीरो र्दी से नहीं इरादे से बनते हैं

विक्की डोनर जैसी फ़िल्मे बना चुके जॉन अब संजीदा फ़िल्में करना चाहते हैं. उनका मानना है कि कॉमेडी के अलावा कोई भी फ़िल्म अब गैरसंजीदगा नहीं होंगी.

फ़िल्म का एक डायलॉग है- "हीरो वर्दी से नहीं इरादे से बनते हैं." जॉन जिस किरदार में हैं वो वैज्ञानिकों और सैनिकों के साथ गुप्त तरीके से परमाणु परीक्षण करता है और अपने इरादे से देश को न्यूक्लियर स्टेट का दर्जा दिलाता है.

परमाणु हथियारों की दौड़ में भारत उस समय काफी पीछे था. अमरीका अपने सैटेलाइट के ज़रिए अन्य देशों पर नज़र रख रहा था. भारत भी उसके सर्विलांस पर था.

फ़िल्म में डायना पेंटी और बोमन ईरानी भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं. अभिनय से पहले वो मॉडलिंग किया करते थे.

जॉन कहते हैं, "यहां तक का सफर आसान नहीं था. मॉडलिंग जगत से कई मॉडलों ने एक्टिंग में हाथ आजमाए थे. अधिकांश सफल नहीं हो पाएं, जिससे यह धारणा बन गई कि मॉडल एक्टिगं नहीं कर सकते हैं."

आज एक्टिंग जॉन अब्राहम के लिए जीने का ज़रिया बन गया है. वो कहते हैं कि अगर वो एक्टिंग करना छोड़ देंगे तो वो एक मरे व्यक्ति की तरह हो जाएंगे.

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