लस्ट स्टोरीज़ः वासना में संवेदनशीलता तलाशती कहानियां

  • 24 जून 2018
करण जौहर, ज़ोया अख़्तर, अनुराग कश्य इमेज कॉपीरइट Getty Images

सिनेमा की दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है और सिनेमा देखने के तरीके भी. साल 2013 में भारतीय सिनेमा की 100वीं सालगिरह पर चार फ़िल्मकार साथ आए थे.

उन्होंने मिलकर 'बॉम्बे टॉकीज़' नामक फ़िल्म बनाई थी जो हमारे सिनेमा को ट्रिब्यूट देने के बहाने भारतीय समाज की कई उजली स्याह परतें उघाड़ती थी. चारों कहानियों में उनका कॉमन कनेक्शन सिनेमाई दुनिया से था या कहें भारतीय समाज की सिनेमा को लेकर दीवानगी से उनका किसी किस्म का जुड़ाव था. वे नॉस्टैल्जिया पर जीती फ़िल्में थीं. कहीं कड़वाहट, कहीं भदेसपन भी. लेकिन छूट रहे को बचाने की कोशिश भी दिखती थी.

पाँच साल बाद वही चार फ़िल्मकार फिर साथ हैं. एक सिनेमा की दुनिया का चिर विद्रोही, दूसरी पुरुषों की इस दुनिया में खड़ी मुखर स्त्री, तीसरा आत्मालोचक वाम और चौथा इंडस्ट्री का प्रिय इनसाइडर. लेकिन इस बार कहानी के भीतर और बाहर उनके सिनेमा से सिनेमा और सिनेमाघर दोनों ग़ायब हैं.

बदला ये है कि बीते सालों में अमेज़न और नेटफ़्लिक्स जैसी बड़ी अमेरिकन स्ट्रीमिंग सर्विसेज़ ने भारतीय सिनेमा के बाज़ार में पैर पसार लिए हैं. फ़िक्की की सालाना रिपोर्ट के अनुसार सस्ते डेटा प्लान और हाथ-हाथ में स्मार्टफ़ोन के रथ पर सवार होकर भारत 2020 तक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डिज़िटल कंज्यूमर बाज़ार बनने जा रहा है.

सिनेमा देखने का अनुभव सिरे से बदल रहा है. उसके पीछे का सामुदायिक भाव छूट रहा है. सिनेमा हमारे लैपटॉप और स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पर सिमट रहा है. पॉज़ का बटन सिनेमाई बारीकियों के प्रति चेतना भी लेकर आ रहा है और कथा को अधूरा छोड़कर फिर कभी नहीं लौटे दर्शकों का ज़खीरा भी. यहाँ धैर्य भी है, बेचैनी भी.

अनुराग कश्यप, ज़ोया अख़्तर, दिबाकर बनर्जी और करण जौहर की फ़िल्म 'लस्ट स्टोरीज़' इस हफ़्ते नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हुई. इसमें वासना की उपस्थिति किसी बाई-प्रोडक्ट से ज़्यादा नहीं. मूलत: यह रिश्तों में अकेलेपन की कहानियाँ हैं और उस पावर गेम की जो वासना से प्रेम तक और फिर वापस वासना तक इन कहानियों में लगातार खेला जा रहा है.

'रोल रिवर्सल और नॉस्टैल्जिया'

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Image caption संजय कपूर और भूमि पेडनेकर ने 'लस्ट स्टोरीज़' में अभिनय किया है

अनुराग कश्यप की फ़िल्म जिस सिनेमाई नॉस्टैल्जिक मोड पर शुरू होती है, फ़ौरन इस चौकड़ी की पिछली फ़िल्म 'बॉम्बे टॉकीज़' याद आती है. और उससे भी ज़्यादा याद आती है बहुत साल पहले अनुराग की ही 'मुम्बई कटिंग' के लिए बनाई शॉर्ट फ़िल्म 'प्रमोद भाई 23', शायद अनुराग की बनाई सबसे चमत्कारपूर्ण फ़िल्म.

फ़िल्म हमारे समाज में स्त्री-पुरुष संबंध की मौलिक ग़ैर-बराबरी को उम्र तथा टीचर-स्टूडेंट का उल्टा कॉम्बिनेशन बीच में डालकर डांवाडोल कर देती है. टीचर कालिन्दी यहाँ प्रेम में भी, वासना में भी अपनी 'सिखाने की भूमिका' नहीं छोड़ पाती. प्रेमी की शेल्फ़ में रखी किताबें देखकर उसे जज करती है. जलन भी है, असुरक्षा भी, लेकिन बार-बार कहती है कि 'देख, तू कहीं मेरे प्यार में मत पड़ जाना!' पर अन्त में इस कहानी को सिर्फ़ 'रोल-रिवर्सल' के प्रयोग तक सिमटते देख थोड़ी निराशा होती है.

पर इस फ़िल्म का सबसे संभावनाशील हिस्सा इसका सबसे नॉन-सिनेमैटिक अंश है, जहाँ नायिका कालिन्दी सीधे कैमरे से वन-टू-वन बातें कर रही है. प्रेम की उलझी परिभाषाओं पर की जा रही इन तमाम बातों में 'फ़ाउंटेनहेड' जैसी कल्ट फ़ॉलोविंग वाले उपन्यास की लेखिका आयन रैंड से लेकर अमृता और इमरोज़ तक के किस्से हैं. इन्हीं किस्सों में और एक अनदेखा किरदार है 'मिहिर', जो व्यक्ति कम विचार ज़्यादा नज़र आता है.

'क्या है' के बदले 'कैसा होना चाहिए' के सीमान्त पर खड़ा. राधिका आप्टे ने इन अंशों को जिस स्वाभाविकता से निभाया है, वो कमाल है. फ़िल्म उन्हें पटकथा-संवाद में भी सह-क्रेडिट देती है, और संभव है कि इसमें से कुछ सेल्फ़ इंप्रोवाइज़ेशन भी हो. लेकिन इस मोनोलॉग में कश्यप कल्ट के फ़ॉलोवर भी अपना हिस्सा भरपूर पाएंगे. यह इस अलबत्ता क्लिशे-सी लगती कहानी का सबसे मज़ेदार अंश है.

'मुक्ति अकेले नहीं मिला करती'

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इस कहानी के केन्द्र में एक महानगर का वन बीएचके घर है. यही पूरी कहानी का घटनास्थल है और कहानी इस घर से अन्तिम दृश्य में ही बाहर निकलती है. अगर इस घर को खेतिहर ज़मीन मान लिया जाए तो घरेलू नौकरानी सुधा इस खेत को जोतनेवाली अकेली किसान है. लेकिन वो भूमिहीन मज़दूर है और हमेशा की तरह ज़मीन के मालिक यहाँ भी कोई और हैं. ज़मीन पर उनका हक़ है. फ़सल पर उनका हक़ है. पर यह खेतिहर मज़दूर फिर भी 'ज़मीन किसकी, जोते जिसकी' का सपना देखता है.

ज़ोया अख़्तर की फ़िल्म इस इमारत का सबसे मज़बूत स्तंभ है. जिस मितव्ययी सिनेमाई भाषा के चमत्कार के साथ वो कथानायिका 'सुधा' (भूमि पेडनेकर) के जीवन के 'रोज़ानापन' को उभारती हैं, वो ख़ास है. फ़िल्म की कहानी मुम्बई के वन बीएचके घर के छोटे से नक्शे में रसोई, ड्राइंगरूम और बेडरूम के बीचों-बीच है. लेकिन फ़िल्म के एक भी दृश्य में आपको घर के दोनों मर्द इस इलाके में नज़र नहीं आएंगे. वैसे भी, जिस घर के मर्द अपनी अंडरवियर भी ख़ुद ना धोते हों, उन्हें किचन में देखने की कामना तो अति ही कही जाएगी. पिता नौकरीपेशा लड़के के लिए गौरवभरे उलाहने में कहते हैं, "पेंटिंग क्या लगवाएगा. घर पेंट करवा लिया वो क्या कम है."

यह भी दरअसल एक किस्म की 'स्पेस' की ही लड़ाई है. यह फ़िल्म एक ऐसे फ़िल्मकार की निशानी है, जिसे अपने कथ्य पर और उसे कहने के तरीक़े पर अब पूरा भरोसा होने लगा है. उनकी पहली फ़िल्म 'लक बाय चांस' मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा फॉर्मेट में सबसे रोमांचकारी हस्तक्षेप थी, लेकिन उसकी व्यावसायिक असफ़लता ने उन्हें अगली फ़िल्मों में लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा की अवश्यंभावी मजबूरियों की और धकेला. यहाँ सुधा वो माइक्रोस्कोप है जिसकी मर्मभेदी नज़रों से हम ख़ुद को, अपनी 'अच्छाइयों' के पीछे छिपी असल आइरनी को देख रहे हैं.

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इस आत्मविश्वास से भरी फ़िल्म की लेखक भी एक लड़की ही है, रुचिका ओबेरॉय. यहाँ 'मौका भी है दस्तूर भी' की परम्परा निभाते हुए मैं आपसे उनकी निर्देशकीय डेब्यू फ़िल्म 'आइलैंड सिटी' देखने की भी सिफ़ारिश करूँगा, जो बीते साल रिलीज़ हुई थी और जिसे बहुत कम लोगों ने देखा. वो भी 'लस्ट स्टोरीज़' की तरह तीन भिन्न कथाओं का संगम थी और मुझे नेटफ़्लिक्स के ही मशहूर प्रयोगात्मक शो 'ब्लैक मिरर' की याद दिलाती थी.

वासना की भरभराकर गिरती दीवारों के बीच क्लास, कास्ट और जेंडर आज भी हमारे मध्यवर्गीय समाज की ऐसी सच्चाइयाँ हैं जो किसी भी 'डिजिटल क्रांति' से नहीं टूटतीं. पर सबसे दिलचस्प इनमें यह देखना है कि जहां तीन पुरुष फ़िल्मकार कामना के इस पावरगेम की कहानियां जेंडर के एंगल से सुना रहे हैं, चौकड़ी में अकेली स्त्री निर्देशक अपनी कहानी में क्लास (पढ़ना चाहें तो कास्ट का भी) का एंगल लेकर आती है. स्त्री आन्दोलन की इस अनुभवजन्य सच्चाई पर उंगली रखती है कि भारत में जेंडर की लड़ाइयाँ निर्वात में नहीं लड़ी जातीं. जैसे इशारे से बताती है कि 'मुक्ति अकेले नहीं मिला करती' कभी.

'सोनू और टीटू की मिड-लाइफ़ क्राइसिस'

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अगर मैं कहूँ कि मुझे दिबाकर की अनकही बारीकियों से भरी त्रिकोणीय प्रेम-कहानी देखते हुए साल की सुपरहिट और सबसे 'इन योर फ़ेस' भद्दी फ़िल्म के किरदार सोनू और टीटू बहुत याद आए, तो क्या इसे ब्लासफ़ेमी माना जाएगा? अनजाने में ही पंजाबी 'ब्रो-कोड' की उस प्रदर्शनकारी फ़िल्म ने उत्तर भारतीय मर्द की वो प्रामाणिक तस्वीर हमारे सामने रख दी थी जो दोस्ती बचाने के लिए भले दुनिया से लड़ जाएगा, लेकिन लड़की भी दोस्त हो सकती है जैसी कोई ट्रेनिंग उसे दी ही नहीं गई है. और चाहे ये तुलना एक्सट्रीम लगे, लेकिन दिबाकर के सुधीर और सलमान दरअसल, मिड-लाइफ़ क्राइसिस पर खड़े सोनू और टीटू ही हैं.

लेकिन यह फ़िल्म उनके बारे में नहीं, 'स्वीटी' के बारे में है. रीना, जिसकी उम्दा भूमिका यहाँ मनीषा कोइराला ने निभाई है.

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यह रीना का सफ़र है जिसकी शुरुआत अपने ही पति को धोख़ा देने से उपजे गिल्ट से होती है. पति, जिसे पत्नी का पिता भी होना है और जिसे पत्नी में माँ भी चाहिए. पति, जिसे इस बात की फ़िक्र है कि वो अपनी सबसे अच्छी दोस्ती कैसे बचाएगा. लेकिन पत्नी में जो दोस्त था, वो उसने कब खो दिया उसे ज़रा भी पता नहीं. दिबाकर की फ़िल्म कहीं फ्लैशबैक में नहीं जाती. शायद शॉर्ट फ़ॉर्मेट इसकी इजाज़त नहीं देता. या शायद यह एक चयन है जिससे दर्शक अपने हिस्से की पूर्व-कथा ख़ुद रच पाए. लेकिन इस कहानी का मोटिफ़ शायद उसी यंग-कॉलेज की पूर्वकथा में छिपा है. इस फ़िल्म का अन्त व्याख्याओं के लिए खुला है. लेकिन मुझे विश्वास है कि रीना की नज़र से प्रेमी में दिखता पति का अक्स ओझल नहीं हुआ होगा. वो इस 'जय-वीरू' की दोस्ती से हाथ झाड़कर एक दिन ज़रूर आगे बढ़ जाएगी. या शायद बढ़ चुकी है. एक शांत दिन.

'इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ'

रीना और सुधा की कहानी में शुरुआत से अन्त तक कई समान्तर रेखाएं हैं. दोनों कहानी की शुरुआत में एक नितान्त ग़ैर-बराबर रिश्ते में उलझी हैं. दोनों आकांक्षाओं से भरी हैं. गिल्ट है, रीना में कहीं ज़्यादा जो शायद उसकी क्लास और विवाह संस्था के भीतर होने से उपजा है. सुधा इस गिल्ट से कुछ आज़ाद है, शायद अपनी वर्गीय पहचान के चलते, लेकिन उसने एक ऐसे घर की चारदीवारी के भीतर के 'रोज़मर्रा' से ख़ुद को बांध लिया है जो क़तई उसका नहीं. लेकिन वो मन में कहीं चाहती है कि उसका हो. और फिर दोनों की कहानी में अचानक एक क्षण ऐसा आता है जहाँ वो इस स्वनिर्मित बंधन से, या कहें धोखे से आज़ाद हो जाती हैं.

रीना की कहानी में वो क्षण अपने पति से फ़ोन पर 'ब्रांच मैनेजर, एमजी रोड' सुनना है. अपनी वो पहचान जो किसी अन्य की 'ट्रॉफ़ी' बनने के चक्कर में खो गई. और सुधा के लिए यह क्षण कहानी के अन्त में लिफ़्ट के बाहर पड़ोस की नौकरानी से एक औचक मुलाकात लेकर आती है. दो पल की भूमिका में यहाँ रसिका दुग्गल ने चमत्कार किया है. यही पहला सीन है जहाँ कहानी उस घर के बाहर निकली है.

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गोटे वाली कढ़ाइयों के बीच रफ़ू सी ज़िन्दगी और अचानक सुधा यथार्थ में लौट आती है. या शायद पहली बार उस 'सभ्यता की दहलीज़' के उस तरफ़ मौजूद घर का असल यथार्थ समझ जाती है. उस तरह के तमाम घरों का और उनमें रहनेवालों का. जैसा कवि वीरेन डंगवाल अपनी 'पी टी ऊषा' शीर्षक कविता में लिखते हैं,

"खाते हुए

मुँह से चपचप की आवाज़ होती है?

कोई ग़म नहीं

वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता

दुनिया के

सबसे ख़तरनाक खाऊ लोग हैं."

अन्तिम दृश्य में सुधा को लिए लिफ़्ट वापस नीचे जा रही है. लेकिन सुधा संतुष्ट है. उसने यथार्थ रूपी मिठाई खाने से जो इनकार किया था, उस इनकार को वापस ले लिया है. मुझे 'धोबी घाट' का मुन्ना याद आता है. एक और स्त्री निर्देशक का रचा किरदार. और याद आती है उसकी मुस्कान. अन्तिम दृश्य में शाय की लग्ज़री कार के पीछे दौड़कर अरुण के पते की चिट उसे पकड़ाने के बाद की मुस्कान. सुधा के चेहरे पर भी वही मुस्कान है.

'अब रिमोट अपने हाथ में लेना होगा'

निर्देशक करण जौहर के हिस्से इस गुलदस्ते की सबसे प्रदर्शनकारी और सबसे मेनस्ट्रीम फ़िल्म आई है. अपनी शॉक वैल्यू में सुमित सक्सेना की लिखी यह शॉर्ट फ़िल्म फ़ॉर्मेट को लेकर सबसे ईमानदार है और सिनेमाई स्तर पर सबसे क्लिशे और सामान्य.

इसी कहानी में पूरी फ़िल्म का सबसे चर्चित दृश्य भी है. पर मेरे लिए जौहर की फ़िल्म का चमत्कार उस पल में नहीं है जिसकी सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है क्योंकि वहां भी, वास्तविक और प्रतीकात्मक दोनों रूपों में अन्ततः 'रिमोट' किसी और के हाथ में है. वैसे भी 'स्त्री अपनी ज़रूरत नहीं जानती' - यह शुद्ध पुरुषों की ग़लतफ़हमी है. दरअसल नई शुरुआत उस अन्तिम दृश्य में है जहाँ पुरुष उसे पहले 'आइसक्रीम' खिलाने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है. 'साथ' में क्या ख़ास है, यह समझने की ओर पहला कदम बढ़ाता है, क्योंकि अब समझना उसे है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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