SACRED GAMES: धर्म के राक्षसों की लपलपाती जीभ का कल्याण हो या नाश?

  • 8 जुलाई 2018
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''अतापि और वतापि दो दैत्य थे. अतापि किसी भी राहगीर को बड़े प्रेम से अपने घर बुलाता, 'आप आइए मेरे घर. शायद आपको भूख लगी है. मैं स्वादिष्ट भोजन ग्रहण कराऊंगा.'

राहगीर ख़ुशी-ख़ुशी आ जाते और इतने में इधर वतापि अपनी मायावी, राक्षसी शक्तियों का प्रयोग करके बकरे का रूप धारण कर लेता. अतिथि उस स्वादिष्ट बकरे का भोजन करके प्रसन्नचित हो जाते. और इतने में अतापि आवाज़ लगाता- वतापि, वतापि बाहर आओ.

और अचानक अतिथि का पेट फटता और एक मांस का लोथड़ा बाहर आ जाता और राहगीर परलोक. फिर दोनों भाई खुशी के मारे नाच उठते, झूम उठते. धर्मों का रूप यही है. राहगीर को प्रेम से घर बुलाओ. आदर समेत भोजन ग्रहण कराओ. फिर उसकी आत्मा पर कब्ज़ा कर लो.

यहूदी, मुसलमान. ईसाई मुसलमान.हिंदू मुसलमान. सब अतापि वतापि हैं.''

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'सेक्रेड गेम्स' यानी पवित्र खेल का ये एक ऐसा किस्सा है, जो लंबे वक्त तक आज और कल के भारत को बयां कर सकता है.

ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म 'नेटफ्लिक्स' की पहली ओरिजिनल भारतीय सिरीज़ 'सेक्रेड गेम्स' लेखक विक्रम चंद्रा के नॉवल पर आधारित है.

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नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, सैफ अली ख़ान, राधिका आप्टे, पकंज त्रिपाठी, वरुण ग्रोवर, अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवानी और भी कई ज़रूरी नाम.

ये लोग एक जगह जुटते हैं और 'नागिन का बदला', 'सास बहू के तमाचों' के रिकेप और पुराने उधारों को चुकाने की एवज में बनने वाली बायोपिक के दौर में 'सेक्रेड गेम्स' के आठ एपिसोड लाते हैं.

ऐसे वक्त में, जब चुनावी मंचों, गुटखा-पान के ठीहों, अफ़वाहों से उबलते, हाथ में कुल्हाड़ी लिए भीड़ इन तमाम बहसों के निचोड़ में धर्म को बसाए आगे बढ़ी जा रही है. अपने-अपने धर्म के सबसे पवित्र होने का ऐलान करते हुए.

ऐसे माहौल में अक्सर पर्दे पर क्रूरता को दिखाने वाले और देश में चल रहे मुद्दों पर मुंहफट रहे अनुराग कश्यप 'सेक्रेड गेम्स' बनाने का फ़ैसला चौंकाता नहीं है.

मॉब लिंचिंग, राम मंदिर, नसबंदी, कांग्रेस के 70 साल वाले बयान, इमरजेंसी, गाय, खाने की टेबल पर गौमांस, मुसलमान, हिंदू और इन सबके साथ बंबइया चकाचौंध, सेक्रेड गेम्स इन सब पर बात करती है.

'84 में कहां थे?'

'इमरजेंसी के वक्त कहां थे?'

'बोफोर्स पर क्यों नहीं बोले'

'शाह बानो क्यों भूले?'

इस पर बोले और उस पर क्यों नहीं बोले? ऐसे सवालों से आज की तारीख़ में कोई बच सकता है तो वो 'सेक्रेड गेम्स' है. इस सिरीज ने इमरजेंसी के बाद से लेकर हाल के दिनों पर आपके खाने की टेबल पर घूरती आंखों सब पर कैमरे से आंखें तरेरी हैं. मंडल पर भी और राम मंदिर की ओर बढ़ते विशाल विराट रथों की तरफ भी.

वो रथ, जिनके सारथी अब उसी मार्ग के दर्शक बन गए हैं, जिसकी मंज़िल तक पहुंचने के लिए लपलपाती जीभ ने तालू से तालमेल कर हुंकार लगाई थी- मंदिर वहीं बनाएंगे.

पुलिस इंस्पेक्टर सरताज सिंह (सैफ़), बंबई का हिंदू माफिया गणेश गाएतोंडे (नवाज़) इस सिरीज़ के दो मुख्य किरदार हैं.

दोनों को बंबई से मुहब्बत है. लेकिन गणेश गाएतोंडे की मुहब्बत में वो 'लव बाइट्स' भी शामिल हैं, जिनके निशान माशूका की गर्दन पर रह जाते हैं. गणेश बंबई को कुछ खरोंचे देता है. लेकिन मुहब्बत सब कुछ ख़त्म नहीं करती है. बचने की गुंजाइशें छोड़ देती है.

गणेश सरताज को 25 दिन देता है और कहता है कि 'बचा ले अपने शहर को.'

'सेक्रेड गेम्स' सिरीज़ का पहला सीज़न इन्हीं 25 में से 13 दिनों की कहानी है.

मारकाट, सेक्स, गालियों से भरपूर हमारा समाज, जहां एक हिजड़े की सिर्फ दो ही पहचान हैं. एक वो बच्चा पैदा होने पर ताली बजाकर पैसे ले जाएंगे. दूसरा वो उपभोग के लिए भी हो सकते हैं- इन सबको 'सेक्रेड गेम्स' ने जगह दी है. ये जगह ठीक वैसे ही है, जैसी आप और हम दफ्तरों, स्कूलों, रास्तों और परिवारों में देखते हैं.

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बर्दाश्त नहीं होता है न हमारे समाज को, एक लड़की का फ़ील्ड में होना. जहां लड़कियों को बता दिया जाता है, 'डेस्क तुम्हारा है और फ़ील्ड हमारा.'

'मैं सोसाइटी को चोली नहीं पहना सकता, जो है ही नंगी.' मंटो की लिखी ये लाइन 'सेक्रेड गेम्स' की मूल भावना लगती है. सब कुछ साफ़ दिखता है.

लेकिन ये कहानी इतनी मल्टीलेयर और कई किरदारों से भरी है कि अगर आप चाहें तो पूरा भारत दिख सकता है. ख़ासतौर पर अभी का भारत, जो एक मुल्क कम 'राष्ट्र' ज़्यादा है.

'सब अपना किस्सा लेकर आए हैं. अपुन का काम है, उसको जोड़ना.'

गणेश गाएतोंडे के इस डायलॉग की मदद से 'सेक्रेड गेम्स' और मौजूदा समाज की कुछ झलकियां मिलती हैं. जिसमें कई किस्से हैं, 'अपुन' बस सेक्रेड गेम्स से चुनकर कुछ किस्सों, किरदारों को जोड़ने की कोशिश कर रहा है.

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1. धर्म

'धर्म क्या है. मां है कि बाप?'

आपके लिए अब धर्म की क्या परिभाषा है? क्या ये बीते कुछ वक्त में बदली है? आसपास के माहौल को देखकर बोलेंगे-तो शायद आपका जवाब हां होगा. 'सेक्रेड गेम्स' में भी धर्म की परिभाषा बदलती है. जब गणेश गाएतोंडे का कोई ख़ास मार दिया जाता है. इस मौत का बदला किसी इंसान से नहीं, एक धर्म से लिया जाता है.

बाबरी मस्जिद, गुजरात, मुज़फ्फरनगर, पश्चिम बंगाल और बिहार के दंगे. मारे चाहे हिंदू जाएं या मुस्लिम. झंडा बुलंद धर्म का रहता है. इंसान मर रहे हैं, इस पर बहुत बाद में बात होती है. या शायद नहीं ही होती है.

'दुनिया के बाजार में सबसे बड़ा धंधा है- धर्म.' स्कूल की दीवार पर पेंट से पुती लाइन याद आती है- कर्म ही धर्म है. लेकिन अब हमारे समाज में कर्म भी बंटा हुआ है. जाति, रंग, लिंग, अमीर, गरीब के आधार पर.

ग़रीब डिस्को क्लब नहीं जाते. वो धारधार तलवार, छुरियों और रंगों से खेलते हुए सड़क पर मातम मनाते या नाचते हैं. ये धर्म ही तो है, जो सड़क को डिस्को बना देता है.

पूंजीवाद और समाजवाद की बोरिंग परिभाषाएं एक झटके में मिट जाती हैं. 'सेक्रेड गेम्स' की सुभद्रा भी यही समझाती है, धर्म आज़ादी देता है.

अब इस आज़ादी का इस्तेमाल कैसे करना है, ये आने वाला वक्त नहीं बताएगा. अभी जो चल रहा है, या जो हो चुका है वो इसके साक्षात प्रमाण दे चुका है. बस आंख की बजाय नज़र का इस्तेमाल कीजिए.

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2. जालीदार सफ़ेद टोपी

हवा में लहराती तेज़ी से मारी गई एक बोतल, सफेद टोपी को काटती हुआ माथा चीर देती है. आदमी मर जाता है और साथ ही खत्म हो जाती है वो सफेद टोपी.

'सेक्रेड गेम्स' का किरदार बन्टी मुसलमानों से चिढ़ता है. पर क्या बन्टी पर्दे के भीतर या बाहर का अकेला किरदार है? जवाब है नहीं.

जुनैद, अफराज़ुल, पहलू ख़ान, अख़लाक, कासिम की कब्रों पर उग आई खर-पतवार भी कहेगी- कतई नहीं. ये टोपी ही तो है, जिसे सिर पर लगाना, हाथ में पकड़ना भी नुकसान पहुंचा सकता है.

'सेक्रेड गेम्स' में एक सीन है, जहां फर्जी एनकाउंटर में मारे गए एक लड़के जुनैद के परिवार वाले इंसाफ़ की मांग कर रहे हैं, हाथों में पोस्टर और आंखों में थक चुकी उदासी लिए.

सरताज सिंह सच जानता है लेकिन वो कुछ बोलने की चाहत और मजबूरियों के बीच मजबूरी को चुनता है.

अब याद कीजिए, बीते कुछ वक्त में ऐसे कितने जालीदार टोपी वालों के परिवार वाले आपको इंसाफ़ की मांग करते दिखे होंगे.

'मेरा बेटा मोहम्मद... नहीं मिल रहा...' हमने ऐसी कई आंखों को देखा होगा और आगे बढ़ गए होंगे. उन आंखों ने हम में एक सिस्टम देखा होगा, जो 'वट्स न्यू' की चाहत दिल में रखता है.

इसी 'वट्स न्यू' की चाहत में गणेश गाएतोंडे एक रोज़ अपने हिंदू को जगाता है और सफेद टोपियों को मुंडी समेट काट डालता है.

एस हुसैन ज़ैदी ने अपनी किताब 'डोंगरी टू दुबई' में लिखा है, ''बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मुंबई से औरतों ने दाऊद को चूड़ियां भेजी थीं. क्योंकि उसने बाबरी गिराए जाने के बाद हुए दंगों में 'अपने लोगों के लिए' कुछ नहीं किया था.''

यही सफेद टोपी रही होगी, जो अचानक दाऊद इब्राहिम को महसूस हुई होगी और फिर बंबई दहली थी.

ये वही टोपी है, जो अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी चुनावी भाषणों में चुभी और उन हमलावरों को भी, जिन्होंने सीरिया में गुलाबी गालों वाले बच्चों पर कैमिकल छिड़क दिया.

पूरी दुनिया पर नज़र दौड़ाएं, तो केंद्र में कहीं न कहीं यही जालीदार टोपी है, जिसको छोटे-छोटे छेदों से धर्म का झंडा विराट नज़र आता है.

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3. औरत

कवि आलोकधन्वा की लिखी एक लाइन है- महज जन्म देना स्त्री होना नहीं है.

अंजलि माथुर (राधिका) रॉ एजेंट है. बलूचिस्तान से मिले इनपुट्स को दर्ज करती डेस्क पर बैठी एजेंट.

लेकिन फिर उसे मौका लगता है सीधा फ़ील्ड में उतरने का. सामने दो दुश्मन हैं. एक वो जो बंबई के ख़िलाफ़ कोई साजिश कर रहे हैं. दूसरे वो जो वहीं उसके दाएं बाएं हैं. जैसे हमारे दफ्तरों और घरों में होते हैं जो चाहते हैं कि औरतें कैसे वो काम करती है जो मर्द करते आए हैं.

फ़ील्ड से ऑफ फ़ील्ड भेजे जाने और अपने काम की गंभीरता से लिए जाने की कोशिश करती हुई अंजलि दोनों मोर्चों पर लड़ती है. घर से बाहर रहने की कोशिश करते हुए.

औरतों को घर पर रखने की सोच कुछ लोगों को कितनी पवित्र लगती होगी? इतिहास और अपने आसपास का सच उठाकर देख लीजिए- धर्म कोई सा भी हो, कुछ लोगों को औरतें घर पर...और घर के थोड़ा और अंदर बिस्तर पर अच्छी लगती हैं.

बंबई जैसी माया में एक लड़की अकेले कैसे हीरोइन बन सकती है. कोई गॉडफ़ादर तो होगा न? अब अगर ये गॉडफ़ादर माफ़िया है, तो ये नए शोषण को किए जाने की संभावनाओं को जन्म देता है.

'करने दे वरना सबको बता दूंगा' जैसी क्रूर संभावनाएं.

'सेक्रेड गेम्स' बॉलीवुड की वो सच्चाई भी समेटे है, जिसकी ख़ातिर कितने ही अखबारों, वेबसाइट के पन्ने और टीवी चैनलों के प्रोग्राम्स भरे पड़े हैं. जिनके आख़िर में हालात का मज़ाक उड़ाता और बिना किसी निष्कर्ष का एक वाक्य लिखा होता है- ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

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'अपुन आज़ाद हो गया है, अपने को नया धर्म मांगता है...'

4. ताक़त, सिस्टम और मुहब्बत

'ताक़त ऐसी चीज़ है साहेब कि आती है जो सारी आती है और जाती है तो सारी जाती है.'

इस एक सवाल से शायद आप गुज़रे होंगे कभी. कोई लड़का/ लड़की पसंद हो तो बताओ. लड़की या लड़के से प्यार करते हो तो बताओ?

यानी प्रेम सिर्फ लड़के या लड़की से हो सकता है? 'सेक्रेड गेम्स' जवाब देता है- नहीं, कतई नहीं. ये अनुराग कश्यप की ही बुद्धि हो सकती थी, जो किसी हिजड़े (किन्नर) से प्यार दिखा सकते थे. क्योंकि जब बात मुहब्बत की हो, तो नैतिक शिक्षा के क्यूटियापे में मिस्टक नहीं करनी चाहिए.

सिस्टम. 'सेक्रेड गेम्स' का एक प्रहार हमारे सिस्टम पर भी है. जहां सच बोलने की गुंजाइशें कम रहती हैं. कुछ सच जिन्हें कहने में ताक़त लगती है, उनके कहे जाने से ताक़तों के छिनने का भी खतरा होता है.

पुलिसवाला सरताज सिंह, जो ईमानदारी से बंबई में पहचान बनाना चाहता है. अंजलि माथुर. या वो पुलिसवाला, जिसके जीते जी ज़िंदगी छोटी सी खोली में कट गई लेकिन जब मरा तो खुले मैदान में बंदूकों की सलामी दी गई. बाप की लाश के सामने गोलियों की आवाज़ से चौंकते बच्चों को देखने पर पहली बार एहसास होता है, देशभक्ति चौंकाती भी है.

हम सब कहीं न कहीं से आकर बसे हुए लोग हैं यानी प्रवासी. गणेश गाएतोंडे भी बंबई पर राज करना चाहता है. ताकत चाहता है. फिर ये ताकत कूड़े के ढेर पर बैठकर मिले या भोंसले की तरह सत्ता की कुर्सी पर चढ़कर.

जनता दरबार से निकाली गई औरत. नेताओं से उड़ते हेलिकॉप्टर और नीचे आंख मीचते आम लोग. खाने के लिए चिल्लाते हुए मरती बच्ची और किसी रईस के बच्चे की शादी में ठुमकते नेता, अभिनेता. 'हेलो फ्रेंड्स चाय पी लो' कहती औरत का मज़ाक बनाते लोग.... सब ताक़त के फर्क को दिखाते हैं.

'बड़ा आदमी बनने का है तो हिम्मत दिखा.'

इन दिनों ये हिम्मत धर्म दे रहा है. जिसकी पवित्रता की मुहर कुछ ठेकेदारों ने ली हुई है. ऐसे ठेकेदारों को जवाब देने के लिए गणेश गाएतोंडे की एक लाइन को इस्तेमाल किया जा सकता है- 'अब अपुन आज़ाद हो गया है. अपने को नया धर्म मांगता है...'

बस इतना कहकर रुक जाइएगा. धर्म का नाम लिया तो पवित्रता वाले अपना अपना झंडा लेकर आ जाएंगे, आपकी हमारी आत्मा पर कब्ज़ा करने.

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