अनुराग कश्यप की फ़िल्मों की डायलॉगबाज़ी क्यों है ख़ास?

  • 15 सितंबर 2018
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क़रीब दो दशकों से हिंदी सिनेमा में बतौर निर्देशक, निर्माता और लेखक के तौर पर काम कर रहे अनुराग कश्यप ने फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई है. उनकी फ़िल्में वास्तविकता के क़रीब होती हैं.

जहां फ़िल्म 'ब्लैक फ़्राइडे' 1993 बॉम्बे बम ब्लास्ट की सच्ची कहानी पर आधारित थी तो वहीं 'देव डी' शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास देवदास का आधुनिक रूपांतरण था. इसी तरह जहां 'ग़ुलाल' छात्र राजनीति को दर्शाती है, वहीं 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' समाज में मौजूद विभिन्न अपराधों का फ़िल्मी रूपांतरण है.

'रमन राघव 2.0' असल सीरियल किलर से प्रेरित फ़िल्म थी तो 'सेक्रेड गेम्स' सिरीज़ विक्रम चंद्रा के उपन्यास का फ़िल्मांकन है.

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हिंदी फ़िल्मों में डायलॉगबाज़ी का लंबा चलन रहा है, लेकिन अनुराग कश्यप की फ़िल्मों में आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग ज़्यादा होता है. बावजूद इसके उनके कई डायलॉग दर्शकों को भा जाते हैं और उनकी ज़ुबां पर चढ़ जाते हैं.

इस हफ़्ते रिलीज़ हुई अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'मनमर्ज़ियां' आज के दौर की प्रेम कहानी है जिसकी पृष्ठभूमि पंजाब रखी गई है.

फ़िल्म के ट्रेलर में कई डायलॉग हैं जो लोगों को पसंद आ रहे हैं. जैसे, 'तू बंदा ना बड़ा सही है पर ज़िम्मेदारी के नाम पर ना ह** देता है', 'तू प्यार करने छतें टप के आ सकता है, तू घर नहीं आ सकता शादी की बात करने?'

हालांकि, फ़िल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग लेखिका कनिका ढिल्लों ने लिखे हैं और अनुराग कश्यप इस फ़िल्म से बतौर निर्देशक बाद में जुड़े.

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आम बोलचाल की भाषा में डायलॉग

कनिका कहती हैं, "फ़िल्म में जो भाषा है वो किरदारों से ही आई है. मेरा मक़सद था कि उनकी भाषा आम ही रखूं ताकि वो दर्शकों से जुड़ सके."

उन्होंने माना कि पंजाबी होने के कारण उस पृष्ठभूमि की कहानी उनके लिए आसान रही. फ़िल्म में 'फ़्यार' शब्द भी काफ़ी चर्चा में है जिसका श्रेय कनिका, अनुराग कश्यप को देती हैं.

वो कहती हैं, "फ़िल्म में दो प्रेमी जोड़े हैं जिसमें एक शारीरिक और एक भावुक तरीक़े से जुड़ा हुआ है. दोनों के प्रेम को एक शब्द में जोड़ने के लिए अनुराग ने 'फ़्यार' शब्द इजाद किया, जो गाने के ज़रिये फ़िल्म के डायलॉग का हिस्सा भी बन गया है."

अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' के डायलॉग बहुत मशहूर हुए थे. 'मारेंगे नहीं सा** को, कह के लेंगे', 'बेटा, तुमसे ना हो पायेगा', 'बाप का, दादा का, भाई का, सबका बदला लेगा तेरा फैजल', 'ये वासेपुर है, यहाँ कबूतर भी एक पंख से उड़ता है और दूसरे से अपनी इज़्जत बचाता है.'

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की कहानी ज़ीशान क़ादरी ने लिखी थी जिनका ताल्लुक वासेपुर से ही है. फ़िल्म के किरदार और उनके डायलॉग को दर्शकों ने बहुत पसंद किया. फ़िल्म में मनोज बाजपेई, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, पंकज त्रिपाठी, हुमा कुरैशी, ऋचा चड्ढा और कई बेहतरीन अभिनेताओं ने काम किया था.

वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज अनुराग कश्यप की फ़िल्मों की भाषा पर कहते हैं, "अनुराग हिंदी समाज से जुड़े हुए हैं. उनकी पढ़ाई भी हिंदी में हुई है. वो हिंदी की अच्छी जानकारी रखने वाले निर्देशक हैं, जो आजकल मुंबई के निर्देशकों में कम नज़र आता है."

"इसलिए उनकी फ़िल्मों में संवाद आम बोलचाल की भाषा में होते हैं. उनकी फ़िल्मों में डायलॉगबाज़ी या किताबी भाषा नहीं होती है."

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हिंदी भाषी अभिनेता

इस साल अनुराग कश्यप की सिरीज़ 'सेक्रेड गेम्स' भी आई, जिसे बहुत तारीफ़ें मिलीं और उसके कई डायलॉग मशहूर हुए.

'कुकू का जादू', 'कभी-कभी लगता है अपुन ही भगवान है', 'अपुन अश्वत्थामा है कभी नहीं मरेगा', 'अपुन को अंदर से आवाज़ आती थी की मुक्ति देदे इस हरामी को.' सेक्रेड गेम्स में बतौर लेखक थे वरुण ग्रोवर, जिन्हे फ़िल्मों में गीत लिखने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है.

2009 में आई फ़िल्म 'देव डी' ने अनुराग कश्यप के लिए हिंदी सिनेमा में निर्देशन के दरवाज़े खोले थे. फ़िल्म का डायलॉग 'कई चीज़ें इतनी अच्छी लगने लगती हैं कि बाकी सब बुरी लगने लगती हैं', 'दिल्ली में बिल्ली मारलो, खालो, पालो नहीं, बहुत महंगा पड़ता है' मशहूर हुआ.

फ़िल्म का गाना 'इमोशनल अत्याचार' भी काफ़ी पसंद किया गया था.

फ़िल्म संगीतकार अमित त्रिवेदी कहते हैं, "बतौर फ़िल्म संगीतकार देव डी मेरी पहली फ़िल्म थी. अनुराग कश्यप एक ऐसे निर्देशक हैं जो आपको पूरी आज़ादी देते हैं. देव डी में 'इमोशनल अत्याचार' और मनमर्ज़ियाँ में 'फ़्यार' जैसे शब्द उन्हीं की देन हैं."

2016 में अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'रमन राघव' आई थी जिसमें नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और विक्की कौशल अहम भूमिका में नज़र आये थे.

फ़िल्म के डायलॉग भी बहुत लोकप्रिय हुए थे जिसमें शामिल हैं, 'भगवान का सीसीटीवी हूँ मैं', 'अपुन का बाप अपुन को लोमड़ी बोलता था, बोलता था रात में मेरा आँख चमकने लगता है', 'क्या नाम है तेरा? पॉकेट! तू छोटा है ना तू पॉकेट. कोई पूछेगा काइको मारा तुझे, तो मैं बोलेगा अपुन ने तो पॉकेट मारा बस.'

अजय ब्रह्मात्मज आगे कहते हैं, "अनुराग की फ़िल्मों में अधिकतर अभिनेता नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी) और हिंदी भाषी प्रदेश से होते हैं और जब उन्हें इस तरह के डायलॉग मिलते हैं तो उन्हें पता होता है कि शब्दों का सही ठहराव और उच्चारण क्या है."

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