विवेचनाः 'मुग़ल-ए-आज़म' के असली शहंशाह थे के. आसिफ़

  • 21 जनवरी 2019
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पचास के दशक में बनी फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' को बनाने के लिए जिस पागलपन, कल्पनाशीलता और जीवट की ज़रूरत थी, वो के. आसिफ़ में कूट-कूट कर भरी हुई थी.

हमेशा चुटकी से सिगरेट या सिगार की राख झाड़ने वाले करीमउद्दीन आसिफ़, अभिनेता नज़ीर के भतीजे थे.

शुरू में नज़ीर ने उन्हें फ़िल्मों से जोड़ने की कोशिश की लेकिन आसिफ़ का वहाँ दिल न लगा.

नज़ीर ने उनके लिए दर्ज़ी की एक दुकान खुलवा दी.

थोड़े दिनों में ही वो दुकान बंद करवानी पड़ी, क्योंकि ये देखा गया कि आसिफ़ का अधिकतर समय पड़ोस के एक दर्ज़ी की लड़की से रोमांस करने में बीत रहा था.

नज़ीर ने तब उन्हें ज़बरदस्ती ठेल कर फ़िल्म निर्माण की तरफ़ दोबारा भेजा.

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Image caption के आसिफ़

'मुग़ल-ए-आज़म' का जादू अब भी बरक़रार

के. आसिफ़ ने अपने जीवन में सिर्फ़ दो फ़िल्मों का निर्देशन किया, 1944 में आई 'फूल' और फिर 'मुग़ल-ए-आज़म.'

लेकिन इसके बावजूद उनका नाम भारतीय फ़िल्म इतिहास में हमेशा स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा.

हाल में आई किताब 'ये उन दिनों की बात है' के लेखक यासिर अब्बासी बताते हैं, "मुग़ल-ए-आज़म मैं कम से कम 100 बार देख चुका हूँ."

"लेकिन आज भी जब वो टीवी पर आती है, तो मैं चैनल 'चेंज' नहीं कर पाता हूँ."

"कमाल का 'विज़न' और 'पैशन' था आसिफ़ में. सिर्फ़ दो फ़िल्म करने के बावजूद आसिफ़ को चोटी के निर्देशकों की क़तार में रखा जाता है."

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Image caption यासिर अब्बास की किताब 'ये उन दिनों की बात है' का कवर

संवाद थे 'मुग़ल-ए-आज़म' की जान

यूँ तो 'मुग़ल-ए-आज़म' का हर पक्ष मज़बूत है, लेकिन इस फ़िल्म को दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी इसके संवादों ने.

यासिर अब्बासी बताते हैं कि अनारकली को ज़िंदा चुनवाए जाने से पहले का दृश्य था, जिसमें अकबर उनसे उनकी आख़िरी इच्छा पूछते हैं और वो कहती हैं कि वो एक दिन के लिए भारत की मलका-ए-आज़म बनना चाहती हैं.

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के आसिफ़ ने बनाई थी सबसे मंहगी फ़िल्म मुगल- ए-आज़म

"आसिफ़ ने अपने तीनों संवाद में लेखकों से पूछा कि इस पर अनारकली को क्या कहना चाहिए. अमानउल्लाह साहब जो कि ज़ीनत अमान के पिता थे और एहसान रिज़वी ने अपने लिखे डायलॉग सुनाए. इसके बाद आसिफ़ साहब ने वजाहत मिर्ज़ा की तरफ़ देखा."

"वजाहत मिर्ज़ा ने अपने मुंह से पान की पीक उगालदान में डाल कर कहा, 'ये सब 'डायलॉग' बकवास हैं. इतने शब्दों की ज़रूरत क्या है?"

"उन्होंने फिर अपने पानदान से एक पर्चा निकाल कर पढ़ा, अनारकली सिर्फ़ सलाम करेगी और सिर्फ़ ये कहेगी कि 'शहंशाह की इन बेहिसाब बख़शीशों के बदले में ये कनीज़ जलालउद्दीन मोहम्मद अकबर को अपना ये ख़ून माफ़ करती है."

"मिर्ज़ा का ये कहना था कि आसिफ़ ने दौड़ कर उन्हें गले लगा लिया और वहाँ मौजूद दोनों डायलॉग लेखकों ने अपने कागज़ फाड़ कर फेंक दिए."

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लच्छू महाराज ने सिखाया कथक मधुबाला को

जब 'मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो' गाना फ़िल्माया जा रहा था तो पहले आसिफ़ और फिर नृत्य निर्देशक लच्छू महाराज नौशाद के पास आ कर बोले, "नौशाद साहब ये गाना ऐसा बनाएं कि वाजिद अली शाह के दरबार के ज़माने की ठुमरी और दादरा याद आ जाए."

"नौशाद ने कहा कि कथक नृत्य में चेहरे और हाथ के भाव सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. इसे फ़िल्म में मधुबाला पर फ़िल्माया जाएगा. लेकिन क्या वो इसके साथ न्याय कर पाएंगी, क्योंकि वो कत्थक नृत्यागना तो हैं नहीं?"

"लच्छू महाराज ने कहा, ये आप मेरे ऊपर छोड़ दीजिए. उन्होंने शूटिंग से पहले मधुबाला से नृत्य का घंटों अभ्यास कराया. पूरा गाना उन पर फ़िल्माया गया और किसी 'डुप्लीकेट' का इस्तेमाल नहीं किया गया."

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वो शख्सियत जिन्हें पाकिस्तान का 'टाइटन' कहा जाता है.

भुट्टो रोज़ आते थे मुग़ल-ए-आज़म की शूटिंग देखने

दिलचस्प बात ये है कि इस गाने की शूटिंग देखने कई बड़े लोग सेट पर पहुंचते थे.

चीन के प्रधानमंत्री चू एन लाई, मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने मुग़ल-ए-आज़म की शूटिंग देखी.

यासिर अब्बासी बताते हैं, "उस ज़माने में भुट्टो मुंबई में ही रहा करते थे. इस गाने की शूटिंग जितने दिन चली, वो रोज़ आए शूटिंग देखने. भुट्टो और आसिफ़ में गहरी दोस्ती थी. वो जब भी सेट पर होते थे, आसिफ़ साहब और सेट पर मौजूद लोगों के साथ खाना खाते थे."

"उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि मुग़ल-ए-आज़म के सेट पर मौजूद रहने वाला ये शख़्स एक दिन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनेगा."

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बेल्जियम से मंगाए गए थे शीशमहल के शीशे

इस फ़िल्म की जान थी के. आसिफ़ का 'अंटेशन टू डिटेल' यानी छोटी-छोटी चीज़ को ध्यान से देखने की कला.

फ़िल्म में जोधाबाई द्वारा पहने गए कपड़ों को हैदराबाद के सालारजंग म्यूज़ियम से उधार लिया गया था. सेट के खंभे, दीवारें और मेहराब बनाने में महीनों लग गए थे.

ख़तीजा अकबर अपनी किताब 'द स्टोरी ऑफ़ मधुबाला' में लिखती हैं, "शीश महल का सेट बनने में पूरे दो साल लग गए.

आसिफ़ को इसकी प्रेरणा जयपुर के आमेर के क़िले में बने शीशमहल से मिली थी. उस समय भारत में उपलब्ध रंगीन शीशों की गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं थी.

"उन शीशों को बहुत ज़्यादा क़ीमत चुका कर बेल्जियम से मंगवाया गया. इससे पहले ईद आ गई. रसम का पालन करते हुए मुग़ल-ए-आज़म के फ़ाइनांसर शाहपूरजी मिस्त्री आसिफ़ के घर पर ईदी लेकर पहुंचे."

"वो एक चाँदी की ट्रे पर कुछ सोने के सिक्के और एक लाख रुपये ले कर गए. आसिफ़ ने पैसे उठाए और मिस्त्री को वापस करते हुए कहा, 'इन पैसों का इस्तेमाल, मेरे लिए बेल्जियम से शीशे मंगवाने के लिए करिए."

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कैसे रचा गया था 'प्यार किया तो डरना क्या' गीत

'मुग़ल-ए-आज़म' फ़िल्म का सबसे मशहूर गाना था, 'प्यार किया तो डरना क्या...', इसको लिखने और संगीत में ढालने में नौशाद और शकील बदायूंनी को पूरी रात लग गई.

यासिर अब्बासी बताते हैं, "जब आसिफ़ ने नौशाद को उस गाने की 'सिचयुएशन' बताई तो उस ज़माने में एक और फ़िल्म बन रही थी अनारकली, जो इसी तरह की कहानी पर आधारित थी. नौशाद ने उनसे कहा कि दोनों फ़िल्मों में बहुत समानता है. उनका गाना रिकॉर्ड हो चुका है जिसे मैंने सुना भी है."

"अगर हम भी उसी तरह का गाना चुनेगें तो ये 'रिपीटेशन' लगेगा. आप इस 'सिचयुएशन' को बदल क्यों नहीं देते. आसिफ़ साहब ने कहा कि हम ऐसा नहीं करेंगे. मैंने ये चुनौती स्वीकार कर ली है. अब आप की बारी है इस पर खरा उतरने की. जब इसे संगीत में ढालने की बारी आई तो सबसे मुश्किल काम था इसे लिखना."

"शाम को छह बजे जब सूरज ढ़ल रहा था नौशाद और शकील बदायूंनी ने अपने आप को एक कमरे में बंद कर लिया. शकील साहब ने क़रीब एक दर्जन मुखड़े लिखे, जिसमें कभी उन्होंने गीत का सहारा लिया तो कभी ग़ज़ल का. लेकिन बात बनी नहीं. कुछ देर में नौशाद का पूरा कमरा काग़ज़ की चिटों से भर गया."

"उन्होंने पूरी रात न कुछ खाया और न ही पिया. काफ़ी देर बाद नौशाद को एक पूर्बी गीत का मुखड़ा याद आया जो उन्होंने अपने बचपन में सुना था, 'प्रेम किया का चोरी करी.' मैंने शकील साहब को ये सुनाया. उन्हें ये पसंद आया. मैंने हारमोनियम पर इसकी धुन बनाई और शकील साहब ने उसी वक़्त लिखा -

प्यार किया तो डरना क्या

प्यार किया कोई चोरी नहीं की..."

"जब हम सुबह ये गाना 'कंपोज़' कर बाहर निकले तो हमारे सिर पर सूरज चमक रहा था. मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि पुराने गानों की लोकप्रियता का राज़ क्या है? मेरा जवाब होता है कि उनको बनाने में पूरी-पूरी रात बीत जाती थी, जब जा कर उन्हें अंतिम रूप मिलता था."

बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने लिए थे गाने के लिए 25000 रुपये

एक दिन आसिफ़ ने नौशाद से कहा कि वो स्क्रीन पर तानसेन को गाते हुए दिखाना चाहते हैं. सवाल उठा कि इसे गाएगा कौन? नौशाद ने कहा कि इसे इस समय के तानसेन बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ से गवाना चाहिए, लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं होंगें.

यासिर अब्बासी बताते हैं, "आसिफ़ ने कहा ये आप मेरे ऊपर छोड़ दीजिए. आप बस उनसे मिलने का वक़्त तय कीजिए. जब ये दोनों ख़ान साहब से मिलने गए तो उन्होंने ये कहते हुए गाने से इनकार कर दिया कि फ़िल्मों में गायकों पर बहुत बंदिशें लगा दी जाती हैं."

"आसिफ़ साहब ने कहा कि खाँ साहब ये गाना तो आप ही गाएंगे. ये सुनकर बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने नौशाद को एक तरफ़ ले जा कर कहा, आप किसको मेरे पास ले आए हैं? मेरे मना करने पर भी ये कह रहा है कि गाना आप ही गाएंगे. मैं इस शख़्स से अपने गाने की इतनी तगड़ी फ़ीस मांगूँगा कि ये यहाँ से भाग खड़ा होगा."

"बड़े ग़ुलाम अली ने आसिफ़ से पूछा, आप मुझे कितने पैसे देंगे? आसिफ़ ने कहा, 'जो आप चाहें.' ख़ाँ साहब ने जवाब दिया, 'पच्चीस हज़ार रुपये.' आसिफ़ बोले, 'सिर्फ़ पच्चीस हज़ार?' आप तो इससे कहीं ज़्यादा के हक़दार हैं."

"बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ इस तरह मुग़ल-ए-आज़म के लिए पच्चीस हज़ार रुपये पर गाने के लिए राज़ी हुए जबकि उस समय के चोटी के गायकों लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी को एक गाने के लिए सिर्फ़ 500 से 1000 रुपये ही मिलते थे."

बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब ने मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म का वो मशहूर गाना गाया .........'प्रेम जोगण बनके… सुन्दर पिया ओर चले.'

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Image caption साल 1954 आई मेहबूब ख़ान की फ़िल्म 'अमर' के एक दृश्य में मधुबाला और दिलीप कुमार

मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच बातचीत नहीं

मुग़ल-ए-आज़म बनने के अंतिम चरण में मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच बातचीत बंद हो गई थी, क्योंकि मधुबाला ने अपने परिवार के दबाव के चलते दिलीप कुमार का शादी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था.

फ़िल्म में दुर्जन सिंह का रोल करने वाले अजीत ने एक बार लिखा था, "एक सीन में दिलीप कुमार को मधुबाला को थप्पड़ मारना था. जब कैमरा रोल हुआ तो दिलीप कुमार ने मधुबाला को इतनी ज़ोर से थप्पड़ मारा कि वहाँ मौजूद सारे लोग स्तब्ध रह गए. शॉट तो ओके हो गया लेकिन लोगों की समझ में नहीं आया कि अब आगे क्या होगा?"

"क्या मधुबाला सेट से वॉक-आउट कर जाएंगी? क्या शूटिंग रोकनी पड़ेगी? इससे पहले कि मधुबाला कुछ कहतीं, आसिफ़ उन्हें कोने में ले जा कर बोले, 'मैं आज बहुत ख़ुश हूँ, क्योंकि ये साफ़ है कि वो अभी भी तुम्हें प्यार करता है. एक आशिक़ के अलावा, कोई और अपनी माशूक़ा से ऐसा कैसे कर सकता है?"

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के आसिफ़ ने बनाई थी सबसे मंहगी फ़िल्म मुगल- ए-आज़म

मधुबाला के पिता के रमी में उलझाया के आसिफ़ ने

आसिफ़ की मुश्किल ये होती थी कि मधुबाला के पिता अताउल्लाह ख़ाँ अक्सर फ़िल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर मौजूद रहते थे. लेकिन उन्होंने उनसे अपना पिंड छुड़ाने का नायाब तरीक़ा ढ़ूढ़ निकाला.

मशहूर फ़िल्म इतिहासकार बनी रयूबेन अपनी किताब 'फॉलीवुड फ़्लैशबैक-अ कलेक्शन ऑफ़ मूवी मेमॉएर्स' में लिखते हैं, "जिस दिन दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच अंतरंग प्रेम दृश्य फ़िल्माए जाने होते थे, आसिफ़ ने मधुबाला के पिता अताउल्लाह ख़ाँ को सेट से दूर रखने के लिए एक तरकीब निकाली."

"आसिफ़ को पता था कि अताउल्लाह ख़ाँ रमी खेलने के बहुत शौक़ीन थे. उन्होंने अपने पब्लिसिस्ट तारकनाथ गांधी को कुछ हज़ार रुपए दे कर कहा, आज से तुम्हारा काम, अगले कुछ दिनों तक ख़ाँ साहब के साथ रमी खेलना होगा और तुम जानबूझ कर हर बाज़ी हारोगे."

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Image caption के आसिफ़ की एक और फ़िल्म 'फूल' का पोस्टर

आसिफ़ ने फ़िल्म पूरी करने के लिए सोहराब मोदी से किया संपर्क

सालों तक शूटिंग चलने के कारण ये फ़िल्म ओवर बजट हो गई और फ़िल्म के फ़ाइनांसर शाहपुरजी मिस्त्री यहाँ तक सोचने लगे कि इस फ़िल्म को के. आसिफ़ से लेकर सोहराब मोदी से निर्देशित करवाया जाए.

यासिर अब्बासी बताते हैं, "इस फ़िल्म को बनने में बहुत समय लगा. दस साल का अर्सा गुज़रा. ज़ाहिर है सारा बजट नियंत्रण के बाहर चला गया. आसिफ़ साहब पानी की तरह पैसा बहाते थे, क्योंकि उनको क्वॉलिटी चाहिए थी. एक दिन तंग आकर शाहपुरजी ने तय किया कि अब बहुत हो गया. मैं अब डायरेक्टर ही बदल दूंगा."

"उन्होंने सोहराब मोदी से बात की और एक दिन वो उन्हें शीशमहल का सेट दिखाने ले आए. आसिफ़ साहब वहाँ मौजूद थे. थोड़ी देर तक वो ख़ामोशी से देखते रहे, फिर वो दोनों के पास जा कर बोले, सेठजी आपको जिससे चाहें ये फ़िल्म मुकम्मल करवानी हो, करवा लीजिए."

"लेकिन ये सेट मैंने लगाया है, और यहाँ शूटिंग मैं ही पूरी करूंगा. अगर इसके बाद किसी ने इस सेट पर क़दम रखा तो मैं उसकी टांगें तोड़ दूंगा."

Image caption बीबीसी स्टूडियो में यासिर अब्बासी के साथ बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल

के. आसिफ़ के पास अपनी कार भी नहीं थी

मुग़ल-ए-आज़म अपने ज़माने की सबसे मंहगी और सफल फ़िल्म थी, लेकिन इसके निर्देशक के. आसिफ़ ताउम्र एक किराए के घर में रहे और टैक्सी पर चले.

यासिर अब्बासी बताते हैं, "जब शाहपुरजी बहुत तंग आ गए तो उनसे एक बार नौशाद ने पूछा कि अगर आप को आसिफ़ से इतनी शिकायत है, तो आपने उनके साथ ये फ़िल्म बनाने का फ़ैसला क्यों किया? शाहपुरजी ने एक ठंडी सांस लेकर कहा कि नौशाद साहब एक बात बताऊँ, ये आदमी ईमानदार है."

"इसने इस फ़िल्म में डेढ़ करोड़ रुपए ख़र्च कर दिए हैं, लेकिन उसने अपनी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं डाली है. बाक़ी सभी कलाकारों ने अपना कॉन्ट्रैक्ट कई बार बदलवाया, क्योंकि वक़्त गुज़रता जा रहा था. लेकिन इस शख़्स ने पुराने कॉन्ट्रैक्ट पर काम किया और कोई धोखाधड़ी नहीं की."

"कोई पैसे का ग़बन नहीं किया. ये आदमी आज भी चटाई पर सोता है, टैक्सी पर छह आना हर मील का किराया देकर सफ़र करता है और सिगरेट भी दूसरों से मांग कर पीता है. ये आदमी बीस घंटे खड़े हो कर लगातार काम करता है और हम लोग हैरान रह जाते हैं."

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