अमिताभ बच्चन की पहली फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' के 50 साल

  • 7 फरवरी 2019
अमिताभ बच्चन इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमिताभ बच्चन की पहली फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' को प्रदर्शित हुए इस साल 50 साल होने जा रहे हैं. इसी के साथ महानायक बन चुके अमिताभ बच्चन को भी फ़िल्मों में प्रवेश किये अब 50 बरस हो जायेंगे.

हालांकि जब उस समय के जाने-माने लेखक, फ़िल्मकार ख़्वाजा अहमद अब्बास ने यह फ़िल्म बनायी थी तब उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी यह फ़िल्म इतिहास में अमर हो जायेगी.

न ही इस फ़िल्म के सात प्रमुख कलाकारों में से एक अमिताभ बच्चन ने कभी सोचा था कि यह फ़िल्म भविष्य में सिर्फ़ उनके कारण ही बार-बार याद की जायेगी.

अमिताभ बच्चन को यह फ़िल्म कैसे मिली और उसके बाद उनकी अभिनय यात्रा में क्या-क्या उतार चढ़ाव आए इसकी बात तो हम करेंगे ही लेकिन उससे पहले यह जान लें कि 'सात हिन्दुस्तानी' फ़िल्म आख़िर क्या थी. अमिताभ के अलावा और कौन-कौन कलाकार इस फ़िल्म में थे.

ख़्वाजा अहमद अब्बास 'सात हिन्दुस्तानी' के निर्माता, निर्देशक ही नहीं लेखक और पटकथा लेखक भी थे. यह फ़िल्म गोवा को पुर्तगाली शासन से आज़ाद कराने की कहानी पर बनी थी.

पुर्तगालियों से इस मुश्किल और ख़तरनाक लड़ाई को लड़ने के लिए अब्बास ने 'सात हिन्दुस्तानी' की अपनी जिस फ़ौज की रचना की थी उसमें देश के अलग-अलग हिस्सों और विभिन्न धर्मों के लोगों को पात्र बनाया था.

इमेज कॉपीरइट KHWAJA AHMAD ABBAS MEMORIAL TRUST
Image caption ख़्वाजा अहमद अब्बास के साथ अमिताभ बच्चन

अभिनेताओं को दी गई थीं विपरीत भूमिकाएं

दिलचस्प बात यह थी कि अब्बास ने किसी भी कलाकार को उसके राज्य या धर्म के अनुसार भूमिका न देकर उसके विपरीत भूमिका दी थी.

जैसे हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि और लेखक हरिवंश राय बच्चन के उत्तर प्रदेश मूल के अमिताभ बच्चन को बिहार के मुस्लिम उर्दू शायर अनवर अली अनवर की भूमिका मिली. जिसमें दिखाया गया था कि अमिताभ को हिंदी लिखनी नहीं आती. अमिताभ का एक यह संवाद भी था कि हमको हिंदी की अरन्तु-परन्तु समझ नहीं आती.

ऐसे ही बंगाल के सुप्रसिद्ध अभिनेता उत्पल दत्त को एक पंजाबी जोगिन्दर नाथ की, मलयालम के मशहूर अभिनेता मधु को बंगाली शुबोध सान्याल की, इरशाद अली को दक्षिण भारतीय माधवन की, जलाल आगा को महाराष्ट्रियन सखाराम शिंदे की, मशहूर हास्य अभिनेता महमूद के भाई अनवर अली को हिन्दू राम भगत शर्मा की और अभिनेत्री शहनाज़ को ईसाई मारिया की भूमिकाएं देकर सभी कलाकारों को चुनौती दी गई थी.

लेकिन लगभग सभी कलाकार इस चुनौती में सफल हुए.

देश के विभिन्न क्षेत्रों के पात्रों को लेकर बनी इस फ़िल्म ने देश प्रेम को लेकर विभिन्नता में एकता का संदेश दिया. इसी कारण 'सात हिन्दुस्तानी' को उस वर्ष राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. साथ ही इस फ़िल्म के 'आंधी आए कि तूफ़ान कोई ग़म नहीं' और 'एक मंज़िल पर सबकी निगाहें रहें' जैसे गीतों के लिए गीतकार कैफ़ी आज़मी को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.

हालांकि अमिताभ बच्चन ने भी कुछ बरस पहले मुझे बताया था कि 'सात हिन्दुस्तानी' के लिए उन्हें भी सर्वश्रेष्ठ नए अभिनेता के रूप में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. लेकिन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों के रिकॉर्ड में न जाने उनके इस पहले पुरस्कार का कोई उल्लेख क्यों नहीं है.

जब यह बात मैंने अमिताभ जी को बताई तो वह बोले- "मुझे पता नहीं उनके रिकॉर्ड में यह दर्ज क्यों नहीं है. मेरे पास उस अवार्ड की ट्रॉफी है, आप चाहें तो मेरे घर आकर देख लें."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

व्यावसायिक रूप से असफल थी फ़िल्म

'सात हिन्दुस्तानी' में कई अच्छे संवाद भी थे. जिनमें फ़िल्म में अमिताभ का बोला एक संवाद -'हम हिन्दुस्तानियों को रेंगना नहीं आता' तो काफ़ी पसंद किया गया.

लेकिन यह फ़िल्म व्यवसायिक रूप से सफल नहीं हो पायी थी. उसका एक कारण यह भी हो सकता है कि तब रंगीन फ़िल्मों का युग तेज़ी से आगे बढ़ रहा था.

दर्शकों की दिलचस्पी रंगीन फ़िल्मों को देखने में ज़्यादा रहती थी. लेकिन 'सात हिन्दुस्तानी' ब्लैक एंड व्हाइट थी. अमिताभ के करियर में सिर्फ़ यही एक फ़िल्म ब्लैक एंड व्हाइट है.

फिर भी अपनी ऐसी कई विशेषताओं के लिए यह फ़िल्म आज भी ख़ास है. लेकिन हम सभी इस फ़िल्म को इस दौरान बार-बार और आज 50 साल बाद भी यदि शिद्दत से याद कर रहे हैं तो इसलिए कि यह फ़िल्म अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म थी.

हालाँकि यह दुखद है कि 'सात हिन्दुस्तानी' के प्रदर्शन के इस स्वर्ण जयंती वर्ष में फ़िल्म की पूरी टीम में से आज अधिकांश लोग इस दुनिया में नहीं हैं.

इमेज कॉपीरइट KHWAJA AHMAD ABBAS MEMORIAL TRUST
Image caption पृथ्वीराज कपूर के साथ ख़्वाजा अहमद अब्बास

कैसे मिली थी अमिताभ को 'सात हिन्दुस्तानी'

अमिताभ बच्चन को 'सात हिन्दुस्तानी' फ़िल्म मिलने की कहानी भी काफ़ी दिलचस्प है. यह फ़िल्म अमिताभ को कैसे मिली इस बारे में अमिताभ बच्चन की माँ तेजी बच्चन जी और बाबूजी डॉ हरिवंश राय बच्चन ने स्वयं मुझे सन 1978 में बताया था. उन दिनों वे दिल्ली के 13 विलिंग्डन क्रिसेंट बंगले में रहते थे.

असल में अमिताभ बच्चन को नाटकों में भाग लेने का शौक बचपन से था. नैनीताल में अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान शेरवुड कॉलेज में भी वह नाटक करते थे और बाद में दिल्ली में अपने ग्रेजुएशन के दौरान किरोड़ीमल कॉलेज में भी नाटकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे.

शेरवुड में तो अपने एक नाटक के मंचन से ठीक पहले एक बार अमिताभ इस कद्र बीमार पड़ गए थे कि वह नाटक में भाग नहीं ले सके. जिस कारण अमिताभ का दिल टूट गया. तब उनके बाबूजी ने अमिताभ के पास शेरवुड जाकर उन्हें हिम्मत देने के साथ यह सीख भी दी कि -'मन सा हो तो अच्छा और मन सा ना हो तो और भी अच्छा.'

लेकिन अमिताभ नाटकों के साथ फ़िल्मों में काम करने की इच्छा भी मन ही मन बना रहे थे, इस बात से माँ और बाबूजी अनभिज्ञ थे. लेकिन किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अमिताभ के मन में फ़िल्मों में काम करने की इच्छा काफ़ी मज़बूत हो चुकी थी.

यहाँ तक एक बार किसी 'फ़िल्म स्टार हंट' के विज्ञापन को देखकर अमिताभ ने अपनी फ़ोटो आदि प्रतियोगिता में मुंबई भेज दिए. जब इस बात का माँ जी और बाबूजी को पता लगा तो वह चिंतित हो उठे.

तेजी जी ने मुझे बताया था-"हमने मुन्ना (तेजी जी अमिताभ को इसी नाम से पुकारती थीं) को कहा कि हर माँ-बाप का सपना होता है कि उनका बेटा उनके बुढ़ापे का सहारा बने. वह उनके रहते हुए सैटल हो जाए. लेकिन यह क्या तुमको फ़िल्मों में काम करने का शौक पड़ गया, जहाँ सफलता की दूर-दूर तक कोई गारंटी नहीं है. लेकिन अमिताभ द्वारा टेलेंट हंट को भेजे उन फ़ोटो का कोई जवाब नहीं आया, तो हम लोगों को राहत मिली."

अजिताभ ने की अमिताभ के लिए फ़िल्मों की बात

बाबूजी ने मुझे बताया था -अजिताभ भी चाहते थे कि उनके भाई का फ़िल्मों में आने का सपना पूरा हो. इसलिए अजिताभ अपने भाई की विभिन्न मुद्राओं में फ़ोटो खींचते रहते थे.

लेकिन तब तक अमिताभ बच्चन कोलकाता में 'बर्ड एंड कंपनी' में सेल्स एग्ज़िक्यूटिव के पद पर लग गए थे. जहाँ उस समय 1400 रुपये महीने का आकर्षक वेतन था. हम लोग ख़ुश थे कि आख़िरकार अमित को एक अच्छी नौकरी मिल गयी है.

उन्हीं दिनों अजिताभ ट्रेन से दिल्ली से मुंबई जा रहे थे कि उन्हें ट्रेन में उनकी एक मित्र मिली जिसने बताया कि ख़्वाजा अहमद अब्बास अपनी नयी फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' के लिए नए कलाकारों की तलाश कर रहे हैं. तो अजिताभ ने भाई अमिताभ के फ़ोटो उस मित्र को देते हुए अब्बास से बात करने को कहा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमिताभ से पहले टीनू कर रहे थे अनवर की भूमिका

जब वे फ़ोटो अब्बास ने देखे तो उन्होंने कहा फ़ोटो से क्या होगा, लड़के को बुलाओ. तब अजिताभ ने अमिताभ को कोलकाता से तुरंत मुंबई आने को कहा. अमिताभ बच्चन जब मुंबई में अब्बास साहब के पास पहुंचे तो उन्होंने सर नेम बच्चन देखकर पूछा कि तुम क्या बच्चन के बेटे हो, घर से भागकर आये हो. तब अमिताभ ने कहा भागकर नहीं आया उन्हें पता है.

लेकिन अपनी तसल्ली के लिए ख़्वाजा अहमद अब्बास ने बच्चन जी को तार भेजकर पूछा कि तुम क्या इस बात से सहमत हो कि अमिताभ फ़िल्मों में काम करे. तब बच्चन जी ने अब्बास को जवाब दिया कि यदि तुमको लगता है कि अमिताभ में कुछ योग्यता है तो हमारी सहमति है लेकिन लगता है ऐसी कोई योग्यता नहीं है तो उसे समझाकर वापस कोलकाता भेज दो.

लेकिन अब्बास को जब लगा कि वह यह सब कर सकता है तो माँ जी और बाबूजी ने भी अमिताभ को फ़िल्मों में काम करने की सहमति दे दी.

यहाँ यह भी दिलचस्प है कि अमिताभ बच्चन को ख़्वाजा अहमद अब्बास ने फ़िल्म में अनवर अली की जिस भूमिका के लिए लिया, पहले वह भूमिका टीनू आनंद करने वाले थे. लेकिन टीनू को तभी सत्यजीत रे से उनके साथ सहायक निर्देशक बनने का मौका मिला तो उन्होंने अभिनय की जगह निर्देशन क्षेत्र को प्राथमिकता दी और वह कोलकाता चले गए.

बताते हैं अमिताभ को 'सात हिन्दुस्तानी' में अभिनय के लिए कुल 5 हज़ार रुपये मिलने थे. चाहे फ़िल्म को बनने में कितना भी समय लगे.

ऑल इंडिया रेडियो ने कर दिया था रिजेक्ट

अमिताभ बच्चन का 'सात हिन्दुस्तानी' फ़िल्म से फ़िल्मों में आगमन का सपना तो पूरा हो गया लेकिन उनका संघर्ष इस फ़िल्म से पहले भी था और इस फ़िल्म के बाद भी काफ़ी समय तक संघर्ष बरक़रार रहा.

इस फ़िल्म से पहले अमिताभ ने ऑल इंडिया रेडियो में उद्घोषक बनने के लिए भी अपनी क़िस्मत आज़माई थी और कुछ अन्य नौकरियों के लिए भी.

इसके लिए अमिताभ ने ऑल इंडिया रेडियो में ऑडिशन दिया लेकिन रेडियो की चयन समिति ने अमिताभ की आवाज़ को रेडियो के लिए अयोग्य बताकर रिजेक्ट कर दिया था. रेडियो की इस ग़लती का अफ़सोस गोवा में 28 नवम्बर 2017 को तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने भी किया.

गोवा में अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह के दौरान अमिताभ बच्चन को 'इंडियन सिनेमा की पर्सनेलिटी ऑफ़ द इयर' का 10 लाख रुपये और प्रमाण पत्र वाला बड़ा सम्मान देते हुए स्मृति ईरानी ने कहा था- "जीवन में एक ऐसा हादसा हुआ कि ऑल इंडिया रेडियो में अमित जी ऑडिशन करने गए और अमित जी को ऑल इंडिया रेडियो पर रिजेक्ट कर दिया गया था. तो आज यह विधि का विधान है और हमारा सौभाग्य कि आज इस मंच पर उसी मंत्रालय द्वारा और भारत सरकार की ओर से हम अमित जी को पारितोषिक दे रहे हैं, यह हमारा अभिमान है."

Image caption हरिवंश राय बच्चन ने कभी नहीं की कोई सिफ़ारिश

हरिवंश जी ने नहीं की कोई सिफारिश

यूँ आज यह सुन आश्चर्य होता है कि शेरवुड में पढ़े और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद उस दौर में भी अमिताभ बच्चन को नौकरी पाने के लिए कई धक्के खाने पड़े. यहाँ तक रेडियो में वह उद्घोषक तक नहीं बन सके. जबकि बच्चन परिवार तब नेहरु-गांधी परिवार के बेहद क़रीब था.

इंदिरा गांधी तो उस दौर में पहले सूचना प्रसारण मंत्री और फिर प्रधानमन्त्री थीं. इंदिरा गांधी से तेजी जी के इतने मधुर और घनिष्ठ सम्बन्ध थे कि सन 1968 के क़रीब इसी दौर में राजीव गांधी के विवाह के समय सोनिया गांधी का कन्यादान भी बच्चन जी और तेजी जी ने किया था.

लेकिन बच्चन जी ने सत्ता के इतने क़रीब रहते हुए भी अमिताभ के लिए कोई सिफ़ारिश नहीं की, वरना अमिताभ रेडियो क्या कहीं भी आसानी से कोई नौकरी पा लेते.

इधर यह भी दिलचस्प है कि अमिताभ बच्चन की आवाज़ को चाहे रेडियो द्वारा रिजेक्ट कर दिया गया. लेकिन इसके कुछ दिन बाद मृणाल सेन सरीखे फ़िल्मकार ने उनकी इसी प्रतिभा को देखते हुए अपनी फ़िल्म 'भुवन सोम' में सूत्रधार के रूप में अमिताभ की ही आवाज़ ली.

हालांकि फ़िल्म की क्रेडिट लाइन में अमिताभ बच्चन की जगह सिर्फ अमिताभ दिया गया और उन्हें तब इसके लिए 300 रुपये का मेहनताना मिला था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

12 फ़िल्मों के बाद बदली क़िस्मत

'सात हिन्दुस्तानी' के बाद अमिताभ बच्चन को फिल्मकारों ने नोटिस तो किया और इसके बाद उन्हें फ़िल्में लगातार मिलने लगीं. लेकिन उनकी फिल्मों को अपेक्षित सफलता न मिलने से फ़िल्म इंडस्ट्री में अमिताभ के ऊपर एक फ़्लॉप अभिनेता का ऐसा दाग़ लग गया जो उनकी अगली फ़्लॉप के बाद और भी गहराता गया.

फ़्लॉप का यह दाग़ साफ़ होने में क़रीब 4 बरस का लम्बा समय लग गया. लेकिन इस दौरान अमिताभ को कई तरह के कड़वे-मीठे अनुभव भी हो गए. संघर्ष की इस भट्टी में तपकर एक ऐसा अमिताभ चमका जिसकी आभा आज भी कायम है.

अमिताभ को 'सात हिन्दुस्तानी' के बाद सुनील दत्त ने 'रेशमा और शेरा' में लिया जिसमें अमिताभ की फ़िल्म के नायक शेरा (सुनील दत्त) के गूंगे भाई छोटू की एक छोटी सी भूमिका थी.

फ़िल्म में अमिताभ का कोई संवाद भी नहीं था. यह फ़िल्म देश-विदेश में काफ़ी पसंद की गयी. लेकिन फ़िल्म का अधिकतर श्रेय सुनील दत्त, वहीदा रहमान और विनोद खन्ना को मिला.

हाँ इस दौरान हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'आनंद' से अमिताभ को अच्छी लोकप्रियता मिली. इस फ़िल्म में नायक तो राजेश खन्ना थे लेकिन अमिताभ ने अपनी बाबू मोशाय की भूमिका को इतना ख़ूबसूरत और अहम बना दिया कि इसके लिए उन्हें पहली बार सर्वोत्तम सहायक अभिनेता का फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी मिला.

सही मायने में अमिताभ पहली बार 'आनंद' फ़िल्म से दर्शकों के घरों में चर्चा का विषय बने. लेकिन इस सबके बावजूद अमिताभ बच्चन के करियर ने रफ़्तार नहीं पकड़ी.

असल में इस दौरान अमिताभ की 'परवाना' और 'संजोग' फ़िल्में बुरी तरह फ़्लॉप हो गयीं. उसके बाद 'बंसी बिरजू', 'एक नज़र', 'रास्ते का पत्थर' और 'बंधे हाथ' जैसी अमिताभ की और फ़िल्में भी कतार से औंधे मुंह गिरती चली गयीं.

इतनी फ़िल्मों में जिस एक फ़िल्म को थोड़ी बहुत सफलता मिली वह थी- 'बॉम्बे टू गोवा'. जिसमें अरुणा इरानी उनकी नायिका थीं. 'सात हिन्दुस्तानी' में उनके साथ रहे अभिनेता अनवर अली और उनके भाई महमूद भी इस फ़िल्म में अमिताभ के साथ थे.

देखा जाए महमूद और अनवर दो ऐसे नाम हैं जिन्होंने अमिताभ के शुरुआती दौर के संघर्ष में उनकी काफ़ी मदद की. महमूद ने तो 'सात हिन्दुस्तानी' देखते ही अमिताभ बच्चन की प्रतिभा को पहचानकर, अपनी तीन फ़िल्मों के लिए साइन कर लिया था.

यह बात अलग है कि महमूद उनके साथ ये फ़िल्में बना नहीं सके. लेकिन कई निर्माताओं से उन्हें मिलवाने, कुछ समय अपने घर में साथ रखने और उन्हें कई तरह से मदद करने में भी महमूद का योगदान रहा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कुछ फ़िल्मकारों ने नहीं किया अमिताभ पर भरोसा

इस दौरान यह भी हुआ कि अमिताभ को लेकर शुरू की गयी कुछ फ़िल्मों से उन्हें निकाल दिया गया. कुछ फ़िल्में कुछ दिन की शूटिंग के बाद रोक दी गयीं.

मसलन निर्देशक कुंदन कुमार ने एक फ़िल्म 'दुनिया का मेला' में अमिताभ के साथ रेखा को लिया था. लेकिन कुछ दिन बाद अमिताभ को बाहर कर संजय खान को ले लिया गया. अमिताभ को लेकर शुरू की गयी 'अपराजिता' और 'पतझड़' जैसी फ़िल्में भी कुछ शूटिंग के बाद बीच में रोक दी गयीं.

अमिताभ के लिए सबसे दुखद तो शायद यह रहा कि उन्हें ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी फ़िल्म 'गुड्डी' में नायिका जया भादुड़ी के अपोज़िट लेकर और चार दिन की शूटिंग के बाद निकाल, उनकी जगह अभिनेता समित भंजा को ले लिया. जबकि ऋषि दा के साथ ही अमिताभ ने 'आनंद' फ़िल्म की थी. इसका अफ़सोस जया भादुड़ी को भी हुआ.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

'गुड्डी' से निकले पर 'गुड्डी' ज़िंदगी में आ गयी

बच्चन जी की वह पंक्ति 'मन सा हो तो अच्छा, मन सा न हो तो और भी अच्छा' अमिताभ की ज़िदगी में फिर अहम बन गयी. 'गुड्डी' से निकाले जाने पर जया को अमिताभ से विशेष सहानुभूति होने लगी. जो बाद में धीरे-धीरे प्यार में बदल गयी.

उधर उन दिनों प्रकाश मेहरा अपनी फ़िल्म 'ज़ंजीर' के लिए नायक तलाश रहे थे. प्रकाश मेहरा 'ज़ंजीर' को धर्मेन्द्र के साथ बनाने वाले थे. लेकिन धर्मेन्द्र से बात न बनने पर देव आनंद और राज कुमार सहित कुछ अन्य अभिनेताओं से भी प्रकाश मेहरा की बात हुई. लेकिन कहीं और बात न बनने पर अमिताभ बच्चन से बात फ़ाइनल हो गयी.

लेकिन तब अमिताभ के साथ कोई नायिका फ़िल्म करने को तैयार नहीं थी. ऐसे में जया जी ने तुरंत अमिताभ के साथ काम करने के लिए स्वीकृति दे दी. फ़िल्म 'ज़ंजीर' और इसमें अमिताभ की पुलिस इंस्पेक्टर विजय की भूमिका ने सफलता-लोकप्रियता के जो रंग दिखाए उसकी चमक पूरे फ़िल्म उद्योग में फैल गयी.

देश में एक नए सुपर स्टार का उदय हो चुका था. अमिताभ बच्चन की इस फ़िल्म से एक विद्रोही अभिनेता, एंग्री यंग मेन की जो छवि उभरी उसने इतिहास लिख दिया.

इसके बाद अमिताभ ने हिंदी सिनेमा में जो एक से एक नायाब फ़िल्म दी है, वह कहानी किसी से छिपी नहीं है. 'ज़ंजीर' फिल्म की सफलता के बाद गुड्डी यानी जया भी उनकी जीवन संगिनी बनकर उनकी ज़िंदगी में आ गयी थीं.

अब बरसों से अमिताभ बच्चन देश के एक ऐसे महानायक बने हुए हैं जिनका मुक़ाबला करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लगता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार