अमोल पालेकर विवाद के बाद एनजीएमए को लेकर क्या हो रहा है असर?

  • 12 फरवरी 2019
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अभिनेता अमोल पालेकर के साथ मुंबई की नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न ऑर्ट यानी एनजीएमए में हुए विवाद का कुछ असर होता हुआ नज़र आ रहा है.

एनजीएमए ने स्पष्टीकरण दिया है कि उसने कोई भी एडवाइज़री कमेटी ख़त्म नहीं की है और न ही इसकी कोई योजना है. एनजीएमए के महानिदेशक अद्वैत गडनायक ने ट्वीट कर कहा है कि दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू की एडवाइज़री कमेटी ख़त्म नहीं की गई है, बल्कि इनके कार्यकाल समाप्त हो चुके हैं और नई कमेटी के गठन का काम चल रहा है.

उन्होंने ये भी कहा कि किसी भी कलाकार की पहले से तय प्रदर्शनियां बाक़ायदा अपने वक़्त पर आयोजित होंगी.

शनिवार को मुंबई में कलाकार प्रभाकर बर्वे की प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह के दौरान एनजीएमए सदस्यों की टोकाटोकी की वजह से अमोल पालेकर को अपना भाषण बीच में ही ख़त्म करना पड़ा था.

पालेकर ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संस्कृति मंत्रालय पर आरोप लगाया था कि वह कलाकारों पर सेंसरशिप कर रही है.

व्यवस्थागत दिक्कतें

लेकिन मुंबई और बंगलुरू के कलाकारों ने बीबीसी हिंदी को बताया कि एनजीएमए की कार्यप्रणाली में व्यवस्थागत दिक़्क़तें हैं, जिसे चलताऊ तरीक़े से नहीं सुलझाया जा सकता. एडवाइज़री कमेटी की हर सिफ़ारिश को अब भी दिल्ली में नौकरशाहों की 'मंज़ूरी' मिलनी ज़रूरी होती है. संस्कृति मंत्रालय ने एनजीएमए का गठन व्यूजुअल आर्ट को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया था.

बंगलुरू के एक कलाकार रवि काशी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "अच्छा होगा कि एनजीएमए लिखित में अपनी नीतियां जारी करे. ताकि हम भी तदर्थ फ़ैसलों के बजाय लिखित में इनका जवाब दे सकते हैं."

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मुंबई के पेंटर सुधीर पटवर्धन ने कहा, "यहां ये समस्या लंबे समय से रही है, ये कोई नई नहीं हैं. अब भी एनजीएमए में कर्मचारियों की कमी है. कई पदों पर कोई नियुक्तियां नहीं की गई हैं और फंड्स की भी हालत ख़राब है."

गडनायक ने ट्विटर पर एक बयान जारी कर कहा कि बंगलुरू और मुंबई में कलाकारों की एडवाइज़री कमेटी का कार्यकाल तीन साल के बाद क्रमश: नवंबर और जनवरी में ख़त्म हो गया था.

लेकिन कलाकारों की असल दिक़्क़त नौकरशाही व्यवस्था से है. पटवर्धन और बंगलुरू स्थित कलाकार एसजी वासुदेव दोनों मुंबई में नए नियमों की वजह से अपनी प्रदर्शनियां नहीं लगा पाएंगे.

वासुदेव कहते हैं, "नए नियम के मुताबिक़ एनजीएमए का सिर्फ़ छठा हिस्सा ही प्रदर्शनियों के लिए इस्तेमाल हो सकता है. और मुझे बताया गया है कि मैं जून या जुलाई में प्रदर्शनी लगा सकता हूँ. लेकिन ये मुंबई में सही वक़्त नहीं है क्योंकि उस वक़्त मॉनसून रहता है."

पटवर्धन ने कहा, "हमने इस बारे में महानिदेशक को लिखा है कि इस बारे में फिर से विचार करने की ज़रूरत है. लेकिन एक महीने से अधिक हो गया है, हमें कोई जवाब नहीं मिला है. ये वाक़ई में काम करने का अव्यवस्थित तरीक़ा है."

समस्या और भी अधिक जटिल हो जाती है अगर उन्हें प्रदर्शनी आयोजित करने के लिए कम जगह दी जाए. कोई भी निजी आर्ट गैलरी जो इस तरह की प्रदर्शनियां आयोजित करने के लिए फ़ंड देती है, उनकी इसका हिस्सा बनने में दिलचस्पी नहीं रहेगी.

जोश की कमी

एनजीएमए में पर्याप्त फ़ंड नहीं होने की वजह से कलाकार को अपनी प्रदर्शनी प्राइवेट आर्ट गैलरी में लगानी होती है.

मुंबई की कलाकार बृंदा मिलर कहती हैं, "एनजीएमए के पास ये सब करने का जज़्बा नहीं है. उनमें जोश की कमी है. कला में धैर्य की आवश्यकता होती है."

वासुदेव मानते हैं कि अगर एडवाइज़री कमेटी होती तो उन्हें प्रदर्शनी का आयोजन करने के लिए जगह देने से इनकार नहीं किया जा सकता था. केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय को दख़ल नहीं देना चाहिए कि प्रदर्शनी के आयोजन के लिए कितनी जगह का इस्तेमाल हो.

लेकिन एडवाइज़री कमेटी के मामले में रवि कहते हैं, "पूर्व में कई अच्छी एडवाइज़री कमेटियां रही हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से कोई ये भी नहीं जानता कि सदस्यों का आर्टिस्टिक बैकग्राउंड क्या है. इसीलिए अगर एडवाइज़री कमेटियों का पुनर्गठन होता है तो ये सिर्फ़ नाम की कमेटियां नहीं होनी चाहिए."

बृंदा मिलर भी एडवाइज़री कमेटी की सदस्य रही हैं. बृंदा कहती हैं, "एनजीएमए को प्रमोट तक नहीं किया जाता. होना ये चाहिए कि इस जगह को ठीक से चलाया जाए."

ये कलाकार उन नौकरशाहों की तारीफ़ करना नहीं भूलते जिन्होंने कला के बारे में ज़्यादा कुछ अता-पता नहीं होने के बावजूद बहुत अच्छा काम किया, क्योंकि वे अच्छे आयोजक थे और अपने काम को लेकर बेहद जोशीले थे.

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रवि बताते हैं, "मसलन जवाहर सरकार (जो कि संस्कृति सचिव थे), ने एक राष्ट्रीय कमेटी बनाई थी, जिसकी दिल्ली में कई बार बैठक हुई. इसकी उप समितियों ने नीतियां, कार्यक्रम और निजी क्षेत्र के साथ काम करने के तरीक़ों के बारे में नियम तय करने का काम किया. इसमें क्षेत्र से जुड़े विभिन्न विशेषज्ञ शामिल थे. जैसे ही सरकार यहाँ से गए, उनके सब कामों को भुला दिया गया. "

रवि कहते हैं, "मौजूदा व्यवस्था कलाकारों के अनुकूल नहीं है."

लेकिन, अमोल पालेकर को जिस तरह से बोलने से रोका गया, अधिकतर कलाकार उसे लेकर हैरान हैं. मिलर कहती हैं कि पालेकर को एनजीएमए के मुद्दे पर बोलने की ज़रूरत नहीं थी. लेकिन जिस तरह से उन्हें रोका गया, वो ठीक नहीं था. मिलर कहती हैं, "ये पूरी तरह से राजनीतिक था और बेवजह उकसाने वाला था."

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