आर्टिकल 15: आयुष्मान खुराना की फ़िल्म के ट्रेलर पर क्यों हो रही है बहस?

  • 4 जून 2019
इमेज कॉपीरइट zee/TrailerGrab
Image caption आर्टिकल 15 के एक सीन में आयुष्मान खुराना

"धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी भी आधार पर राज्य अपने किसी भी नागरिक से कोई भेदभाव नहीं करेगा. ये मैं नहीं कह रहा, भारत के संविधान में लिखा है."

अनुभव सिन्हा निर्देशित और आयुष्मान खुराना अभिनीत फ़िल्म आर्टिकल 15 का महज़ एक डायलॉग समझने की भूल मत कीजिएगा. ये भारतीय संविधान के आर्टिकल (अनुच्छेद) 15 की पहली लाइन है. आर्टिकल 15 यानी समानता का अधिकार.

यूं तो भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था लेकिन बीते कुछ सालों में ये अलग-अलग वजहों में लगातार चर्चाओं में रहा है.

कभी सत्ता में बैठे लोगों की ओर से संविधान संशोधन को लेकर तो कभी विपक्षी पार्टियों की ओर से संविधान को ख़तरे में बताने की वजह से.

ऐसे में जब 'आर्टिकल 15' नाम से फ़िल्म आ रही है तो इसकी चर्चा सोशल मीडिया पर भी हो रही है. रिलीज़ के कुछ ही घंटों में 'आर्टिकल 15' के ट्रेलर को लाखों लोगों ने देखा.

आइए पहले आपको बताते हैं कि आख़िर आर्टिकल 15 है क्या और क्यों मौजूदा दौर में संविधान के इस आर्टिकल पर फ़िल्म के बहाने हो रही बहस को कुछ लोग ज़रूरी मान रहे हैं.

संविधान इमेज कॉपीरइट AFP

समानता के अधिकार यानी आर्टिकल 15

15 (1). राज्य किसी नागरिक से केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इसमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा.

इसी आर्टिकल 15 के बारे में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वक़ील अवनि बंसल कहती हैं कि संविधान समानता का अधिकार देता है.

संविधान की रचना ही इस आधार पर की गई है कि देश के किसी नागरिक के साथ भेदभाव न हो लेकिन यह सच्चाई है कि संविधान में लिखित तथ्यों का ज़मीनी स्तर पर पालन नहीं हो पाता.

भारतीय संविधान इमेज कॉपीरइट legislative.gov.in

अवनि मानती हैं कि भले ही क़ानून कुछ भी कहे लेकिन उसे ज़मीनी स्तर पर लागू कराने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की है और ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रशासन इसका सख़्ती से पालन करवाए.

ऊना में दलितों की पिटाई. देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों की बारात रोकने और मुसलमानों के साथ गाय को लेकर हुई मारपीट. ऐसी घटनाओं को याद करें तो आप पाएंगे कि आर्टिकल 15 को बार-बार याद रखने की ज़रूरत क्यों है?

आर्टिकल 15 का एक सीन इमेज कॉपीरइट zee/TrailerGrab
Image caption आर्टिकल 15 का एक सीन

फ़िल्म आर्टिकल 15 की कहानी क्या है

आर्टिकल 15 के ट्रेलर के कुछ दृश्य साल 2014 में बदायूं के कटरा शहादतगंज गांव में दो चचेरी बहनों की मौत से जुड़े हुए लगते हैं.

इस मामले में दो चचेरी बहनों के शव पेड़ से लटके मिले थे. पहले गैंग रेप के बाद हत्या की बात कही गई, फिर कहा गया कि दोनों बहनों ने आत्महत्या कर ली. कई बार ये भी बयान आया कि बच्चियों के पिता ने उनकी हत्या कर दी.

आर्टिकल 15 फ़िल्म के सह-लेखक गौरव सोलंकी ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''यह फ़िल्म सिर्फ़ एक घटना पर आधारित नहीं है. हर रोज़ कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है और ये फ़िल्म उन सभी घटनाओं को समाहित करती है.''

लेकिन इस फ़िल्म को बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?

इस सवाल के जवाब में गौरव कहते हैं, ''अमूमन शहरों में रहने वाले एक बड़े वर्ग को लगता है कि जात-पात का भेदभाव अब रह नहीं गया है, ये सब गुज़रे जमाने की बात हो गई लेकिन ऐसा नहीं है. देश के बहुत से हिस्सों में अब भी इस तरह का भेदभाव कायम है.''

गुजरात में दलितों का प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट AFP

आर्टिकल 15 फ़िल्म कितनी असरदार होगी?

ट्रेलर में आयुष्मान खुराना भेदभाव ख़त्म करने की बात करते हुए नज़र आते हैं.

ये फ़िल्म 28 जून को रिलीज़ होगी लेकिन कुछ लोगों ने ट्रेलर पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया है. वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल का मानना है कि इस तरह की फ़िल्मों से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.

दिलीप मंडल कहते हैं, ''ये एंटी-कास्ट फ़िल्म नहीं है बल्कि जाति को लेकर जो समाज में सालों से चली आ रही धारणाएं हैं ये फ़िल्म उन्हीं को पुष्ट करती है. यह फ़िल्म मानती है कि दलितों को आज भी अपने उद्धार के लिए एक मुक्ति दाता की ज़रूरत है और ये काम दलित ख़ुद नहीं कर सकते. फ़िल्म में यह उद्धारकर्ता एक ब्राह्मण आईपीएस है.''

दिलीप कहते हैं, ''किसी भी समाज में परिवर्तन आंतरिक तौर पर होता है, उसे बाहर से थोपा नहीं जा सकता और यह माना जाना चाहिए कि दलित अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और परिवर्तन हो रहा है. ये फ़िल्म चल रही लड़ाई को पीछे ही ले जाएगी.''

लेकिन गौरव फ़िल्म को लेकर अभी किसी भी तरह की राय बना लेने को जल्दबाज़ी कहते हैं. उनका कहना है कि ट्रेलर किसी भी फ़िल्म का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा होता है, उसके आधार पर पूरी फ़िल्म की कल्पना कर लेना सही नहीं.

अब फ़िल्म इस सोच को आगे ले जाएगी या वाकई 'फ़र्क़' लाने में कामयाब होगी ये तो 28 तारीख़ के बाद ही तय हो पाएगा. पर जैसा कि फ़िल्म ये दावा करती है कि यह सत्य घटनाओं पर आधारित है तो आइए आपको इस फ़िल्म के एक सीन के साथ छोड़ जाते हैं. ताकि आप तय कर सकें कि ट्रेलर वाक़ई सच के क़रीब है?

भीम राव अंबेडकर इमेज कॉपीरइट Getty Images

फ़िल्म के एक दृश्य में आयुष्मान एक अधिकारी से बैठकर बात कर रहे हैं.

"सर ये तीन लड़कियां अपनी दिहाड़ी में सिर्फ़ तीन रुप अधिक मांग रही थीं

सिर्फ़ तीन रुप...

जो मिनरल वाटर आप पी रहे हैं, उसके दो या तीन घूंट के बराबर

उनकी इस ग़लती की वजह से उनका रेप हो गया सर

उनको मारकर पेड़ पर टांग दिया गया ताकि पूरी ज़ात को उनकी औक़ात याद रहे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार