कबीर सिंह की ‘बंदी’ से लेकर समलैंगिक सोनम तक

  • 26 दिसंबर 2019
बीबीसी

बीहड़ में गोलियों की बौछार के बीच फ़िल्म सोनचिड़िया का ये डायलॉग दिल के आर-पार हो जाता है - "औरत की जात अलग होत है".

बलात्कार का शिकार हुई दलित बच्ची को बचाने की कोशिश में चंबल के डाकुओं की बीच भाग रही कथित ऊंची जाति की इंदुमती (भूमि पेडनेकर) से ये बात महिला डकैत फूलिया तब बोलती हैं जब इंदुमति डाकुओं के दो ऐसे गुटों के बीच फँस जाती है जो अलग-अलग जात के हैं.

बंदूकों से लैस पर बेबस फूलिया जैसे बता रही हो कि ऊंची-नीची जातियों में बंटे समाज में भी औरत सबसे निचली पायदान पर है.

साल 2019 में कई ऐसी हिंदी फ़िल्में आई हैं जो औरत के नज़रिए को दिखाने की कोशिश करती दिखीं. वहीं कई फ़िल्मों ने असहज करने वाले सवाल छोड़े.

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कबीर सिंह

साल 2019 में आई फ़िल्म कबीर सिंह एक 'डिसरप्टर' फ़िल्म मानी जा सकती है.

फ़िल्म के लिए ख़ूब तालियाँ पड़ीं लेकिन ये आरोप भी लगे कि ये औरतों को नीचा दिखाने वाली फ़िल्म थी.

मसलन फ़िल्म में एक सीन है जहाँ प्यार में चोट खाया हीरो कबीर सिंह (शाहिद कपूर) एक लड़की को चाक़ू की नोक पर कपड़े उतारने को कहता है. लड़की की ना का उसके लिए कोई मतलब नहीं.

उसकी प्रेमिका का दुपट्टा ज़रा से सरकता है तो वो उसे ढँकने के आदेश देता है.

प्रेमिका को ये कहने में उसे कोई झिझक नहीं होती कि "कॉलेज में लोग तुम्हें सिर्फ़ इसलिए जानते हैं क्योंकि तुम कबीर सिंह की बंदी हो."

कबीर सिंह बिना उसकी मर्ज़ी पूछे हीरोइन को अपने साथ ले जाता है, छूता है, चूमता है, मारता है.

उससे भी ज़्यादा परेशान करने वाली बात ये कि वो लड़की उफ्फ़ तक नहीं करती.

फ़िल्म में जैसे उस लड़की को कोई आवाज़ या अधिकार ही नहीं दिए गए. सारे जज़्बात, प्यार, ग़ुस्सा, आक्रोश फ़िल्म के हीरो के हिस्से हैं.

उसकी 'बंदी' एक बंद, बेज़बान गुड़िया की तरह है. फ़िल्म गली बॉय की हीरोइन सफ़ीना (आलिया) से बिल्कुल उलट.

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गली बॉय की आलिया

गली बॉय की सफ़ीना (आलिया) अपनी बात साफ़-साफ़ रखती है, हक़ नहीं मिलने पर चिल्लाती है, कई बार बेकाबू भी हो जाती है.

पर सफ़ीना जानती है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं.

एक सीन में आलिया ईर्ष्यावश रणवीर की महिला दोस्त (कल्कि) के सर पर बोतल मारती है.

एक पल के लिए ही सही, उसमें रत्ती भर कबीर सिंह वाला पागलपन दिखाई देता है लेकिन वो उसके लिए शर्मिंदा भी होती है.

ज़ोया अख़्तर की इस फ़िल्म में कहानी भले ही रणवीर सिंह के इर्द गिर्द घूमती है, पर फ़िल्म की निर्देशक ज़ोया अख़्तर ने आलिया को अपनी अलग पहचान दी है.

ऐसे सीन कितनी फ़िल्मों में देखने को मिलते हैं जहाँ फ़िल्म की हीरोइन हीरो को ये भरोसा दिलाती है कि तुम अपना सपना पूरा करो, मैं हूँ ना पैसे कमाने के लिए.

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आर्टिकल 15

जेंडर की बात करें तो इस साल उन्नाव और हैदराबाद में बलात्कार के दिल दहलाने वाले मामले आए. उसकी झलक फ़िल्म आर्टिकल 15 में दिखाई दी.

'रेप समझती हो बच्चे?' फ़िल्म आर्टिकल 15 में एक युवा पुलिस अधिकारी (आयुष्मान खुराना) 15-16 साल की एक बच्ची को ये समझाने की कोशिश कर रहा है कि उसके भाई ने 'निचली जात' की एक लड़की का रेप किया है और अब वो ख़ुदकुशी कर चुका है.

फ़िल्म आर्टिकल 15 भले ही हीरो आयुष्मान खुराना की नज़र से दिखाई गई है लेकिन इसे जेंडर सेंसटिव फ़िल्म कहा जा सकता है.

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क लड़की को देखा तो ऐसा लगा

साल की सबसे हैरान करने वाली फ़िल्मों में से एक थी शैली चोपड़ा धर की 'इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा'.

समलैंगकिता पर कई फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन भारत में दो लड़कियों की प्रेम कहानी को मेनस्ट्रीम सिनेमा में दिखाने की हिम्मत कम ही फ़िल्मकार कर पाए हैं.

फ़िल्म की कमाई बहुत न भी हुई हो लेकिन सोनम कपूर ने एक लेस्बियन लड़की को रोल कर नैरेटिव को तोड़ने की कोशिश ज़रूर की है.

फ़िल्म की लेखिका हैं ग़ज़ल धालीवाल जिन्होंने एक लड़के से असल ज़िंदगी में लड़की बनने का सफ़र तय किया है.

दादियों पर बनी फ़िल्म

2019 में ऐसी कुछ ही फ़िल्में रहीं जहाँ सारा नैरेटिव मर्दों के इर्द गिर्द नहीं औरतों के आसपास घूमता है.

70-80 अस्सी साल की दो निशानेबाज़ दादियों की असल कहानी पर निर्देशक तुषार हीरानंदानी की फ़िल्म 'सांड की आँख' ऐसी ही एक फ़िल्म रही.

हालांकि दादी के रोल में उम्रदराज़ अभिनेत्रियों की जगह दो युवा हीरोइनों (तापसी और भूमि) को लेने के फ़ैसले ने फिर से इस बहस को छेड़ दिया कि भारत में उम्दा लेकिन उम्रदराज अभिनेत्रियों के लिए मौक़े कम ही होते हैं.

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एक्टर भी, डायरेक्टर भी

महिला किरदारों पर बनी एक अहम फ़िल्म रही कंगना रनौत की मणिकर्णिका - द क्वीन ऑफ़ झाँसी.

इसे निर्देशक राधा कृष्ण और कंगना ने मिल कर डाइरेक्ट किया जिसे लेकर काफ़ी विवाद भी हुआ.

पुरुषों के मुकाबले हिंदी सिनेमा में ऐसी बहुत कम अभिनेत्रियाँ हैं जिन्होंने एक्टिंग और निर्देशन दोनों किया हो.

मसलन शोभना समर्थ जिन्होंने अपनी दोनों बेटियों नूतन औल तनूजा को लॉन्च किया. नंदिता दास, अपर्णा सेना, कोंकणा सेन जैसे कुछ और नाम हैं इस लिस्ट में.

कितनी फ़िल्में महिलाओं ने बनाईं?

महिला निर्देशकों की बात चली है तो 2019 में कुछ फ़िल्में बनीं जो महिलाओं ने बनाईं - ज़ोया अख़्तर (गली बॉय ), द स्काई इज़ पिंक (सोनाली बोस), इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा (शैली चोपड़ा धर), ख़ानदानी शफ़ाख़ाना (शिल्पी दासगुप्ता), मोतीचूर चकनाचूर (देबमित्रा).

हालांकि जेंडर को लेकर जो संवेदनशीलता चाहिए उसमें अब भी हिंदी फ़िल्मों को लंबा सफ़र तय करना है .

वरना हाउज़फ़ुल-4 जैसी अक्षय कुमार की बड़ी कॉमर्शियल फ़िल्म में इस तरह के डायलॉग नहीं होते- जिसने जेंडर का टेंडर नहीं भरा (समलैंगकिता पर कटाक्ष).

या पति पत्नि और वो के ट्रेलर में ये डायलॉग नहीं होता- बीवी से सेक्स माँग ले तो हम भिखारी, बीवी को सेक्स मना कर दें तो हम अत्याचारी और किसी तरह जुगाड़ लगा के उससे सेक्स हासिल कर लें तो बलात्कारी भी हम.

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कितनी आसानी से डायलॉग मैरिटल रेप का मज़ाक उड़ाकर निकल जाता है. वही रेप जिससे जुड़े कई पहलुओं पर बात करने की कोशिश फ़िल्म सेक्शन 375 ने की है.

वैसे लोगों के विरोध के बाद इस डायलॉग को हटाना पड़ा था जो शायद कुछ साल पहले मुमकिन ना होता.

साल 2020 की शुरुआत एसिड अटैक झेल चुकी एक लड़की पर बनी फ़िल्म छपाक से हो रही है जो कुछ उम्मीद बंधाती है.

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