आज की फ़िल्मों से प्यार क्यों हैं ग़ायब?

  • 27 जनवरी 2020
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हिन्दी सिनेमा में सालों तक प्रेम कहानियां फ़िल्म की 'रीढ़ की हड्डी' रही हैं. कहानी के ख़त्म होते-होते हीरो हीरोइन से मिल ही जाता है.

बीच में कोई गुंडा या विलेन होता है या लड़की के पिताजी गले की हड्डी बन जाते हैं.

'मुग़ल-ए-आज़म' में शहंशाह अकबर ने अनारकली और सलीम के प्यार में खूब रोड़े अटकाए, लेकिन इसके बावजूद हीरो हीरोइन मिले, पेड़ के आसपास गाना गाए और देखते-देखते तीन घंटे बीत गए- द एंड.

लेकिन अब इस प्यार को लग गया है झटका.

पोस्टर पर सिर्फ़ नायक या नायिका

2019 में आई फ़िल्मों पर ध्यान दीजिए . 'उरी' एक वॉर फ़िल्म है. ऋतिक रोशन की 'वॉर' में फ़िल्म के नाम से ही पता चल जाता है कि आख़िर मुख्य कहानी क्या है.

ऐसा नहीं है कि इन फ़िल्मों से प्यार पूरी तरह ग़ायब था लेकिन कहानी का प्लॉट कुछ और ही था. यानी लोगों को अगर सिनेमा हॉल तक लाना है तो सिर्फ़ प्यार से काम नहीं चलेगा.

और भी उदाहरण हैं जैसे ऋतिक रोशन की 'सुपर 30', अक्षय कुमार की 'मिशन मंगल', जॉन अब्राहम की 'बाटल हाउस', रानी मुखर्जी की 'मर्दानी' और आयुष्मान खुराना की 'आर्टिकल 15'. इन सब के पोस्टर्स से नायक या नायिका गायब थे.

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इसका एक कारण ये भी है कि अब साउथ की फ़िल्मों को हिन्दी में बनाने का चलन ज़ोरों पर है और वहां बहुत सारा एक्शन होता है . एक और कारण ये भी है कि अब लोगों की ज़िंदगी की कहानी बड़े पर्दे पर दिखाई जा रही हैं .

पिछले कई सालों से बायोपिक बहुत कामयाब हुईं जैसे 'भाग मिल्खा भाग', 'मेरी कॉम', 'डर्टी पिक्चर' और 'संजू'.

कहानियां हैं एक शख़्स की और उसके व्यक्तित्व की

अब 2020 में आने वाली फ़िल्मों को ही ले लीजिए . दीपिका की 'छपाक', कंगना की 'पंगा', और आमिर ख़ान की 'लाल सिंह चड्ढा' के पोस्टर्स में प्यार मोहब्बत का नामों निशान है ही नहीं.

ये आम लोगों की कहानियां हैं जो उनका व्यक्तित्व बयान करती हैं.

रणवीर सिंह की '83' भारत के साल 1983 में क्रिकेट विश्व कप की जीत पर आधारित है तो वहीं कंगना की 'थलइवा' एक मशहूर नेता की कहानी है.

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70 के दशक का 'एंग्री यंग मैन'

ऐसा नहीं है कि प्यार को झटका पहली बार लगा है.

70 और 80 के दशक में अमिताभ बच्चन के अवतार में आया 'एंग्री यंग मैन' और उनकी फ़िल्म 'कालिया',' ज़ंजीर', 'त्रिशूल' जैसी फ़िल्मों में प्यार की कहानी थी तो ज़रूर पर साइड ट्रैक पर चलती रही.

80 के दशक के ख़त्म होते होते फिर प्यार की कहनियों ने वापसी की और 'मैने प्यार किया' और 'क़यामत से क़यामत तक' जैसी फ़िल्मों के साथ इसकी शुरुआत की.

इन दोनों दशकों में जहाँ सुनहरे पर्दे पर 'एंग्री यंग मैन' की छवि बनी तो उसके साथ ही आए सिनेमा के सबसे मशहूर विलन 'गब्बर सिंह', 'लॉयन' और 'शाकाल'.

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हिन्दी सिनेमा का रुझान 90 के दशक में प्यार की तरफ़ रहा.

दर्शकों ने 'हम आपके हैं कौन', 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएँगे', 'दिल तो पागल है' और 'कुछ कुछ होता है' जैसी फ़िल्मों को बहुत पसंद किया.

पर 2010 के बाद सलमान ख़ान की 'दबंग', रोहित शेट्टी की 'सिंघम' और अक्षय कुमार की ढेर सारी देश भक्ति से सराबोर फिल्मों से एक बार फिर एक्शन ने अपनी पकड़ मज़बूत की.

पर एक्शन कितनी देर तक हिंदी सिनेमा में बना रहेगा ये सब फ़िल्मों के शौकीनों पर निर्भर करता है जिनकी रुचि सिनेमा को लेकर निरंतर बदलती रहती है.

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