सैफ़ बोले, 'तानाजी' में जो दिखाया गया वो ख़तरनाक

  • 20 जनवरी 2020
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जाने-माने अभिनेता सैफ़ अली ख़ान ने 'तानाजी: द अनसंग वॉरियर' जैसी फ़िल्मों में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ को ख़तरनाक बताया है.

फ़िल्म कैंपेनियन के लिए पत्रकार अनुपमा चोपड़ा को दिए इंटरव्यू में सैफ़ ने कहा है कि उन्हें उदयभान राठौर का किरदार बहुत आकर्षक लगा था इसलिए छोड़ नहीं पाए लेकिन इसमें पॉलिटिकल नैरेटिव बदला गया है और वो ख़तरनाक है.

'तानाजी: द अनसंग वॉरियर' में सैफ़ के अलावा अजय देवगन ने भी अभिनय किया है.

सैफ़ ने इस इंटरव्यू में कहा है, ''कुछ वजहों से मैं कोई स्टैंड नहीं ले पाया...शायद अगली बार ऐसा करूं. मैं इस किरदार को लेकर बहुत उत्साहित था क्योंकि मुझे बहुत ही आकर्षक लगा था. लेकिन यह कोई इतिहास नहीं है. इतिहास क्या है इसके बारे में मुझे बख़ूबी पता है.''

सैफ़ ने कहा, ''मेरा मानना है कि इंडिया की अवधारणा अंग्रेज़ों ने दी और शायद इससे पहले नहीं थी. इस फ़िल्म में कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है. हम इसे लेकर कोई तर्क नहीं दे सकते. यह दुर्भाग्य ही है कि कलाकार उदारवादी विचार की वकालत करते हैं लेकिन वो लोकप्रियतावाद से बाज नहीं आते. यह अच्छी स्थिति नहीं है लेकिन सच्चाई यही है.''

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सैफ़ ने इस बात को स्वीकार किया है कि तानाजी में इतिहास की ग़लत व्याख्या की गई है. उन्होंने कहा कि किसी भी फ़िल्म की व्यावसायिक सफलता में इतिहास की ग़लत व्याख्या को उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.

सैफ़ अली ख़ान से बातचीत में अनुपमा चोपड़ा ने फ़िल्मकार कबीर ख़ान से हुई एक बातचीत का हवाला दिया. कबीर ख़ान ने कहा था कि वो ख़राब अभिनय और ढीली स्क्रिप्ट को बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन उन्हें राजनीतिक नैरेटिव में व्यावसायिक सफलता के लिए छूट बर्दाश्त नहीं हैं.

अनुपमा ने सैफ़ से पूछा कि तानाजी में जो पॉलिटिक्स दिखाई गई है वो सवालों के घेरे में है. क्या आप तानाजी की पॉलिटिक्स से इत्तेफ़ाक रखते हैं?

इस पर सैफ़ ने कहा, ''ये सही बात है कि इसकी पॉलिटिक्स का तथ्यों से कोई मेल नहीं है. इसे लेकर मैं केवल एक अभिनेता के तौर पर ही सहमत नहीं हूं बल्कि एक भारतीय के तौर पर भी नहीं हूं. मैंने ऐसी राजनीति पर पहले भी सवाल खड़े किए हैं. शायद मैं अगली बार से ऐसी कहानियों को लेकर सतर्क रहूं. ये रोल मुझे आकर्षक लगा इसलिए कर लिया. मुझे पता है कि यह इतिहास नहीं है लेकिन फिर सवाल उठता है कि मैंने यह रोल किया क्यों? लोगों को लगता है कि ऐसी फ़िल्में चलती हैं लेकिन ये ख़तरनाक है. एक तरफ़ हम उदारता और विवेक की बात करते हैं लेकिन दूसरी तरफ़ पॉपुलिस्ट तरीक़े को अपनाते हैं.''

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क्या इंडस्ट्री के भीतर भी ध्रुवीकरण बढ़ा है? इस पर सैफ़ ने कहा, ''हां, ऐसा है. देश विभाजन के बाद मेरे परिवार के जो लोग भारत छोड़कर चले गए, उन्हें लगा था कि बँटवारे के बाद भारत सेक्युलर नहीं रहेगा. दूसरी तरफ़ मेरे परिवार के कुछ लोगों ने भारत में ही रहने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि उन्हें लगा कि यह सेक्युलर देश है और कोई दिक़्क़त नहीं होगी.''

सैफ़ ने कहा, ''लेकिन अभी जिस दिशा में चीज़ें बढ़ रही हैं, उनसे लगता है कि शायद सेक्युलर ना रहे. अगर मैं अपनी और परिवार की बात करूं तो सारी ख़ुशियां हैं. अच्छे डॉक्टर हैं, बच्चों के पढ़ाई बेहतरीन तरीक़े से हो रही है. बढ़िया निवेश है और रिटर्निंग भी अच्छी है. लेकिन देश में धर्मनिरपेक्षता और बाक़ी चीज़ों पर जो बातें हो रही हैं, उनमें हम शामिल नहीं हैं. हमलोग इसके लिए नहीं लड़ रहे हैं. हां, स्टूडेंट्स लड़ रहे हैं. जब हम किसी मुद्दे पर स्टैंड लेते हैं या टिप्पणी करते हैं तो फ़िल्में बैन कर दी जाती हैं. लोगों को नुक़सान पहुंचाया जाता है. ऐसे में लोग ऐसा करने से बचते हैं. ज़्यादातर लोग इन मामलों में अपने परिवार और पेशा को नुक़सान नहीं पहुंचाना चाहते हैं.''

'तानाजी' फ़िल्म में गड़बड़ क्या है?

इस फ़िल्म में मुग़लों को विदेशी दिखाया गया है. मुग़ल भारत में पीढ़ियों से रहे थे लेकिन उन्हें पूरी तरह से विदेशी दिखाया गया है. मुग़ल-ए-आज़म (1960) में अकबर को भारतीय की तरह दिखाया गया था. जोधा अकबर (2008) में अकबर को ऐतिहासिक तथ्य से बिल्कुल उलट दिखाया गया.

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जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया ने बीबीसी से कहा था कि जोधा-अकबर फ़िल्म में जिस जोधा बाई को अकबर की पत्नी के तौर पर दिखाया गया, वो जोधा बाई नाम की कोई महिला थी ही नहीं. पद्मावत में भी अलाउद्दीन ख़िलजी को एक अय्याश मुस्लिम शासक के तौर पर दिखाया गया.

तानाजी में मुग़लों का संदर्भ बिल्कुल हवा-हवाई है. यहां मुग़ल कमांडर ख़ुद को ही मौक़ापरस्त कहता है. फ़िल्म में मुग़ल और मुसलमान किरदारों को हरे कपड़े में रखा गया है. यह एक स्टीरियोटाइप है.

फ़िल्म की शुरुआत में ही नैरेटर दावा करता है कि हिन्दू (राजपूत) के ख़िलाफ़ हिन्दू (मराठा) को लड़ाना औरंगज़ेब का सबसे बड़ा धोखा था. हालांकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि मुग़लों की मनसबदारी में राजपूतों की भी निर्णायक भागीदारी थी लेकिन फ़िल्म की ये लाइनें साफ़ कर देती हैं कि वो क्या दिखाने जा रहे हैं.

इसमें मराठाओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को क़ीमती बताया गया है जबकि मुग़लों और राजपूतों की महत्वकांक्षा का बहुत ही सरलीकरण किया गया है. सैफ़ अली ख़ान के उदयभान राठौर के किरदार को निगेटिव दिखाया गया है क्योंकि उसे औरंगज़ेब का वफ़ादार बताया गया है.

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