'नागिन' की बीन वाली अमर धुन बनने की कहानी

  • प्रदीप सरदाना
  • वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म समीक्षक
नागिन

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मन डोले मेरा तन डोले, मेरे दिल का गया करार रे, ये कौन बजाये बाँसुरिया….

सन 1954 में प्रदर्शित फिल्म 'नागिन' के इस गीत पर जब अभिनेता प्रदीप कुमार बीन बजाते हैं तो उस बीन की धुन पर अभिनेत्री वैजयंतीमाला बेसुध होकर नाचने लगती हैं.

बीन की इस धुन ने लाखों-करोड़ों लोगों पर भी ऐसा जादू चलाया था कि आज तक वह जादू कायम है जबकि अब फिल्म 'नागिन', इस गीत और इस बीन धुन को आये 65 साल का लंबा अरसा हो गया है.

लेकिन इस बीन का आज तक कोई और ऐसा मधुर तोड़ नहीं आया. आज भी बहुत सी फिल्मों और गीतों में संपेरे की यही पुरानी बीन धुन इस्तेमाल की जाती है.

इस बीन वाली धुन को बनाया था संगीतकार कल्याणजी आनंदजी की उस संगीतकार जोड़ी ने जिन्होंने आगे चलकर सन 1960 से 1990 के तीन दशकों में, कानों में रस घोलने वाली एक से एक कर्णप्रिय धुन देकर सिने संगीत को मालामाल कर दिया.

फिल्म संगीत की दुनिया की इस सुपर हिट जोड़ी के कल्याणजी तो पिछले बीस बरसों से इस दुनिया में नहीं हैं.

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कल्याणजी-आनंदजी की संगीतकार जोड़ी के साथ लता मंगेशकर, सायरा बानो, दिलीप कुमार और महेंद्र कपूर

'नागिन' की बीन धुन

लेकिन कल्याणजी के जोड़ीदार और छोटे भाई आनंदजी अब 2 मार्च 2020 को 87 साल के हो गए हैं. फिल्मों में संगीत देना तो इन्होंने बरसों पहले ही बंद कर दिया था. लेकिन आनंदजी इसके बावजूद आज भी संगीत के लिए समर्पित हैं.

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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पिछले दिनों मुंबई के पैडर रोड स्थित घर में उनसे मुलाकात हुई तो बहुत सी नई पुरानी बातों का लंबा सिलसिला चल निकला. अपनी बातचीत में वह हमेशा अपने बड़े भाई कल्याणजी को बहुत मान-सम्मान देते हैं. साथ ही, उन्हें तमाम पुरानी बातें आज भी ज्यों की त्यों याद हैं.

बात 'नागिन' की बीन धुन की ही की जाए तो आनंदजी बताते हैं, "नागिन फिल्म से पहले फिल्मों में बीन के लिए संपेरे की असली बीन को ही बजाया जाता था. लेकिन उसमें ख़ास मज़ा नहीं आता था. तभी भाईसाहब कल्याणजी लंदन से एक नया संगीत यंत्र कल्वायलिन लेकर आये. इसमें अलग-अलग किस्म की बहुत-सी ध्वनियां निकल सकती थीं."

ये वाद्य यंत्र की-बोर्ड का पुराना रूप है और धुन फूंक मारकर नहीं, बल्कि ऊँगलियों से बजाई गई है.

"कल्याणजी ने उन्हीं ध्वनियों के माध्यम से बीन की यह धुन इजाद की. तब 'नागिन' का संगीत हेमंत कुमार दे रहे थे. कल्याणजी हेमंत दा के सहायक थे. मैं भी भाईसाहब के साथ ही मिलकर काम करता था. लेकिन शुरू में जब 'सम्राट चन्द्रगुप्त' से भाईसाहब ने फिल्म में पूरा संगीत दिया तब भी संगीतकार के रूप में कल्याणजी वीरजी शाह का नाम गया, इसमें वीरजी हमारे पिताजी का नाम था."

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मर्द की शूटिंग के समय अमिताभ बच्चन को निर्देश देते मनमोहन देसाई

मनमोहन देसाई की पहली फिल्म

फिर आपका नाम उनके साथ जोड़ी के रूप में कब और कैसे गया?

ये पूछने पर आनंदजी बताते हैं, "'सम्राट चन्द्रगुप्त' के बाद सिर्फ कल्याणजी के नाम से हमारी कुछ और फ़िल्में आ चुकी थीं. तभी इस फिल्म के निर्माता सुभाष देसाई ने अपने भाई मनमोहन देसाई को निर्देशक बनाने के लिए एक साथ तीन फ़िल्में बनाने का फैसला लिया. जिसमें एक राज कपूर के साथ थी 'छलिया'. राज कपूर के साथ संगीतकार शंकर-जयकिशन होते थे. उन्होंने भाईसाहब से कहा आप 'छलिया' का संगीत दीजिए और अपने साथ आनन्द का नाम जोड़कर कल्याणजी आनंदजी की जोड़ी के रूप में संगीत दीजिए. हमने कहा अब तो कल्याणजी नाम स्थापित हो गया है, बदलें कैसे. इस पर वो बोले तुम यह छोड़ो, यह मेरी जिम्मेदारी है. तब उनकी सलाह पर हमने 'छलिया' फिल्म से कल्याणजी-आनंदजी के नाम से संगीत देना शुरू कर दिया."

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बीबीसी की ख़ास पेशकश संग संग गुनगुनाओगे में आज बात संगीतकार जोड़ी की.

'छलिया' में क़मर जलालाबादी गीतकार को लिया गया और इस फिल्म का गीत 'डम डम डिगा डिगा' ऐसा सुपर हिट हुआ कि फिल्म और फिल्म से जुड़े सभी लोग लोग चल निकले. उसके बाद इनके पास फिल्मों का ढेर लग गया.

मनमोहन देसाई की ये पहली फिल्म थी. इसके बाद उनके साथ 'ब्लफ़ मास्टर' और 'सच्चा झूठा' जैसी फ़िल्में भी इन्होंने कीं. यहाँ भी इनका संगीत और फिल्म सभी कुछ हिट रहा. 'सच्चा झूठा' का 'मेरी प्यारी बहनियां, बनेगी दुल्हनियां' तो भाई-बहन के प्रेम का एक अमर गीत है.

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'दिल भी तेरा हम भी तेरे'

कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी की यदि बेहद ख़ास बात देखी जाए तो उसमें एक यह भी है कि बहुत से निर्देशकों ने अपनी पहली फिल्म इसी जोड़ी के साथ शुरू की और उन सभी निर्देशकों की वह पहली फिल्म एक म्यूजिकल हिट साबित हुई. यहाँ तक कई सितारों की पहली हिट भी इन्हीं के साथ रही.

मिसाल के तौर पर अर्जुन हिंगोरानी की धर्मेन्द्र के साथ पहली फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' (1960) जिसके गीत 'मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो' या फिर मनोज कुमार की बतौर निर्माता-निर्देशक पहली फिल्म 'उपकार' (1967), जिसने 'मेरे देश की धरती सोना उगले' से एक ओर देश भक्ति के अमर गीतों की नयी बानगी पेश की. तो दूसरी ओर 'कसमे वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या' जैसे वह भावुक गीत.

मनोज कुमार के साथ बाद में कल्याणजी-आनंदजी ने 'पूरब और पश्चिम' फिल्म भी की, जिसका गीत संगीत सभी को झकझोर कर रख देता है. चाहे वह 'दुल्हन चली' हो या फिर 'भारत का रहने वाला हूँ' और 'पुरवा सुहानी आई रे' और 'ओम जय जगदीश हरे' की आरती जो आज भी सभी मंदिरों और धार्मिक समारोहों में उसी धुन पर गई जाती है, जो इस फिल्म में थी. इन्हीं के साथ मुकेश के स्वर में कालजयी गीत -'जब कोई तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे.'

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'ज़ंजीर' के गीत 'यारी है ईमान मेरा' की रिकॉर्डिंग के समय आनंद जी, प्रकाश मेहरा (बीच में) और मन्ना डे

प्रकाश मेहरा के साथ

जब कोई तुम्हारा हृदय तोड़ दे गीत को लेकर आनंदजी बताते हैं, "इस गीत को लेकर मनोज कुमार ने हमसे कहा, यहाँ नायक अकेले में यह गीत गा रहा है. इसलिए यहाँ बहुत कम साज का इस्तेमाल कीजिए. हमने ऐसा ही किया सिर्फ तीन यंत्र रखे लेकिन जब हम रिकॉर्डिंग कर रहे थे तो हमको अजीब-सा लगता था क्योंकि हम अपने संगीत में बड़े ऑर्केस्ट्रा का इस्तेमाल करने के अभ्यस्त थे. इसके चलते इस गीत को हमको 40 बार रिकॉर्ड करना पड़ा तब जाकर वह गाना बना जो मनोज कुमार चाहते थे, हम चाहते थे."

मनोज कुमार, अर्जुन हिंगोरानी और मनमोहन देसाई के अलावा प्रकाश मेहरा, सुभाष घई, फिरोज खान, चंद्रा बारोट और सुलतान अहमद जैसे अन्य कई निर्देशकों ने भी अपनी पहली फिल्म कल्याणजी-आनंदजी के साथ की.

इनमें प्रकाश मेहरा के साथ तो उनकी पहली फिल्म 'हसीना मान जाएगी' से 'ज़ंजीर', 'हाथ की सफाई', 'हेराफेरी', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस' जैसी सुपर हिट फिल्मों के साथ 'घुंघरू', 'ईमानदार' और 'जादूगर' जैसी वे फ़िल्में भी हैं जो चल नहीं सकीं. लेकिन मेहरा की दूसरी फिल्मों में 'वादा करले साजना', 'मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है' जैसे सदाबहार गीत हैं. उधर, 'मुकद्दर का सिकंदर' के तो लगभग सभी गीत सुपर हिट रहे. 'रोते हुए आते हैं सब', 'दिल तो है दिल', 'सलाम ए इश्क मेरी जान ज़रा कुबूल कर लो', 'प्यार जिंदगी है' और 'ओ साथी रे तेरे बिना क्या जीना.'

'ओ साथी रे तेरे बिना क्या जीना' गीत को लेकर आनंदजी बताते हैं, "इस गीत की शुरुआत पहले 'तेरे बिना क्या जीना' से हो रही थी. लेकिन प्रकाश जी ने कहा इसमें शुरू में 'ओ साथी रे' जोड़ दो. हमने वैसे ही किया. उसके बाद हमने जब इसकी धुन बनाई तो ओ साथी रे को लंबा खींचते हुए हमने इसमें ऐसा दर्द डाला कि वही इस गीत की जान बन गया."

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गीतों में रहती है दार्शनिकता

आनंदजी बताते हैं, "हमारी ये कोशिश रही है कि अपनी फिल्मों में वे गीत जरुर रखें जिनमें कोई संदेश हो, जीवन की सच्चाई हो, दार्शनिकता हो. जैसे- 'समझौता ग़मों से कर लो', 'मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया', 'मेरे देश की धरती सोना उगले', 'हर किसी को नहीं मिलता', 'दिल को देखो चेहरा न देखो', 'आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूँ', 'परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना' और 'ज़िन्दगी का सफर है ये कैसा सफ़र कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं', जैसे बहुत से गीत. क्योंकि मैं समझता हूँ जो बिगड़ा हुआ है उसे संगीत हँसते-हँसते संवारने में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है. साथ ही, संगीत जीवन की बहुत सी मुश्किल बातों को भी सहजता से समझाने की ताकत रखता है."

इस जोड़ी ने बहुत से गीतकारों के साथ काम किया. कई गीतकारों को पहले मौके भी इन्होंने दिए. लेकिन किन गीतकारों के साथ आप ज्याद सहज थे?

ये पूछने पर आनंदजी कहते हैं, "हम सहज तो सभी के साथ थे. पर यदि यूँ कहें की ज्यादा ट्यूनिंग किसके साथ थी तो अंजान, इन्दीवर, आनंद बक्षी, गुलशन बावरा, कमर जलालाबादी और राजेन्द्र कृष्ण जैसे गीतकारों के साथ परस्पर अच्छी समझ होने के कारण इनके साथ काफी काम किया."

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मुकद्दर का सिंकदर की प्लैटिनम डिस्क की रिलीज़ के समय कल्याणजी-आनंदजी, साथ में अमिताभ बच्चन

बहुत से गायक-गायिकाओं को दिए मौके

कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी के फिल्म संगीत में एक और जिस योगदान के लिए याद किया जाता है वह यह कि इन्होंने कई नए सिंगर्स को पहले मौके दिए. जैसे- कुमार सानू, अलका याज्ञनिक, मनहर, साधना सरगम, कंचन और सपना मुखर्जी आदि.

साथ ही सुनिधि चौहान और जावेद अली जैसे कई सिंगर्स ऐसे भी हैं जिनको इन्होंने प्रशिक्षित किया. यूँ कल्याणजी-आनंदजी भाई ने लता, आशा, रफ़ी, किशोर, मुकेश और महेंद्र कपूर सहित अपने दौर के लगभग तमाम बड़े गायक-गायिकाओं के साथ काम करके सभी के लिए कई हिट नंबर दिए.

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तत्कालीन राष्ट्रपति आर वैंकटरमण से पद्मश्री सम्मान लेते समय आनंदजी

राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला

कल्याणजी आनंदजी को अपने काम के लिए कई पुरस्कार मिले. जिनमें फिल्म 'सरस्वती चंद्र' (1968) के लिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मी मिला और फिल्म 'कोरा कागज़' (1974) के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार भी.

यहाँ तक इनके फिल्म 'अपराध' के आशा भोंसले के गाये गीत 'ए नौजवां सब कुछ यहाँ' और इनकी एक और फिल्म 'डॉन' के 'ये मेरा दिल प्यार का दीवाना' की धुन को जब एक अफ़्रीकी बैंड ब्लैक आइड ने अपने यहाँ अपनी एक एलबम में 'मंकी बिजनेस' में इस्तेमाल किया तो उसे इसके लिए अफ्रीकी बैंड को ग्रेमी अवार्ड मिला.

उस बैंड ने इसके लिए इस जोड़ी को क्रेडिट दिया और इन्हें अवॉर्ड के समय अमरीका आमंत्रित भी किया.

जीवन में आनंद ही आनंद

लगभग 250 फिल्मों के करीब 1200 गीतों की यादगार-शानदार धुनें बनाने के बावजूद सिर्फ एक फिल्म फेयर पुरस्कार मिलना क्या कुछ दुखी नहीं करता?

ये पूछने पर आनंदजी कहते हैं, "नहीं बिल्कुल दुःख नहीं है. मैं यह मानता हूँ इच्छाएं कभी ख़त्म नहीं होतीं. जो भाग्य में होता है वह मिलता ही है. मुझे जो मिला मैं उससे बहुत खुश हूँ, संतुष्ट हूँ, मेरे जीवन में आनंद ही आनंद है. आज भी संगीत कायक्रमों के लिए देश-विदेश में जाता रहता हूँ. अपने परिवार के साथ रहने में, उनके साथ गप-शप करना मुझे अच्छा लगता है. रहा पुरस्कार मिलने का तो हमने हमेशा अपने काम पर फोकस किया. जो पुरस्कार अपने आप मिला वह खुश होकर लिया. पुरस्कार लेने की जोड़-तोड़ और जुगाड़ में हम कभी नहीं रहे. क्योंकि पुरस्कार किसको क्या मिले यह याद नहीं रहता. लेकिन किसने कौन कौन से गीत रचे ये सभी सदियों तक याद रखेंगे."

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