दाऊद और अंडरवर्ल्ड के पीछे इस कदर क्यों भागता है बॉलीवुड?

  • मधुपाल
  • मुंबई से, बीबीसी हिंदी के लिए
राम गोपाल वर्मा की नई फ़िल्म डी कंपनी

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बॉलीवुड अंडरवर्ल्ड की दुनिया को बड़े पर्दे पर अक्सर दिखाता आया है.

90 के दशक की बात करें तो बड़े पर्दे पर ऐसी कई कहानियों ने जन्म लिया जिनकी पृष्ठभूमि में या तो अंडरवर्ल्ड डॉन थे या फिर उनके द्वारा किए गए हमलों का ज़िक्र.

बड़े पर्दे पर उस 'आतंक' की झलक अक्सर दिखाई गई जो इन रियल लाइफ़ डॉन ने कभी दुनिया को दिखाई थी.

अंडरवर्ल्ड से जुड़े जितने भी बड़े नाम रहे हैं, उनकी कहानियों को सिल्वर स्क्रीन पर दर्शकों ने बहुत ही चाव से देखा है. फिर चाहे अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम हों या फिर इस जुर्म की दुनिया के दूसरे गैंगस्टर छोटा राजन, माया डोलस, मान्या सुर्वे हों, सभी को दर्शक देख चुके हैं.

इस बात से इनकार करना शायद मुश्किल है कि दाऊद इब्राहिम को देखने की फैंटेसी जितनी गहरी है, उतनी शायद किसी और किरदार की नहीं है.

अक्सर ये बात कही जाती रही है कि 80 और 90 के दशक में मुंबई और इसके बंदरगाहों पर अंडरवर्ल्ड की एक तरह से हुकूमत हुआ करती थी.

मुंबई से अंडरवर्ल्ड के सफ़ाए का दौर 1993 में सीरियल बम ब्लास्ट के बाद शुरू हुआ.

बॉलीवुड की फ़िल्मों में सीधे तौर पर या फिर घुमाफिराकर निर्देशक अनुराग कश्यप से लेकर राम गोपाल वर्मा तक कई निर्देशकों ने दाऊद इब्राहिम के किरदारों की झलक को ही दिखाने का प्रयास किया है.

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दाऊद के किरदार पर बनी ये फ़िल्में

दाऊद के किरदार पर बनी चर्चित फ़िल्मों का ज़िक्र करें तो अनुराग कश्यप की 'ब्लैक फ्ऱाइडे', राम गोपाल वर्मा की 'कंपनी' और निखिल आडवाणी की 'डी डे' है.

वहीं, मिलन लूथरिया ने 'वंस अपन ए टाइम इन मुंबई' में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद के उदय को दिखाया था. इन फ़िल्मों के अलावा हसीना पारकर और वेब सिरीज़ 'एक थी बेगम' में भी दाऊद का ज़िक्र किया गया है.

साल 2002 में आई फ़िल्म 'कंपनी' की कहानी दाऊद इब्राहिम की ज़िंदगी पर आधारित थी. फ़िल्म में मुख्य कलाकार अजय देवगन थे, जिन्होंने पर्दे पर दाऊद का किरदार निभाया. इसी फ़िल्म से अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने अपने करियर की शुरुआत की थी.

अब 2021 में एक बार फिर से जाने माने निर्देशक और निर्माता राम गोपाल वर्मा लेकर आ रहे हैं अपनी फ़िल्म 'डी कंपनी'.

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दाऊद के शुरुआती जीवन की कहानी है 'डी कंपनी'

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अपनी फ़िल्म 'डी कंपनी' का ज़िक्र करते हुए राम गोपाल वर्मा बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में कहते हैं, "मैं एक बार फिर से 'डी कंपनी' को लेकर दर्शकों के सामने आ रहा हूँ. इस फ़िल्म में मैं एक बार फिर से मुंबई के गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम को दिखा रहा हूँ.''

उन्होंने कहा, ''साल 2002 में आई मेरी फ़िल्म दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन की लड़ाई पर आधारित थी लेकिन इस बार की कहानी है दाऊद के शुरूआती जीवन की. कैसे दाऊद बना मुंबई का डॉन और कैसे शुरू की उसने अपनी डी कंपनी."

बॉलीवुड दाऊद की ज़िंदगी को बड़े पर्दे पर दिखाने के लिए इतना उतावला क्यों रहता है?

इस सवाल के जवाब में राम गोपाल वर्मा कहते हैं, ''जुर्म एक ऐसी चीज़ है जो लोगों को आकर्षित करती है. अगर आप अख़बार पढ़ें या टीवी पर देखें तो लोगों को उनकी बातें ज़्यादा आकर्षित करती हैं. जैसे कोई गैंग हो या मर्डर मिस्ट्री हो.''

उन्होंने कहा, ''आज दुनिया में गॉड फ़ादर से ज़्यादा लोकप्रिय कोई फ़िल्म नहीं होगी. लोगों को बोरिंग कहानी नहीं पसंद. उन्हें डार्क या फैंटेसी वाली फ़िल्में पसंद हैं."

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'गैंगस्टर की हीरो की तरह दिखाने का इरादा नहीं'

बॉलीवुड में जुर्म की दुनिया और उससे जुड़े गैंगस्टर की ज़िन्दगी को बेहद चमकदार तरीक़े से क्यों दिखाया जाता रहा है?

इस पर राम गोपाल वर्मा कहते हैं, "अगर आप किसी फ़िल्म में हीरो को वाइन ग्लास लिए या मारधाड़ करते हैं तो उसे संज़ीदगी से लेने की ज़रूरत नहीं है. वो एक फ़िल्म भर है, वो सिर्फ़ मनोरंजन के लिए है."

वो कहते हैं, "अगर आप रियलिस्टिक सिनेमा दिखाना चाहते हैं तो उसमें आपको किरदारों के नकारात्मक पहलू को दिखाना होगा. मेरी फ़िल्मों के सारे किरदार 'ग्रे' ही रहे हैं फिर चाहे वो सत्या हो या डी कंपनी."

राम गोपाल वर्मा का कहना है कि उनका मक़सद किसी गैंग्स्टर या अपराधी को नायक की तरह पेश करना नहीं है.

उन्होंने कहा, "निर्देशक का इरादा किसी अपराधी को हीरो बनाकर दिखाना नहीं होता. वो बस एक असली गैंगस्टर को दिखा रहा होता है. मैं अपनी सभी फ़िल्मों में यह करता हूं और डी कंपनी में भी यही कर रहा हूँ."

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दाऊद को पर्दे पर क्यों देखना चाहते हैं लोग?

गैंगस्टर फ़िल्मों में दाऊद की भूमिका की चर्चा करते हुए वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं कि गैंगस्टर दाऊद के नाम के साथ एक रहस्य है.

वो कहते हैं, "कभी किसी ने न दाऊद तस्वीर देखी है और न वीडियो. एक तस्वीर है जो बहुत पहले शारजाह स्टेडियम से आई थी. एक-दो पार्टी की तस्वीरें हैं, वो ही घूमती रहती हैं. इसलिए कोई नहीं जानता कि दाऊद कैसा दिखता है."

अजय ब्रह्माम्तज के मुताबिक़ दाऊद की आपराधिक गतिविधियों की वजह से भी लोगों के मन में एक जिज्ञासा रहती है. यही वजह है कि दाऊद की कहानी पर्दे पर बार-बार दिखाई जाती है.

अजय ब्रहाम्तज का मानना है कि राम गोपाल वर्मा ने जुर्म और अंडरवर्ल्ड की दुनिया को कॉर्पोरेट की दुनिया की तरह दिखाया है, जो लोगों में एक अलग तरह की दिलचस्पी पैदा करता है.

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'पुराना हो चुका है गैंगस्टर-ग्लैमर फ़ॉर्मूला'

हालांकि फ़िल्मों के कारोबार पर नज़र रखने वाले कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अब ऐसी कहानियाँ बॉक्स ऑफ़िस पर कमाल नहीं कर पाती.

फ़िल्म ट्रेड ऐनलिस्ट अमोद मेहरा कहते हैं, "ऐसे सिनेमा में अब ताज़गी नहीं बची है. दाऊद या किसी अन्य गैंगस्टर के बारे में नया कहने के लिए कुछ नहीं है. दिक्क़त यह है कि हमारे पास अच्छे लेखकों की कमी है और उससे ज़्यादा कमी है आइडिया की."

वो कहते हैं, "शुरू-शुरू में तो ये अंडरवर्ल्ड डॉन का आइडिया काम कर गया लेकिन अब लोगों को कुछ नया चाहिए. कुछ निर्देशकों और निर्माताओं की एक फ़िल्म सफल हो जाती है तो वो उसी तरह की फ़िल्में बनाना शुरू कर देते हैं और फिर वो इतनी फ़िल्में बनाने लगते हैं जिससे वो पुराना लगने लगता है."

इन सबके बावजूद बड़े और नामी सितारों फ़िल्मों में कुख्यात गैंगस्टर और अपराधियों की भूमिका निभाने में काफ़ी दिलचस्पी दिखाते हैं. फिर चाहे वो शाहरुख ख़ान हों या कोई और.

अमोद मेहरा कहते हैं, "अगर आप गंदी नाली या चौल दिखाएंगे तो शायद कोई फ़िल्म नहीं देखेगा इसलिए गैंगस्टर से जुड़ी फ़िल्मों में भी ग्लैमर दिखाना पड़ता है जबकि असल में ऐसा नहीं होता."

उनका मानना है कि अब गैंगस्टर और ग्लैमर का कॉकटेल भी दर्शकों को उतना नहीं लुभा पाता जितना पहले लुभाता था.

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