कंगना की 'थलाइवी' जयललिता के साथ कितना इंसाफ़ कर पाई?

  • तोटा भावनारायण
  • वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी तेलुगू के लिए
कंगना की 'थलाइवी'

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'थलाइवी' का मतलब होता है महिला नेता. तमिल लोग अन्नाद्रमुक की नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता को 'पुरात्ची थलाइवी' यानी 'क्रांतिकारी महिला नेता' कहा करते थे. उनके लिए 'अम्मा' का मतलब जयललिता से था.

जयललिता ऐसी महिला नेता नहीं थीं जिनकी पहचान केवल तमिलनाडु तक सीमित थी. इसलिए जयललिता की लोकप्रियता को ध्यान में रखकर उनकी बायोपिक हिंदी, तमिल और तेलुगू भाषा में रिलीज़ की गई है.

जयललिता की ज़िंदगी के कई पहलू हैं. उसमें मुश्किलें हैं, जीत है तो हार भी है, आलोचनाएं हैं और इलज़ाम भी. चूंकि उनकी ज़िंदगी में कई विवाद भी रहे, इसलिए जाहिर है कि उनकी बायोपिक से लोगों को काफी उम्मीदें हैं.

सिनेमा से राजनीति का उनक सफ़र, मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना और फिर भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाना और चुनावों में हार के बाद एक बार फिर जीत कर मुख्यमंत्री बनना और यहां तक कि उनकी मौत की परिस्थितियों को लेकर उपजे संदेह के कारण भी जयललिता की ज़िंदगी में बहुत से लोगों को दिलचस्पी रही है.

इससे पहले तमिल राजनीति पर 'इरुवर' (दो व्यक्ति) नाम से एक फ़िल्म बन चुकी है. लेकिन उस वक़्त इस फ़िल्म के दो प्रमुख किरदार (करुणानिधि और जयललिता) जीवित थे, इसलिए फ़िल्मों में उनके चरित्र बेहद एकतरफ़ा और नीरस लगे थे.

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साल 1997 में रिलीज़ हुई 'इरुवर' मणिरत्नम ने बनाई थी

फ़िल्म की शुरुआत

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'इरुवर' दोनों चरित्रों की ज़िंदगी के अलग-अलग रंगों को सामने लाने में नाकाम रही और शायद फ़िल्म बनाने वाले ऐसा चाहते भी नहीं थे. 'इरुवर' को तेलुगू में भी डब किया गया था. चूंकि तमिलनाडु में इसे बहुत ठंडा रिस्पॉन्स मिला था जिसके ये तेलुगू में भी बुरी तरह से पिट गई.

हालांकि कंगना की 'थलाइवी' में जयललिता के चरित्र के साथ निर्माताओं ने क्रिएटिव रिस्क लेने की कोशिश की है ताकि लोग उनकी कहानी को क़रीब से समझ सकें.

फ़िल्म शुरू होती है, उस दृश्य से जब जयललिता पर सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक कड़ा हमला कर रहे थे और वो सदन को ये याद दिलाती हैं कि द्रौपदी के अपमान के कारण महाभारत का युद्ध हुआ था और वे कसम लेती हैं कि केवल मुख्यमंत्री बनने पर ही वे इस सदन में कदम रखेंगी.

फ़िल्म के आख़िर में भी इस दृश्य को दोहराया गया है और वो उन लोगों को चेतावनी देते हुए दिखती हैं कि जिन्होंने कहा था कि वे एक नकारा मुख्यमंत्री साबित होंगी.

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जयललिता की ज़िंदगी

जयललिता फ़िल्मों कैसे आईं., एमजी रामचंद्रन से उनकी नजदीकी कैसे बनी, दोनों का रिश्ता कैसा था और किन हालात में उन्होंने राजनीति में कदम रखा, पार्टी से किस तरह से उन्हें सहयोग नहीं मिला, औरत होने की वजह से उन्हें कैसे कमज़ोर समझा गया?

कंगना की 'थलाइवी' में जयललिता की ज़िंदगी की इन घटनाओं को प्रमुखता दिखाया गया है या यूं कहें तो सलीके से पर्दे पर उतारा गया है. चूंकि ये एक फ़िल्म है, इसलिए घटनाओं को दिखाने में काल्पनिकता का सहारा लेने की ज़रूरत समझ में आती है.

एक सुपरस्टार जो अपने स्टारडम को वोटों में बदल रही थी, मुख्यमंत्री बन जाती है. एक अभिनेत्री जिसे 'हाफ़ निकर डांसर' यानी 'छोटे कपड़ों में नाचने वाली' कलाकार कहा जाता था, वो किस तरह से लोगों के मन में अपनी छवि बदलती है और राज्य का नेतृत्व संभालती है. ये दोनों अलग-अलग बाते हैं लेकिन वो जयललिता ही थीं, जिन्होंने इसे कर दिखाया था.

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ज़िंदगी की जन उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर चल कर जयललिता मुख्यमंत्री पद के मुकाम पर पहुंची थीं, उसमें उन्हें समाज के पितृ सत्तात्मक ढांचे की चुनौती से किस तरह से लड़ना पड़ा था, कंगना की 'थलाइवी' उनकी ज़िंदगी के इस पहलू को बस छूकर निकल गई है.

जयललिता के चरित्र को साकार करने में कंगना ने मेहनत की है और काफी हद तक वो कामयाब भी रही हैं. हमें इसे बात को स्वीकार करना चाहिए कि फ़िल्म में कई मौकों पर उन्होंने जयललिता के किरदार में जान डाला है.

चूंकि 'थलाइवी' की पूरी कहानी ही जयललिता की ज़िंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है, इसलिए ये कुदरती बात होगी कि जयललिता की शोहरत भी इसे मिलेगी. 'थलाइवी' को कंगना की वजह से जितना प्रचार नहीं मिलेगा, उससे कहीं ज़्यादा प्रचार कंगना को 'थलाइवी' के कारण मिलेगा.

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एमजीआर के रोल में अरविंद स्वामी

एमजीआर की भूमिका में अरविंद स्वामी भी जमे हैं. अगर इस फ़िल्म में किसी एक ऐक्टर को अपने अभिनय के लिए सबसे ज़्यादा नंबर मिलेंगे तो वो अरविंद स्वामी ही हैं. यहां तक कि तमिल दर्शकों को जयललिता के रोल की तुलना में अरविंद स्वामी का चरित्र ज़्यादा अपील करेगा.

ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने एमजीआर के बीते दौर को पर्दे पर जीवंत कर दिया हो. एमजीआर और करुणानिधि के राजनीतिक मतभेदों पर ये फ़िल्म रोशनी नहीं डालती है क्योंकि इंटरवल तक ये फ़िल्म जयललिता और एमजीआर के संबंधों की कहानी ही बयान कर रही होती है.

जयललिता ने ताउम्र एमजीआर के साथ अपने संबंधों पर सीधे कुछ नहीं कहा लेकिन तमिलनाडु में उनका एक बयान बहुत मशहूर हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि "एमजीआर से कौन प्यार नहीं करता?"

कंगना की 'थलाइवी' में उस डायलॉग का अच्छे से इस्तेमाल हुआ है. एमजीआर के क़रीबी साथी आरएम वीरप्पन का किरदार भी इस फ़िल्म में रखा गया है.

शिवाजी गणेशन ने एक बार अफसोस जताते हुए कहा था, "मैं किसी भी मामले में एमजीआर से कम नहीं हूं. अगर मेरे पास भी एक आरएम वीरप्पन होते तो राजनीति में मैं भी कामयाब होता."

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68 साल की जयललिता 22 सितंबर से अपोलो अस्पताल में भर्ती थीं.

शिवाजी गणेशन के इस बयान से आरएम वीरप्पन की अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. आरएम वीरप्पन ने अपना करियर एमजीआर के मैनेजर के तौर पर शुरू किया था.

बाद में उन्होंने एमजीआर के लिए ऐसी फ़िल्मों का निर्माण किया जिससे उनकी छवि चमकती हो. और उसके बाद एमजीआर के अलग-अलग फैंस एसोसिएशन को एक करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. एमजीआर की राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में उनकी इस पहल का अहम योगदान था.

एमजीआर के निधन के बाद आरएम वीरप्पन ने शुरू में उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन का साथ दिया था लेकिन बाद वे जयललिता के साथ आ गए और आगे चलकर उनकी पार्टी में नंबर दो के ओहदे तक पहुंचे. कंगना की 'थलाइवी' में आरएम वीरप्पन काफी स्पेस दिया गया है. सामुतिराकनी ने आरएम वीरप्पन के रोल को साकार कर दिया है.

करुणानिधि के रोल के साथ अभिनेता नज़र ने भी इंसाफ़ किया है. जयललिता को लेकर अपने विचार वे अक्सर आंखों से ही जाहिर करते हुए दिखे हैं.

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कंगना की 'थलाइवी' देखकर ये बात समझी जा सकती है कि असली ज़िंदगी की शख़्सियतों को दिखाते वक़्त इसका पूरा ख़्याल रखा गया है कि कहीं किसी तरह का कोई विवाद न हो.

फ़िल्म में जो बात खटकती है वो शशिकला के चरित्र का सतही प्रस्तुती है. ईमानदारी से कहें तो शशिकला की ज़िंदगी में अलग से एक बायोपिक बनाने लायक तमाम बातें हैं.

लेकिन 'थलाइवी' में उन्हें ऐसे रोल में दिखाया गया है जो जयललिता को अक्का कह कर बुलाती हैं और उनके साथ खड़ी रहती है.

हालांकि मिलाजुलाकर कहें तो ये एक मसाला बायोपिक जैसी लगती है. फ़िल्म जयललिता का वास्तविक चरित्र पेश करने में पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाई है.

फ़िल्म बस ये दिखाती है कि वो कैसे मुख्यमंत्री बनीं, मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कैसे शासन किया. उन पर क्या आरोप लगे. मुकदमे हुए, वो जेल गईं. ये सब दिखाया गया है लेकिन उनकी मौत को छोड़ दिया गया.

फ़िल्म मेकर भले ही ये कहें कि उनका मकसद केवल उनके लिए फ़िल्म बनाना था जो जयललिता की ज़िंदगी से प्रेरणा लेना चाहते हैं, तो इसमें शिकायत की कोई बात नहीं है लेकिन आम दर्शकों की नज़र में ये एक अधूरी बायोपिक ही कही जाएगी.

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