'पीढ़ियाँ याद करेंगी हबीब तनवीर को'

(रंगमंच की मशहूर हस्ती हबीब तनवीर को याद कर रहे हैं कथाकार और कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल)

हबीब साहब उन लोगों में थे जिनका गहरा रिश्ता सिर्फ़ थियेटर से नहीं बल्कि सभी कला माध्यमों के लोगों के साथ था और कई पीढ़ियों के लोगों के साथ था.

उनके बारे में यह बात बहुत विशेष है और मैं कल्पना कर सकता हूँ कि देशभर में संगीतकारों, फ़िल्मकारों, नाटककारों, लेखकों और कवियों की एक बड़ी जमात है जिनकी कई पीढ़ियाँ उनको कई रूपों में याद कर रही होंगी.

थियेटर का रिश्ता सभी कला माध्यमों के साथ है. ये तो हम जानते ही हैं पर थियेटर के भी सभी लोग इस बात को निभा नहीं पाते. हबीब साहब ने सहज रूप से न केवल इसको समझा बल्कि निभाया भी.

देशभर में उनका काम लोगों ने देखा. वे केवल एक ऊँचे दर्जे के अभिनेता और निर्देशक ही नहीं थे बल्कि हमारे कला समाज के, कला का जो पूरा परिवार है उसके एक मुखिया की तरह थे.

सभी लोग उनको इसी रूप में देखते थे कि उनसे हमको कुछ मिलेगा और वो मिलता भी रहा है.

मेरा और उनका रिश्ता बहुत पुराना है. दिल्ली जब हम लोग आए, आगरा बाज़ार देखा और बाद में उनके सारे नाटक देखे. हमारी मुलाक़ातें होती रहती थीं. उनसे चर्चा करने का बहुत लाभ हम सबको होता था.

मैं हमेशा से उनको याद करता ही रहा हूँ पर आज विशेष रूप से उनकी बहुत सारी बातें याद आ रही हैं. उन जैसे व्यक्ति कम ही होते हैं. उनका काम, उनका योगदान बहुत दिनों तक याद रखा जाएगा, ऐसी उम्मीद मैं करता हूँ.

<b>थियेटर की खोज</b>

उन्होंने परंपरागत भारतीय नाट्यशैली को जो योगदान दिया, लोक कलाकारों और ग्रामीण कलाकारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच दिया, वह उनका बहुत बड़ा योगदान है.

लंदन से जब वे पढ़कर यहाँ आए तो भारत में बहुत दिनों वे इस खोज में रहे कि वे जो तकनीकी बातें सीख कर आए हैं, उनकी मदद से कैसे वे अपना एक थियेटर बनाएं.

ज़ाहिर है कि उस थियेटर की खोज, अपने कामकाज की खोज उनको छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के बीच ले गई जहाँ के वे स्वयं थे और उन्होंने लोक कलाओं में जो चीज़ें हैं, उनको पहचाना और इस बात को भी पहचाना. इस बात को वे कहते भी थे कि हमारे यहाँ शास्त्र और लोक का कोई गहरा भेद नहीं है.

अभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका रंग प्रसंग (जिसका मैं संपादन करता हूँ) को संयोग से उनका एक इंटरव्यू मिला है.

इसमें उन्होंने इस बात को फिर एक बार ज़ोर देकर दोहराया है कि शास्त्र और लोक का जो रिश्ता रहा है उसमें उनकी बहुत गहरी दिलचस्पी रही है. इन दोनों को मिलाकर ही फिर उन्होंने अपना एक सचमुच का नया थियेटर बनाया जो उनके ग्रुप का नाम भी पड़ा.

उनकी प्रमुख कृतियों में आगरा बाज़ार और मिट्टी की गाड़ी है. मिट्टी की गाड़ी उनकी आला दर्जे की कृति है. इसके अलावा चरनदास चोर है.

चरनदास चोर को देखने के लिए भीड़ उमड़ती रही है. मुझे याद है कि चार-पाँच साल पहले भोपाल में संयोग से हम लोग भी थे. तब रवींद्र भवन में पैर रखने की जगह भी नहीं थी. बैठने वाले लोगों के अलावा सैकड़ों लोगों ने खड़े होकर भी उस नाटक को देखा.

हबीब साहब उसमें कांस्टेबल की भूमिका निभाया करते थे. उनकी भूमिका थोड़ी ही देर की थी जिसे देखने के लिए लोग उमड़ते थे.

<b>पीढ़ियों के पार</b>

उनकी कृतियों का तो हम नाम लेते चले जा सकते हैं. सच पूछिए तो उनकी कौन सी ऐसी कृति है जिसके बारे में कहूँ कि वो लोकप्रिय नहीं हुई या जनप्रिय नहीं थी.

उनके व्यक्तित्व की बड़ी अहम बात यह थी कि उनसे सहज ही अपनापन बन जाता था. जो लोग उनको जानते हैं, उनसे थोड़ी देर के लिए भी मिले हैं, वे इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते हैं और याद कर सकते हैं.

यह ऐसी खूबी है जो पीढ़ियों के पार चली जाती है. बच्चों से भी आपका लगाव हो जाए और बच्चे भी आपके प्रति आकर्षित हो जाएं.

इसके अलावा बड़े-बुज़ुर्ग और सभी आयु वर्ग के लोग उनसे प्यार करते थे. यह आसान बात नहीं थी और इसकी बात मीडिया में ज़ाहिर है कि ज़्यादा नहीं हुई. यह बात सिर्फ़ वही जानते हैं जो उनके क़रीब रहे.

आज मेरे मन में सबसे ऊपर यही बात है कि कैसे हम लोग, मेरे परिवार के लोग और दूसरे परिजन और उनके बच्चे जो एक ही बार में हबीब साहब से मिले और उनके हो गए, उन्हें हमेशा याद करते रहेंगे.

उनकी पढ़ाई लिखाई के बारे में भी मीडिया में उतनी बातें नहीं आईं कि उनकी पढ़ाई-लिखाई का फलक कितना बड़ा था. नए-नए लोगों की किताबें पढ़ना, क्लासिक्स को पढ़ना, उनकी गहराइयों में जाना और उन पर चर्चा करना भी उनकी बड़ी खूबियों में से थीं.

<b>(बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी से बातचीत के आधार पर)</b>

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