हीरो बनता तो सुपरफ़्लॉप होता: बोमन

  • 27 जून 2009
बोमन ईरानी
Image caption बोमन ईरानी ने फ़िल्म उद्योग में अपनी अलग जगह बनाई है

लगे रहो मु्न्नाभाई के ‘लकी सिंह’ हों या फिर ज़मीन हड़पने वाले खोसला का घोंसला का ‘किशन खुराना’ हो...बोमन ईरानी उन अभिनेताओं से में हैं जो चरित्र किरदारों में जान फूँक देते हैं.

वे बाहर जाते हैं तो कई लोग अब भी उन्हें ‘मामू’ कहकर बुलाते हैं. बेशक उनकी गिनती फ़िल्म उद्योग के बेहतरीन अभिनेताओं में होती है.

हाल ही में लंदन में उनसे मुलाकात हुई. पर्दे पर अगर आपने उनको हँसाते-गुदगुदाते हुए देखा है तो असल ज़िंदगी में भी वे कमतर नहीं है…हंसाने का अंदाज़ भी ऐसा कि सवाल पूछना मुश्किल हो जाए.

बोमन ईरानी से बीबीसी संदवाददाता वंदना की बातचीत:

आपको लोग एक मंझे हुए थिएटर कलाकार के रूप में जानते थे, करीब आठ साल पहले आप फ़िल्मों में आए. कई लोगों की शिकायत है कि आपने लेट एंट्री ली, शायद पहले आए होते तो लोगों को कई बेहतरीन फ़िल्में देखने को मिलतीं.

मैं नहीं मानता कि मैं देर से आया हूँ. अगर मैं जल्दी आता हो मुझे हीरो के रूप में आना पड़ता और सुपरफ़्लॉप हीरो बनता मैं. मेरे हिसाब से मैं सही वक़्त पर फ़िल्मों में आया हूँ. यूँ समझ लीजिए कि मैं ख़ुद को सिनेमा ऐक्टर बनने के लिए तैयार कर रहा था.

मैं एक फ़ोटोग्राफ़र था, फिर थिएटर ऐक्टर बना. 15 साल थिएटर में बिताए और अब जैसे आपने कहा कि स्क्रीन ऐक्टर हूँ. ये टाइमिंग बिल्कुल सही है.

आपके जैसे या परेश रावल जैसे अभिनेताओं ने चरित्र किरदारों को नया आयाम दिया है क्योंकि कई बार चरित्र अभिनेताओं को बहुत महत्व नहीं दिया जाता.

यहाँ मैं आपसे थोड़ा असहमत हूँ. अगर आप ये मानें कि बलराज साहनी जैसे अभिनेता का कोई महत्व नहीं था तो मैं ऐसा नहीं समझता. मैं बलराज साहनी साहब का ज़बरदस्त फ़ैन हूँ. हिंदुस्तान से सबसे अहम और बेहतरीन कलाकार हैं बलराज साहनी.

पर हाँ ये बात भी ज़रूर है कि पिछले कुछ वर्षों में चरित्र अभिनेताओं या अभिनेत्रियों को ज़्यादा सम्मान मिलने लगा है. अंग्रेज़ी में एक शब्द है सपोर्टिंग ऐक्टर यानी सह कलाकार. उन्हें सपोर्टिंग ऐक्टर क्यों कहा जाता है- वो इसलिए क्योंकि सह कलाकार के सहयोग के बिना आप फ़िल्म बना ही नहीं सकते. एक हीरो है और एक विलेन बस इनसे तो फ़िल्म नहीं बन सकती.

आज की तारीख़ में अच्छे चरित्र गढ़े जा रहे हैं. मैं ख़ुशकिस्मत हूँ कि मैंने मुन्नाभाई एमबीबीएस, डॉन, हनीमून ट्रेवल्स, खोसला का घोंसला या लगे रहो मु्न्नाभाई जैसी फ़िल्में कीं.

मैने ख़ुद को वचन दिया है कि अपने आप को टाइपकास्ट नहीं होने दूँगा और अलग-अलग तरह के किरदार निभाता रहूँगा.

बलराज साहनी की बात की आपने. दो बीघा ज़मीन, सीमा और अनुराधा जैसी फ़िल्में की हैं उन्होंने. वैसा कोई रोल करना चाहेंगे?

दो बीघा ज़मीन मेरी पंसदीदा फ़िल्म है लेकिन वो हो चुकी है. उससे किसी तरह की छेड़छाड़ करने की कोशिश करनी ही नहीं है. हमें ऐसे चरित्र बनाने हैं जो हमारे अपने हों. पूर्व में गढ़े गए चरित्रों का सम्मान करना चाहिए.

आप पहले फ़ोटोग्राफ़र थे. आपकी वेबसाइट देखी. आपने वहाँ कई तस्वीरें लगा रखी हैं. अब भी आप फ़ोटोग्राफ़ी करते हैं?

मुझे लंदन एक दिन के लिए ही आना था इसलिए इस बार मैं कैमरा नहीं लाया. वरना मैं हर जगह अपना कैमरा लेकर घूमता हूँ और फ़ोटो खींचता हूँ. मैं सिर्फ़ अपने लिए शूट करता हूँ और मुझे बेहद अच्छा लगता है.

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार