'मेरे जीवन का हिस्सा है पाकिस्तान'

करण जौहर
Image caption करण जौहर जाने-माने निर्देशक और निर्माता हैं

संस्कृति, भाषा और राजनीतिक मतभेदों के पार जाकर लोगों को जोड़ने का काम जो विधाएँ बख़ूबी कर सकती है उनमें कला-संस्कृति का अहम स्थान है.फ़िल्में इसकी उम्दा उदाहरण है.

हाल में लंदन में भारत-पाकिस्तान संबंधों पर एक सम्मेलन हुआ जिसमें फ़िल्मों की भूमिका पर भी चर्चा हुई. फ़िल्मकार करण जौहर ने भी इसमें हिस्सा लिया.

करण जौहर ने बताया कि पाकिस्तान उनकी बचपन की यादों का अहम हिस्सा है क्योंकि उनके पिता यश जौहर का बचपन लाहौर में बीता.

करण जौहर ने कहा कि बतौर फ़िल्मकार उन्हें लगता है कि पाकिस्तान विरोधी फ़िल्में बनाने का दौर पुराने समय की बात हो गई है, उनके शब्दों में कहें तो बींग प्रो-पाकिस्तान इज़ द इन थिंग. करण ने बताया कि उनके पास बीसियों ऐसी कहानियों के प्रस्ताव आ रहे हैं जिसमें पाकिस्तान को दूसरे ही रंग में दिखाया गया है.

करण जौहर ने पाकिस्तान से अपने रिश्ते और शाहरुख़ से दोस्ती के बारे में बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत की:

आपको लगता है कि फ़िल्मों में इतनी ताक़त या काबिलीयत होती है कि वो भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे जटिल मुद्दे पर किसी तरह का सकारात्मक प्रभाव डाल सकें?

सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसका असर बहुत लोगों पर होता है. हिंदुस्तानी सिनेमा की पहुँच भारत ही नहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश और कई एशियाई देशों में है. दुनिया भर में बहुत सारे लोग हमारी फ़िल्में देखते हैं.

हम जो कहते हैं, जो हम सोचते हैं और जो ख़्याल बड़े पर्दे पर दिखाए जाते हैं वो दर्शकों के दिलो-दिमाग़ पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं. इसलिए मेरी नज़र में सिनेमा बहुत शक्तिशाली माध्यम है.

आपके माता-पिता का रिश्ता पाकिस्तान से रहा है. तो पाकिस्तान ने आपके जीवन में कितनी और कैसी भूमिका निभाई है?

भावनात्मक वजहों के कारण पाकिस्तान मेरे लिए बहुत मायने रखता है. मेरे पिताजी लाहौर में बड़े हुए थे, माँ का जन्म कराची में हुआ तो एक भावनात्मक रिश्ता है.

मेरे पिताजी पाकिस्तान में बिताए समय के बारे में बहुत सारी बातें किया करते थे, अपनी यादें मुझसे बाँटा करते थे. जब भारत में पीटीवी आता था तो वे दिनभर बैठकर पीटीवी देखा करते थे. जब भारत में पीटीवी बंद हो गया तो वे बड़े उदास थे. मैने जब उनसे पूछा कि पीटीवी से लगाव क्यों है तो पिताजी ने पल्टकर कहा कि अगर तुम कभी लौटकर मुंबई नहीं सको तो तुम्हें कैसा लगेगा. वो सब किस्से मेरे बचपन का हिस्सा रहे हैं.

आपकी नई फ़िल्म माई नेम इज़ खान किस तरह की फ़िल्म है?

अभी मैं ज़्यादा कुछ नहीं बता सकता. फ़िल्म की कहानी एक शख़्स के बारे में है जिसका नाम है रिज़वान खान और वो अमरीका के राष्ट्रपति से मिलना चाहता है और बताना चाहता है कि उसका नाम खान है वो 'आतंकवादी' नहीं है.

फ़िल्म में कई तरह के पूर्वाग्रहों को दर्शाया जाएगा जिनकी चर्चा भारत-पाक सम्मेलन में भी हुई थी. समाज में कई तरह के स्टिरियोटाइप होते हैं ये फ़िल्म उन्हें दूर करेगी.

ज़ाहिर है फ़िल्म में शाहरुख़ खान होंगे.

हाँ फ़िल्म के हीरो शाहरुख़ खान हैं.

क्या वो वाकई आपकी फ़िल्म की स्क्रिप्ट नहीं पढ़ते.

स्क्रिप्ट पढ़ लेते हैं लेकिन बस शूटिंग के थोड़े पहले. ज़्यादा रिसर्च वो नहीं करते क्योंकि बहुत भरोसा है हम दोनों के बीच. जब भी मैं फ़िल्म ले जाता हूँ वो करते हैं, ज़्यादा सवाल नहीं पूछते, आ जाते हैं और बेहतरीन काम करते हैं.

बॉलीवुड को लेकर पश्चिमी देशों में कई तरह के स्टिरियोटाइप हैं- हिंदी फ़िल्में लंबी होती हैं, इनमें रिसर्च नहीं होती, गाने होते हैं. आप कितना सहमत है?

बहुत सारी बातें जो कही जाती हैं वो सच भी हैं. ज़्यादा रिसर्च नहीं होता, हमारे यहाँ कहानी पर ध्यान नहीं दिया जाता. लेकिन मेरा ये भी मानना है कि पिछले चार-पाँच सालों में बहुत कुछ बदलने लगा है.

इंडस्ट्री में अलग तरह की सेंसेबिलेटी आ गई है, नए ख़्यालों वाले लोग आ गए हैं. पाँच साल बाद अगर आप मुझसे ये सवाल पूछेंगी तो मेरा जवाब अलग होगा.

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