'समय से आगे की फ़िल्म थी गाइड'

साठ के दशक में आई देव आनंद की फ़िल्म 'गाइड' की गिनती उन नगीनों में होती है जो हिंदी सिनेमा ने दर्शकों को दिए हैं.

उस ज़माने के हिसाब से गाइड काफ़ी बोल्ड फ़िल्म थी.

फ़िल्म का हीरो 'राजू गाइड' हिंदी फ़िल्मों के अन्य अभिनेताओं की तरह अच्छाई का पुलिंदा नहीं था और न ही फ़िल्म की हीरोइन 'रोज़ी' ज़्यादातर अभिनेत्रियों की तरह त्याग और सहनशीलता की मूर्ति थी. जब शादी-शुदा ज़िंदगी उसे ख़ुशियाँ न दे सकी तो उसने विवाह के बंधन के बाहर रिश्ता बना लिया.

संगीत के मामले में भी गाइड बेमिसाल थी. देव आनंद को आज भी मलाल है कि इसे फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीत पुरस्कार नहीं मिला था. 1967 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, अभिनेत्री, निर्देशक, फ़िल्म- सब फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार गाइड को ही मिले थे.

गाइड एकमात्र ऐसी भारतीय फ़िल्म रही जिसे 2008 में आधिकारिक तौर पर कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी शामिल किया गया था.

बीबीसी संवाददाता वंदना ने देव आनंद से बात की. गाइड से जुड़ी यादों के सफ़र में हम भी देव आनंद के साथ हो लिए.

<b>पेश हैं बातचीत के कुछ मुख्य अंश:</b>

<b>गाइड को बने 40 से ज़्यादा साल हो चुके हैं. कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल के लिए भी चुना गया. आपको ख़ास तौर पर बुलाया गया था. कैसा लगता है?</b>

मुझे अच्छा लगता है, मज़ेदार सा दौर है. खुशी इसलिए ज़्यादा है कि गाइड 1966 में रिलीज़ हुई थी. अगर इतने वर्षों बाद भी लोग इसे याद करते हैं तो इससे बड़ी बात हमारे लिए क्या हो सकती है.

गाइड किसने नहीं देखी, चार पीढ़ियों के लोगों ने इसे देखा है. 60 के दशक में देखी, 70, 80, 90 के दशक में देखी. जब भी देखते हैं तो लोगों को लगता है कि आज ही बनी है. बेहतरीन तरीके से फ़िल्माई गई थी, ख़ूबसूरत संगीत था.

<b>गाइड 60 के दशक में बनी थी. लेकिन उस समय के हिसाब से काफ़ी बोल्ड फ़िल्म थी, समय से आगे.</b>

नवकेतन बैनर की फ़िल्में देखकर हमेशा लगेगा कि ये वक़्त के पहले की फ़िल्में हैं. गाइड अपने ज़माने के हिसाब से समय से आगे थी लेकिन इसकी ख़ूबी यही है कि फ़िल्म देखकर लगता है कि ये आज ही बनी है.

<b>आपको लोग रोमांटिक हीरो के तौर पर जानते थे. क्या ऐसे में आपको क्यों संकोच नहीं हुआ गाइड जैसी बोल्ड फ़िल्म करने में. क्योंकि पारंपरिक तौर पर भारतीय फ़िल्मों में हीरो अच्छाई का प्रतीक होता है, वो कुछ बुरा नहीं कर सकता लेकिन गाइड का राजू वैसा नहीं था.</b>

संकोच किस बात का. गाइड जब तैयार हो रही थी तो उसी समय कलर फ़िल्मों का दौर शुरू हुआ था. इस फ़िल्म के दो संस्करण बने थे. अग्रेज़ी वर्ज़न आरके नारायण के उपन्यास पर आधारित था. इसके लिए हमने नोबल पुरस्कार विजेता लेखक पर्ल बक के साथ समझौता किया था.

लेकिन हिंदी संस्करण अग्रेज़ी वर्ज़न से अलग था. हमने स्क्रिप्ट को बदल दिया था. कहानी में एक ऐसी लडक़ी थी जो शादी-शुदा थी पर उसका किसी और से संबंध था. ये भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाता था. इस वजह से हिंदी फ़िल्म का क्लाइमैक्स बदल दिया गया था. हिंदी गाइड को एक रूहानी अंजाम दिया गया.

<b>फ़िल्म में हीरोइन का चुनाव कैसा हुआ.क्योंकि गाइड की रोज़ी भी आम हीरोइनों की तरह नहीं थी. उसके किरदार में कई तरह के रंग थे. वहीदा रहमान जी आपकी पहली पसंद थी ? वे राज़ी थी इसके लिए ?</b>

वहीदा क्यों राज़ी नहीं होती. इस फ़िल्म में उनका बेस्ट परफ़ॉरमेंस था. ऐसा रोल किसी को मिल नहीं सकता था और न ही मिला है. आप वहीदा जी का ग्राफ़ देख लीजिए, ऐसा रोल उन्होंने कभी न किया है और शायद न करेंगी.किरदार तो चुनौतीपूर्ण था. न सिर्फ़ वहीदा ने अच्छा अभिनय किया बल्कि नृत्य भी बहुत बेहतरीन था. लोगों ने पसंद किया. और क्या चाहिए किसी कलाकार को.

<b>आरके नारायण साहब को कैसे राज़ी करवाया आपने कि उनके उपन्यास पर फ़िल्म बने.</b>

मुझे अंग्रेज़ी में फ़िल्म बनानी थी. सो द गाइड उपन्यास पर हमने फ़िल्म बनाई. लेकिन हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी फ़िल्म का आइडिया क्लिक नहीं हो रहा था. सो हमने दोबारा स्क्रिप्ट लिखी. दो बार फ़िल्म बनी- एक बार अंग्रेज़ी में और एक बार हिंदी में. अंग्रेज़ी फ़िल्म हमने अमरीका भेज दी. हिंदी गाइड विजय आनंद ने बनाई. लोग आज भी उसे याद करते हैं. मुझे ऐसे-ऐसे लोग मिले हैं जो कहते हैं कि उन्होंने 30-40 बार गाइड देखी है.

<b>एसडी बर्मन साहब ने फ़िल्म में संगीत भी बेहद ख़ूबसूरत दिया था-गाता रहा मेरा दिल, आज फिर जीने की तमम्ना है. संगीत से जुड़ी कुछ यादें बाँटना चाहेंगे.</b>

हाँ बहुत सुंदर संगीत था. शैलेंद्र ने बोल भी बहुत सुंदर लिखे थे, फ़िल्म के थीम के मुताबिक थे बोल.

आप कोई भी गाना उठाकर देख लीजिए तो लगेगा कि कितना आला संगीत है. उस साल फ़िल्म गाइड को फ़िल्मफ़ेयर के सारे पुरस्कार मिले थे लेकिन संगीत के लिए ही नहीं मिला था. हमें बहुत तकलीफ़ हुई थी क्योंकि इसे संगीत के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए था.

सच ये है कि पुरस्कारों में बहुत लॉबिंग होती है. इसलिए मुझे बड़ा अचरज हुआ था जब गाइड को कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल के लिए चुना गया क्योंकि मैने तो कोई लॉबिंग की नहीं थी. बिना लॉबिंग के फ़िल्म को चुना गया है मतलब फ़िल्म में कुछ बात तो है.

<b>फ़िल्म का अंग्रेज़ी संस्करण कभी देख पाएँगे लोग.</b>

अगर लोग अंग्रेज़ी गाइड देखना चाहेंगे तो हम ज़रूर दिखाएँगे. हमारे पास प्रिंट है शायद उसे रिवाइव करें. कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल के बाद कुछ ध्यान देंगे उसपर.

अंग्रेज़ी फ़िल्म को लेकर उस समय मैं अमरीका गया था. लेकिन वो इतना हिट नहीं हुआ था जितना हिंदी वर्ज़न. हिंदी गाइड ही ऑस्कर में भेजी गई थी. लेकिन हम लोग वहाँ रुके नहीं. अगर रुकते और लॉबिंग करते तो शायद कुछ हो जाता. लेकिन हमें ज्वेल थीफ़ की शूटिंग करनी थी सिक्कम में जाकर.

<b>बहुत से लोग कहते हैं कि गाइड अब तक का आपका सबसे बेहतरीन काम है. क्या अभी भी आपके मन में तमन्ना है कि कुछ इससे भी बेहतर करके दिखाना है.</b>

लोग अगर कहते हैं कि गाइड सबसे उम्दा काम है तो लोगों की बात सुननी पड़ेगी. लेकिन ये कहना भी ठीक नहीं होगा कि मैं अपने पिछले किसी अच्छे काम से बेहतर काम करके नहीं दिखा सकता.

मैं तो अभी भी काम कर रहा हूँ. मेरी फ़िल्म चार्टशीट की शूटिंग होने वाली है. एक अग्रेज़ी फ़िल्म बना रहा हूँ स्कॉटलैंड में. क्या मालूम मेरी आने वाली फ़िल्म पुरानी सारी फ़िल्मों को पीछे छोड़ दे.

जब कोई फ़िल्म हिट हो जाती है तो एक मानक बन जाता है और इस मानक के परे जाकर कुछ नया करना पड़ता है. हम करेंगे ऐसा, क्यों नहीं करेंगे. मैं अब तक फ़िल्में बना रहा हूँ, जब तक मज़ा आ रहा है और क्रिएटीविटी ज़िंदा है तब तक काम करता रहूँगा.

<b>कान में आधिकारिक तौर पर केवल गाइड को बुलाया गया था. आज की फ़िल्में आमतौर पर ऐसे समारोहों में नहीं पहुँच पातीं. क्या वजह मानते हैं.</b>

इसका जवाब देना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. गाइड का ढोल भी कान में किसने पीटा मैं ख़ुद नहीं जानता. ज़ाहिर है हिंदुस्तान से तो किसी ने नहीं बताया होगा. यहाँ तो लोग अपनी-अपनी बीन बजाते हैं. मैं इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि अब नई फ़िल्में बनाऊँगा तो कान में लेकर जाउँगा. हम भी देव आनंद है.

<b>गाइड विजय आनंद जी ने बनाई थी. विजय आनंद के बारे में क्या कहना चाहेंगे.</b>

मुझे विजय आनंद की ही कमी महसूस हो रही है. अगर किसी चीज़ का अफ़सोस है इस वक़्त तो यही कि विजय मेरे साथ खड़े नहीं है-जिन्होंने ये फ़िल्म बनाई और मेरा साथ दिया. बहुत विद्वान आदमी और अच्छे निर्देशक थे. हमारी बहुत ही उम्दा टीम थी. अगर विजय आनंद आज मेरे साथ होते तो वाह-वाह क्या बात होती. चार चाँद लग जाते.

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