मैं बीती बातें नहीं दोहराती: ज़ीनत अमान

  • 28 जून 2009
ज़ीनत अमान
Image caption ज़ीनत अमान ने अपने दौर में एक बोल्ड स्त्री का किरदार निभाया है

पिछले दिनों ज़ीनत अमान कोरियोग्राफर से निर्देशक बने गणेश आचार्य की फ़िल्म 'मनी है तो हनी है' में दिखाई दीं.

हाल ही में जब उन्हें एक प्राइवेट चैनल पर एकता कपूर के नए रियलिटी शो में जज की भूमिका सौंपी गई तो वे तुंरत तैयार हो गईं. फ़िल्म 'हरे रामा हरे कृष्ण' में दम मारो दम की धुन पर थिरकती और चरस-गांजे का कश लगाती ज़ीनत एक बार फिर चर्चा में तो हैं पर आज भी इंटरव्यू देने से कतराती हैं. ज़ीनत अमान से वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार रामकिशोर पारचा की बातचीत के प्रमुख अंश. आप किसी से बात क्यों नही करतीं? मैं लोप्रोफाइल रहकर काम करना चाहती हूँ. ऐसा नही हैं कि मैं लोगों से बात नही करना चाहती पर लोग मेरे काम से ज्यादा मेरे व्यक्तिगत जीवन पर बात करने लगते हैं. हर आदमी के जीवन में उतार- चढाव होते हैं पर लोग उन्हें ग़लत तरीके से बतियाने लगते हैं . वापसी के बाद आपके कैरियर में वो जोश नहीं रहा? ऐसा हमेशा होता है. मैंने जब फ़िल्मों से संन्यास लिया तो मैं अपने कैरियर के चरमोत्कर्ष पर थी पर वापस आई तो इंडस्ट्री बदल चुकी थी. बदली पीढ़ी की पसंद के बीच मैं फिट नही बैठी शायद. वापसी के बाद मेरी भूमिकाएं पहले जैसी नहीं थीं. यह अलग बात है कि नए कंटेंट और ग्रामर की कहानी वाली ये फ़िल्में बाज़ार में नही चली. वैसे भी अब मैं पहले की तरह फ़िल्मों में नायिका बनकर तो आ नही सकती. मैं एकदम छलांग नही चाहती थी. मैंने जो फ़िल्में की एक तरह से वो मेरे लिए एक बार फिर से 'स्क्रीनिंग' और 'ऑडिशन' देने जैसा था. इंडस्ट्री से दूर रहने के कारण आपने अपने कैरियर का सुनहरा दौर गवाँ दिया... नही. एक अकेली औरत के लिए अपने बच्चों के साथ हमारे समाज में जी पाना आसान नही. लोगों का ध्यान काम से ज्यादा मेरे पर्सनल जीवन पर रहता है. मैं इस विषय पर बात नही करना चाहती. मुझे नही लगता कि लोगों को मुझसे इस तरह के सवाल करने का अधिकार है. शर्लिन चोपड़ा का एलबम लॉन्च करने और टीवी शो में जज की भूमिका यानी अब आप पूरी तरह लौट आई हैं? मैंने कभी काम छोड़ने के बारे में नही सोचा. जहाँ तक टीवी शो की बात है तो मेरे पास ढेरों प्रस्ताव थे लेकिन मैं टीवी पर अभिनय नही करना चाहती थी. मेरी प्राथमिकता आज भी फ़िल्में है. पर मुझे भी एक प्रतियोगिता के जरिए ही इंडस्ट्री में आने का मौका मिला था. सो हाँ कह दी. टीवी समय मांगता है मैं उतना समय नही दे सकती थी. एकता कपूर की 'कौन जीतेगा बॉलीवुड का टिकट' क्यों कर रही हैं?

मैंने जब कैरियर शुरू किया था तो तब इतने मौके नही थे. संघर्ष ज्यादा और पैसा कम था अब ऐसे शो कम से कम नए आने वालों को एक नया मंच देने का काम तो कर रहे हैं. मुझे नही याद कि मैंने जब काम शुरू किया था तो किसी ने आसानी से मुझे काम देने के बारे में सोचा था. पर जब आप फ़िल्मों में नायिका बनकर आ गई तो उस दौर के बारे में तो याद करती हैं ना? मैं इसे अपने जीवन की उपलब्धि मानती हूँ कि मैंने उस दौर में एक आधुनिक और नए किस्म की नायिका को जन्म दिया. उस समय यह आसान नही था कि पर्दे पर कोई भारतीय नायिका इतनी बोल्ड दिखाई दे. क्यों? तब हिन्दी सिनेमा में केवल साड़ी और सूट वाली नायिकाओं का ज़माना था. ओपी रल्हन साहब की 'हलचल' और 'हंगामा' करने के बाद जब लोगों ने मुझ पर ध्यान नही दिया तो मैं अपनी माँ के साथ अपने पिता के पास माल्टा जाने का मन बना चुकी थी तभी देवानंद साहब का फोन आया कि मैं कुछ समय रुक जाऊं. हालांकि मैं देव साहब की 'हरे रामा हरे कृष्णा' के लिए पहली पसंद नही थी लेकिन जब फ़िल्म रिलीज हुई तो उसने धूम मचा दी. मुझे उसके लिए फ़िल्म फेयर का बेस्ट सपोर्टिंग अवार्ड मिला. जबकि उस फ़िल्म की नायिका मुमताज़ थीं. कहा जाता है कि आप एक समय इंडस्ट्री की ही नही बल्कि नए आने वाले अभिनेताओं के लिए भी लकी बन गई थीं? मैं यह नही कह सकती पर मैंने इंडस्ट्री के सबसे बड़े निर्देशकों में राज साब, देव साब और मनोज कुमार जी से लेकर नए आने वाले अभिनेताओं विजय अरोड़ा, कवंलजीत और यहाँ तक कि तारिक अली जैसे लोगों के साथ भी काम किया. मैं हमेशा से बेहतर काम करना चाहती थी इसलिए जब मुझे सत्यम शिवम् सुन्दरम, इन्साफ का तराज़ू और मनोरंजन जैसी जो फ़िल्में मिलीं तो उनके चलते मैं कैरियर में वो कर पाई जो एक बेहतर कही जाने वाली अभिनेत्री के लिए जरूरी होता है. ऐसी कौन से फ़िल्में और चरित्र हैं जो आप नही करती तो कुछ छूट जाता? मेरे लिए सभी फ़िल्में बेहतर रहीं. लेकिन 'डॉन', 'ग्रेट गैम्बलर', 'धुंध', 'इंसाफ़ का तराजू', 'रोटी कपड़ा और मकान', 'कुर्बानी', 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम्', 'अजनबी' के अलावा 'अलीबाबा चालीस चोर', 'सोहनी महिवाल', 'लावारिस', 'महान', 'दोस्ताना' और 'अब्दुल्ला' ऐसी फिल्में थीं जो मेरे लिए ख़ुद को तेज़ी से बदलते हिंदी सिनेमा में साबित करने में बहुत मददगार रही हैं. जहाँ तक चरित्रों की बात है तो 'हरे राम हरे कृष्ण' का जेनिस और डॉन का रोमा का चरित्र मुझे सबसे प्रिय हैं. और भोपाल एक्सप्रेस जैसी फ़िल्में? मैं कमर्शियल और समानांतर सिनेमा के बदलते दौर में ख़ुद को अजमाना चाहती थी इसलिए मैंने उस समय 'बात बन जाए', 'सिनेमा सिनेमा', 'शालीमार', 'औरत', 'गवाही' जैसी फिल्में भी कीं. निर्देशक और अभिनेता कौन से पसंद थे और अब किनके साथ काम करना चाहती हैं? मैंने हर बड़े निर्देशक और अभिनेता के साथ काम किया लेकिन अमित जी के साथ काम करना मेरे लिए सबसे रोमांचक अनुभव है. उनका मुकाबला नही. मैं आज भी उनकी समय की पाबंदी और अनुशासन की प्रशंसक हूँ. नए लोगों में भी करन जौहर और फरहान अख़्तर के साथ काम कर पाना मेरे लिए नया अनुभव होगा. आजकल कौन से अभिनेत्री और अभिनेता आपको बेहतर लगते हैं? सभी बेहतर हैं. पीढियाँ बदलती हैं तो पसंद भी बदलती हैं. लेकिन आज भी शाहरूख, आमिर, करीना और प्रियंका जैसे कलाकार हैं जो बहुत मेहनत करते हैं. पीछे मुड़कर देखती हैं तो कैसा महसूस करती हैं, सिनेमा में क्या बदल गया है? मैं बीती बातें नही दोहराती. लेकिन मुझे इंडस्ट्री ने बहुत प्यार दिया है इसलिए मुझे बहुत ज्यादा फर्क नही लगता लेकिन तकनीकी तौर पर बहुत बदल गया है सबकुछ. सब कुछ बहुत जल्दी जल्दी हो रहा है बस अब तसल्ली से काम करने का समय नहीं रहा. आपकी आने वाली फिल्में कौन सी हैं? 'मोनोपोली', 'चौराहे', 'सिर्फ़ रोमांस' और 'गीता इन पैराडाइज़' जैसी फिल्में हैं. इसके अलावा आमिर के भाई हैदर, विनोद खन्ना के भतीजे करन के साथ भी फिल्में हैं. आपका एक बेटा निर्देशक की तैयारी में है उसकी फ़िल्म में काम करेंगी? मेरे दोनों बेटे बड़े हो गए हैं, जहान ने अपनी पढ़ाई पूरी की है और अजान ने न्यूयार्क से निर्देशन की पढ़ाई की है लेकिन यदि वो मुझे अपनी फ़िल्म में लेना चाहेगा तो क्यों नही करुँगी. एक माँ के लिए इससे बड़ी खुशी क्या होगी.

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