मैं 'किस सीन' नहीं करना चाहती: अमृता

  • 29 जून 2009

'विवाह' के बाद भले ही अभिनेत्री अमृता राव की 'माई नेम इज एंथोनी गोंजाल्वेज' और 'शौर्य' जैसी फ़िल्में नहीं चलीं लेकिन इसके बाद भी

उन्हें बात करने के लिए पकड़ना आसान नहीं है. वे अब भी पहले की ही तरह लोकप्रिय और व्यस्त हैं.

वे कभी अमृता प्रीतम के उपन्यास 'नागमणि' पर इसी नाम से बनने वाली फ़िल्म को लेकर चर्चा में रहती हैं तो कभी मशहूर पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग्स के लिए.

माधुरी और तब्बू के बाद वे अकेली अभिनेत्री हैं जो सादगी से लेकर हॉट एंड बोल्ड भूमिकाएं भी आसानी से कर सकती हैं. उसके लिए प्रशंसा भी बटोर सकती हैं. हाल ही में आई श्याम बेनेगल की फ़िल्म 'वेलकम टू सज्जनपुर' में उनकी साड़ी बिंदी वाली कमला की भूमिका से वे एक बार फ़िर चर्चा में आ गईं हैं.

अपनी नई फ़िल्म 'विक्टरी' और आने वाली फ़िल्म 'शॉर्टकट' में वे एक बार फिर 'मैं हूँ ना' की तर्ज पर जींस और टॉप पहनकर फिर चौंकाने जा रही हैं.

रामकिशोर पारचा ने अमृता से बातचीत की.

<b>अमृता लोग मान रहे हैं कि आप अकेली ऐसी अभिनेत्री हो गई हैं जो एक साथ साड़ी, बिंदी और बिकनी वाली भूमिकाएं आसानी से कर लेती हैं?</b>

इसके बाद भी मैं आज परदे पर चुंबन देने वाले सीन नही करना चाहती. जहाँ तक बिकनी की बात है तो पता नहीं यह अफ़वाह किसने उडाई.यदि बिकनी किसी अभिनेत्री को बढ़िया अभनेत्री बना सकती है तो आज की कई नंबर वन कही जाने वाली अभिनेत्रियों को यह तमगा दिया जा सकता है.

मैं जो काम सहजता से नहीं कर सकती, मैं वह नहीं करती. मैं बिकनी पहन सकती हूँ लेकिन उसका कहानी के साथ कोई तालमेल होना चाहिए.

<b>लेकिन यह तो सच है कि अब सामाजिकता और परंपरा से जुड़े निर्देशकों की आप पहली पसंद हो गई हैं और कमर्शियल सिनेमा के निर्देशक भी आपके साथ काम करना चाहते हैं?</b>

यह मेरी उपलब्धि है कि मेरे करियर में राजश्री और श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों की फ़िल्में शामिल हो गई हैं.मैं बचपन से उनकी फ़िल्में देखती आ रही थी लेकिन कभी नहीं सोचा था कि उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा.

<b>पर श्याम जैसे निर्देशक तो गंभीर सिनेमा के आदमी माने जाते हैं?</b>

सिनेमा की कोई श्रेणी नहीं होती है. यदि आप उसे पसंद करते हैं तो वो बेहतर सिनेमा हो जाता है और यदि नहीं पसंद करते हैं तो उसे किसी भी श्रेणी में डाल दें.

मैंने अपनी शुरुआत 'अब के बरस' जैसी औसत फ़िल्म से की थी. लेकिन उसके बाद 'इश्क विश्क' और 'मैं हूँ ना' जैसी फ़िल्मों से मैं ग्लैमरस अभिनेत्री मान ली गई. लेकिन जब 'विवाह' और 'वेलकम टू सज्जनपुर' सामने आई तो लोगों का नज़रिया एक बार फिर बदल गया.

<b>'लगान' के बाद क्रिकेट पर बनने वाली फिल्मों का हश्र ठीक नहीं रहा है. हरमन बवेजा की 'लव स्टोरी 2050' बुरी तरह पिट गई. ऐसे में आपकी भूमिका का फ़िल्म में क्या अर्थ है?</b>

पहली बात 'विक्टरी' मेरे पसंदीदा खेल की फ़िल्म है. दूसरे, यह खेल के सहारे एक युवक की हिम्मत और उसकी खेल भावना की पराकाष्ठा के सपने को पूरा करके दिखाने वाली फ़िल्म है.

जहाँ तक 'लगान' की बात है तो वो एक शानदार कहानी और व्याकरण वाली फ़िल्म थी. उसके बाद वैसी दूसरी फ़िल्म नहीं बनी. हरमन एक प्रतिभाशाली कलाकार हैं. 'लव स्टोरी 2050' एक फंतांसी फ़िल्म थी जबकि 'विक्टरी' एक रियल फ़िल्म है. मेरी भूमिका नंदनी नाम की मेडिकल स्टुडेंट की है जो बाद में न केवल ख़ुद को साबित करती है बल्कि नायक को भी ख़ुद को साबित करने में उसका आधार बनती है.

<b>क्या आप मानती हैं कि आपने अपने करियर में भी ख़ुद को साबित कर दिया है?</b>

पता नही. मैंने अपनी भूमिकाओं के साथ मेहनत की. मैंने जो फ़िल्में कीं वे ऐसी फ़िल्में थीं जिन्हें पारिवारिक कहा जा सकता था. लेकिन मैं एक विशेष छवि के साथ फ़िल्में नहीं करना चाहती.

इसलिए अब 'विक्टरी' और 'शार्टकट' में भी मैं अपनी ग्लैमरस भूमिकाओं को ही दोहरा रही हूँ. पर मैं जानती हूँ कि मैंने जो फिल्में चुनी वे बेहतर फ़िल्में थीं. जब मेरी 'शौर्य' और 'एंथोनी..' जैसी फ़िल्में रिलीज़ हुईं तो उनके साथ कई बड़े बैनर की फ़िल्में भी रिलीज़ हुई थी. उन्हें लोगों ने पसंद तो किया पर उन्हें हिट मानने में संकोच बरता.

<b>जब शाहिद कपूर के साथ आपकी जोड़ी को हिट माना जा रहा था तो अपने दो फ़िल्मों के बाद उनके साथ जोड़ी बनाने में संकोच क्यों बरता. उस समय आप शाहिद से ज़्यादा ज़ायद ख़ान और यहाँ तक कि शरमन जोशी तक के साथ फ़िल्में करने के लिए तैयार थीं?</b>

नहीं. मैंने कभी शाहिद के साथ फ़िल्में करने से मना नहीं किया. मैंने उनके साथ अपने करियर की सबसे बड़ी हिट फ़िल्म 'विवाह' दी है. ज़ायद और शरमन की मैंने कुछ फ़िल्मों की तारीफ़ भर की थी. निर्माताओं को जब लगेगा तब वे उनके और शाहिद के साथ जोड़ी बना लेंगे. यह मेरे हाथ में नहीं है.

<b>सुना है अमृता प्रीतम के सबसे विवादित उपन्यास 'नागमणि' पर बनने वाली फ़िल्म भी आपके हाथ में है. आपको लगता है कि अमृता प्रीतम की महिलाओं को समझना आसान है?</b>

'विवाह' के दौरान मैंने भारतीय और विदेशी साहित्यकारों को पढ़ा था. इनमें प्रेमचंद, शिवानी, शरतचंद, चेखव और दोस्तोवोस्की जैसे लेखक शामिल थे.

विवाह की पूनम इनमे से किसी एक की नायिका की तरह थी. सो 'नागमणि' की नायिका को भी समझ लूँगी. हालाँकि निर्देशक संजय सिंह की इस फ़िल्म के बारे में मेरी अभी तक अंतिम बात नहीं हुई है. यह एक इंडो-फ्रेंच फ़िल्म है .

<b>यानी आप माधुरी और तब्बू की श्रेणी में आ गई हैं?</b>

मैं उनके मुकाबले कुछ नहीं हूँ. वे प्रतिभाशाली अभिनेत्रियाँ हैं.

<b>आपने तेलुगु फ़िल्म 'अतिथि' करने के बाद साउथ की दूसरी फ़िल्में क्यों नही की?</b>

मैं हिंदी फ़िल्मों में व्यस्त हो गई. लेकिन यदि मौक़ा मिलेगा तो फिर कोशिश करूँगी.

<b>माधुरी और तब्बू के बाद हुसैन आप पर काफ़ी मेहरबान रहे हैं?</b>

उन्होंने मुझ पर जो चित्र बनाए, उन्हें देखकर मैं केवल रो सकती हूँ. मैंने उनसे निवेदन किया था कि वे मेरे साथ ख़ुद को भी किसी पेंटिंग में दिखाएँ. उन्होंने जिस ब्रश से मेरी पेंटिंग्स बनाई वो मुझे उपहार में दे दिया था. वे नब्बे साल से ऊपर के हैं. ईश्वर उन्हें सलामत रखे.

<b>आप अब नंबर वन अभिनेत्रियों की कतार में हैं लेकिन आप अभी भी मुंबई की फ़िल्मी पार्टियों और माहौल से दूर रहती हैं?</b>

मैं मुंबई में अपनी माँ और परिवार के साथ रहती हूँ. मैं यहाँ काम करने आई हूँ पार्टियों की शोभा बनने नहीं. मुझे अफ़वाहों से डर लगता है. मैं उनका हिस्सा नहीं बनना चाहती. आपने ही कहा ना कि छवि सबसे महत्वपूर्ण होती होती है. मैं अपनी छवि नहीं बिगाड़ना चाहती. (हंसती हैं).