'अभिनय सबसे कठिन काम है'

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं सत्या फ़िल्म के 'भीखू म्हात्रे' यानी हिंदी फ़िल्मों के चर्चित अभिनेता मनोज वाजपेयी से.

<b>सबसे पहले ये बताएं कि आपको ख़ुद में क्या अच्छा लगता है. अपनी आवाज़, अपना व्यक्तित्व या अपना अभिनय?</b>

मेरा मानना है कि छलावा बहुत देर नहीं रह पाता. व्यवहार से आप पकड़े जाते हैं. मैं जैसा हूँ, उसमें मुझे ज़्यादा आराम है और मुझे ऐसा होने में ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती. वैसे भी अभिनय काफ़ी कठिन काम है, फिर व्यवहार क्यों मुश्किल रखा जाए.

<b>तो सच में अभिनय क्या बहुत कठिन काम है?</b>

मेरे हिसाब से अभिनय दुनिया का सबसे कठिन काम है. मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि आईटी या दूसरे क्षेत्रों के लोग कम मेहनत करते हैं. जैसे-जैसे आप ज़िंदगी जीते हैं, वैसे-वैसे अभिनय के आयाम बदलते हैं.

उम्र के हिसाब से अभिनय के मायने भी बदल जाते हैं. मैं अब भी नहीं जान पाया हूँ कि अभिनय होता क्या है. दूसरी बात ये कि ज़िंदगी के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, इसलिए भी अभिनय मुश्किल है.

<b>आपसे अभिनय की बारीकियाँ समझेंगे. लेकिन उससे पहले ये जानना चाहेंगे कि मनोज वाजपेयी क्या शुरू से ही अभिनेता बनना चाहते थे?</b>

देखिए, मैं गाँव का हूँ. किसान का बेटा हूँ. छह भाई-बहन हैं. जब से होश संभाला है, तब से मैं जानता हूँ कि मैं एक्टर बनना चाहता था. न मैं इंजीनियर बनना चाहता था, न डॉक्टर और न आईएएस बनना चाहता था. उसी राह को पकड़कर मैं चला. शायद उसी का परिणाम है कि मैं पेशेवर अभिनेता बन सका.

<b>तो आप इस मायने में ख़ुशकिस्मत रहे कि आप जानते थे कि आप क्या बनना चाहते हैं?</b>

पता नहीं, लेकिन मेरे साथ कुछ ऐसी घटनाएँ हुई हैं कि मैं भगवान को मानने पर मजबूर हो गया हूँ. मुझे लगता है कि मेरी पैदाइश ही अभिनय के लिए हुई है. मुझे शुरू से ही मंच पर जाने का शौक था.

मुझे कविता का पाठ करने में बहुत मज़ा आता था. अमिताभ बच्चन की फ़िल्म देखता था तो सोचता था कि मैं अभिनय कर रहा हूँ. इसलिए मुझे याद ही नहीं कि मैं कभी कुछ और बनना चाहता था.

<b>आपके कुछ पसंदीदा गाने?</b>

मेरे सबसे पसंदीदा गाने हैं 'सपने में मिलती है', ज़ुबैदा का 'धीरे-धीरे गाऊँ' अक्स का 'आ जा गुफाओं में आ'. इसके अलावा 'रिमझिम गिरे सावन' भी मुझे बहुत पसंद है. गजनी का 'कैसे तुम मुझे मिल गईं' भी मुझे बहुत पसंद है. इसके अलावा के केके गाने भी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं.

<b>फ़िल्म इंडस्ट्री में आपको लगभग 15 साल हो गए हैं. कैसा रहा ये सफ़र?</b>

मेरा ग्राफ़ फ़िल्मों में उतार-चढ़ाव भरा रहा है और थिएटर में भी ऐसा ही था. लेकिन जहाँ तक बात मेरी फ़िल्मों की है तो मैं इससे संतुष्ट हूँ कि मैंने ग़लतियाँ बहुत कम की हैं और अच्छे काम ज़्यादा किए हैं.

वो इसलिए भी कि मुझमें काफ़ी धैर्य है और मैं साल में एक-दो फ़िल्म ही करता हूँ. मैं बॉक्स ऑफ़िस जैसी चीज़ों पर निर्भर नहीं करता. न ही कभी ये सोचता हूँ कि मेरे पत्रकार भाइयों या दर्शकों को ये फ़िल्म कैसी लगेगी. मैंने कभी ये उम्मीद नहीं की कि कोई मेरे काम को पसंद करेगा, मुझे फ़र्क इस बात से पड़ता है कि मैं इसे पसंद करता हूँ कि नहीं.

<b>लेकिन क्या वाक़ई आपको इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि दर्शकों को आपका काम पसंद आए या नहीं?</b>

अगर मैं लोगों के हिसाब से अभिनय करूँ तो मुझे उनके हिसाब से पहनना, चलना और दिखना पड़ेगा. तो ज़रूरत इस बात की है कि जो काम आप करें वो सबसे पहले आपको पसंद आना चाहिए. आप जो भी काम करें उसके पोर-पोर में घुस जाएँ.

<b>आपने कहा कि अब तक के सफ़र में आपने बहुत कम ग़लतियाँ कीं. तो वो ग़लतियाँ क्या थी?</b>

जीवन में बहुत सी ग़लतियाँ की. आदमी छोटी-बड़ी ग़लतियाँ करता है और ये जीवन का हिस्सा हैं. अभिनय भी कुछ इसी तरह है. मैं डेढ़ साल में एक फ़िल्म करता हूँ और बाद में पता चलता है कि ये फ़िल्म मेरे ज़ीवन की सबसे बड़ी भूल थी. लेकिन क्योंकि मुझे उस फ़िल्म को पूरा करना है तो सोचिए उसकी शूटिंग, डबिंग करना कितना दर्द देने वाला है.

फिर भी मैं कह सकता हूँ कि मैंने बहुत कम ग़लतियाँ की हैं. ज़्यादातर वो फ़िल्में की हैं जिन्हें जब मैं बुढ़ापे में अपने बच्चों के साथ देखूँगा तो गर्व के साथ कह सकता हूँ कि ये मेरी फ़िल्म है.

<b>अच्छा ये बताएँ कि आप ख़ुद को कितना ही अलग बनाएँ, लेकिन एक ख़ास छवि बन जाती है. आपका क्या कहना है?</b>

मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ. मैं लोगों से मिलता रहता हूँ. तो मुझे पता चला कि किसी को ज़ुबैदा पसंद आती है तो किसी को शूल. और उन्होंने कई-कई बार ये फ़िल्में देखी हैं. मेरी सबसे बड़ी सफलता ये रही कि बैंडिट क्वीन और तमन्ना करने के बाद मुझे सत्या में बड़ी पहचान मिली.

पहली बार लोगों ने अंडरवर्ल्ड के व्यक्ति को आम आदमी के रूप में देखा. कौन, शूल, घात, ज़ुबैदा, अक्स जैसी अलग-अलग तरह की फ़िल्में की, जिन्हें लोगों ने काफ़ी पसंद किया. तो मुझे सुकून इस बात का है कि सत्या में यादगार भूमिका करने के बाद भी मैं उस तरह की छवि में नहीं बंध पाया.

<b>फिर भी भीखू म्हात्रे की बात तो अलग ही थी. तो क्या दिमाग़ में कुछ किरदार था या फिर रामगोपाल वर्मा की सोच थी?</b>

देखिए भीखू म्हात्रे का किरदार अनुराग कश्यप ने लिखा था, लेकिन म्हात्रे नाम मैंने भीखू के आगे लगाया था. यहाँ तक कि डाँस पर भी मैंने कोरियोग्राफ़र से कहा कि मैं 1-2-3 पर नहीं नाच सकता और अपने हिसाब से नाचा.

शूल में भी मैंने कहा कि ये किरदार रोमांटिक गाना नहीं गाएगा, लेकिन ज़ुबैदा में रोमांटिक गाना फ़िल्माया गया, क्योंकि ये किरदार की मांग थी.

<b>तो पेड़ों के आगे-पीछे नाचने में आपको कोई दिक्कत नहीं है?</b>

मेरे अभिनय में किसी तरह की नैतिकता नहीं है. अभिनय की जो मांग है मैं वो करूँगा. अगर किरदार की मांग है तो मैं निर्वस्त्र भी हो जाऊँगा, लेकिन अगर सिर्फ़ दर्शकों को उत्तेजित करने के लिए ऐसा किया जाए तो मैं नहीं करूँगा.

<b>बतौर अभिनेता क्या आपको लगता है कि किसी किरदार को अब कुछ अलग तरह से करते?</b>

पिंजर और 1971 को छोड़कर मुझे लगता है कि मैं अपनी कई सारी फ़िल्मों के कुछ सीन दोबारा करना चाहूँगा. मैंने अपने अभिनय के नए आयाम बनाए हैं और मुझे लगता है कि इन दोनों फ़िल्मों में मैंने उन आयाम को छुआ है.

<b>अभी किस फ़िल्म पर काम चल रहा है?</b>

अभी फ़िल्म 'जुगाड़' पर काम कर रहा हूँ. ये छोटे बजट की प्रायोगिक फ़िल्म है. इस फ़िल्म में मेरे अलावा सभी जुगाड़ू हैं.

<b>पिछले दो-चार साल में ऐसी कौन सी फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं, जिन्हें देखकर आपको लगता है कि काश ये रोल मैं करता?</b>

खोसला का घोसला, ओए लक्की लक्की ओए का डायरेक्शन मुझे बहुत अच्छा लगा. मेरे हिसाब से ओए लक्की लक्की ओए पिछले साल की सबसे बेहतरीन फ़िल्म है. वो फ़िल्म इसलिए नहीं चली कि 26/11 की घटना घट गई और लोग सार्वजनिक स्थानों से दूर रहे. इस फ़िल्म की ख़ासियत थी नए तरीके से समाज को देखना. इस फ़िल्म में दिखाया गया कि समाज का पूरा बाज़ारीकरण हो गया है. गंभीर बात को हंसते-हंसते कहा गया. ये बातें मुझे बहुत अच्छी लगी.

<b>तो आप बड़े डायरेक्टरों से इसलिए तो नहीं बचना चाहते कि ऊंची दुकान और फीके पकवान?</b>

नहीं ऐसा नहीं है. मैंने महेश भट्ट, शेखर कपूर, रामगोपाल वर्मा, श्याम बेनेगल, जे पी दत्ता के साथ काम किया. साथ ही कई नए डायरेक्टर के साथ काम किया जो बाद में बड़े नाम बन गए. लेकिन आजकल सिनेमा में एक तब्दीली आई है. व्याकरण बदला है. ये ऐसा बदलाव है जिसे नोटिस किया जाना चाहिए.

<b>तो इन बड़े डायरेक्टरों के साथ काम करने का मन करता है?</b>

हाँ वीर ज़ारा में अतिथि भूमिका की थी. सिर्फ़ इसलिए कि ये कह सकूँ कि यश चोपड़ा के साथ काम किया था. फिर जाने कभी काम करने का मौक़ा मिले न मिले. मुझे किसी के साथ काम करने में कोताही नहीं है बशर्ते कि मैं उनकी ज़रूरत हूँ.

<b>कौन सी अभिनेत्री के साथ काम करने में मज़ा आया?</b>

मुझे तब्बू के साथ काम करने में मज़ा आया. दिल पे मत ले यार मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में से है. मेरी उनके साथ दूसरी फ़िल्म घात थी और इसमें भी मज़ा आया.

<b>और किसके साथ काम करने का मन था और मौका नहीं मिला</b>?

माधुरी दीक्षित के साथ काम करने का मन था. जब मैं फ़िल्मी दुनिया में जम रहा था उस समय माधुरी का दबदबा था. पता नहीं उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा भी कि नहीं. मुझे लगता है कि पिछले 20 साल में उन जैसी डांसर कोई और नहीं हुई है.

<b>और कौन सी अभिनेत्रियाँ पसंद हैं?</b>

शबाना आज़मी मुझे बहुत अच्छी लगती हैं. कोंकणा सेन भी काफ़ी अच्छी अभिनेत्री लगती हैं.

<b>आपका पहला इश्क?</b>

पहले क्रश की बात करूँ तो ये तब हुआ जब मैं बारहवीं क्लास में था. उसने कभी मुझे पलटकर नहीं देखा. पहला इश्क काफ़ी उम्र में हुआ. कॉलेज पास करने के बाद मेरा पहला इश्क हुआ. वो भी थिएटर के जमाने में हुआ. ये सिर्फ़ चार-पाँच महीने चला. हम दोनों मज़बूत दिमाग वाले थे तो ये इश्क ज़्यादा दिनों तक नहीं चला.

दरअसल, ज़िंदगी को इतने क़रीब से जिया है कि राय इस तरह बनी है. तो दूसरे को समझने-समझाने में वक़्त लगता है.

<b>आपकी अपनी पत्नी के साथ कैसे मुलाक़ात हुई?</b>

हमारी मुलाक़ात एक दोस्त की पार्टी में हुई. नज़रें लड़ी, प्यार हुआ. छह साल तक डेटिंग हुई और फिर चार साल से हम शादीशुदा हैं.

<b>आपकी ज़िंदगी का सबसे खुशनुमा और हसीन पल?</b>

मेरी ज़िंदगी का सबसे खुशनुमा पल था जब पिंजर के लिए मुझे नेशनल अवॉर्ड मिला था. और शादी को मेरी ज़िदगी का हसीन पल कहा जा सकता है.

<b>आपके लिए अवॉर्ड कितना मायने रखते हैं?</b>

मेरे लिए नेशनल अवॉर्ड बहुत मायने रखता है. बाकी ज़्यादातर अवॉर्ड बॉक्स आफ़िस के कारोबार पर निर्भर करते हैं. लेकिन अवॉर्ड काम को मिलना चाहिए न कि बिज़नेस को.

<b>आपको शर्मसार कर देने वाले पल?</b>

बहुत सारे हैं. मैं अक्सर अपने क़रीबी लोगों के नाम भूल जाता हूँ.

<b>आप डायरेक्शन में उतरना चाहेंगे?</b>

देखिए, करना तो चाहता हूँ, लेकिन जब अपने भीतर झांकता हूँ तो मुझे डायरेक्टर कहीं नज़र नहीं आता, इसलिए अभी तक डायरेक्टर नहीं बन सका.

<b>आपके पसंदीदा डायरेक्टर?</b>

शेखर कपूर और महेश भट्ट. मुझे लगता है कि शेखर को और ज़्यादा काम करना चाहिए. उनके साथ काम करने में मुझे बहुत मज़ा आया. नए लोगों में मुझे ओए लक्की लक्की ओए के डायरेक्टर भी पसंद हैं.

<b>आपके पसंदीदा अभिनेता?</b>

अमिताभ बच्चन के अलावा मुझे नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी बहुत पसंद हैं. इनके काम से मैंने काफ़ी कुछ सीखा है. अमितजी को मैं इसलिए पसंद करता हूँ कि उनकी भाषा बहुत अच्छी है और वो अपने काम को लेकर बहुत धीर-गंभीर हैं. नसीर और ओमपुरी से भी काफ़ी कुछ सीखा है.

<b>अगर आपको अपने बारे में कुछ लिखना हो तो क्या लिखेंगे?</b>

मेरा फ़ोकस और इच्छा शक्ति बहुत मज़बूत है. इच्छा शक्ति इस मायने में कि अगर 10 लोग कोई अलग बात कह रहे हों, लेकिन मुझे वो ठीक नहीं लगती तो मैं नहीं करूँगा.

<b>मनोज वाजपेयी अगर ख़ुद में कुछ बदलना चाहेंगे तो वो क्या होगा?</b>

मैं दूसरों के विचारों को समझना चाहता हूँ. मैं कोशिश कर रहा हूँ. समाज बदल रहा है. मैं कंप्यूटर चलाना नहीं जानता हूँ, लेकिन आज छोटे से छोटा बच्चा ये जानता है.

<b>आप आराम कैसे करते हैं?</b>

मैं सुबह प्राणायाम करता हूँ. कपालभाति, अनुलोम विलोम. वो चाहे 15 मिनट के लिए ही करूँ, मुझे अच्छा लगता है. मुझे पूजा करना अच्छा लगता है. जो पूजा नहीं करते, उनके लिए भी मेरे मन में पूरी इज्ज़त है. ये सब चीजें हैं जिनमें मैं ख़ुद को उलझाए रखता हूँ.

<b>आप अच्छे-बुरे में यकीन रखते हैं?</b>

ये नैतिकता या अच्छाई-बुराई सिर्फ़ मेरे लिए है. अगर कोई दो पत्नियां रखे हुए है तो मेरा उसके साथ मतभेद नहीं है. कोई अगर शादी नहीं कर रहा है तो उससे भी मतभेद नहीं है. लेकिन जब बात मेरी आती है तो मैं अपने तरीक़े से जीना पसंद करता हूँ, मैं जीवन को जटिल नहीं बनाना चाहता.

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