'सब कुछ पिता से विरासत में मिला'

सोनम
Image caption सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेत्री का अवार्ड पाने वाली सोनम के पास गिनी चुनी फ़िल्में हैं.

संजयलीला भंसाली की फ़ेदयोर दोस्तोवोस्की की लघु कहानी व्हाइट नाइट्स पर बनी फ़िल्म 'सांवारिया' से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अभिनेता अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर की पहली फ़िल्म तमाम चर्चाओं के बावजूद भले ही असफल रही हो लेकिन उस फ़िल्म से वे लोगों की नज़रों में जरूर आ गईं.

सांवरिया के बाद सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेत्री का अवार्ड पाने वाली सोनम के पास इस समय फ़िल्म के प्रस्तावों का ज़खीरा नहीं है. हालाँकि 'रंग दे बसंती' से चर्चा में आने वाले निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आने वाली नई फ़िल्म 'दिल्ली-6' के प्रोमोज देखने के बाद फ़िल्मों के पंडित मान रहे हैं कि उनके साथ ही मैदान में आने वाली दीपिका पादुकोण और हाल में ही मैदान में उतरीं आसीन और अनुष्का शर्मा के लिए भी वे चुनौती साबित हो सकती हैं. ये अलग बात है कि इन अनुमानों के बावजूद फ़िल्म फ़ेयर अवार्डों की घोषणा करते हुए दिल्ली में जब वे मिलीं तो अपने पिता अनिल कपूर की तरह ही विनम्र, शर्मीली और बातचीत में सहजता से चुटकियाँ लेते हुई दिखीं.

उनके आत्मविश्वास में ग़ज़ब की चमक दिखाई देती है और उनका मानना है कि यह सब उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला है. आपके पिता की तरह आपने अपनी शुरुआत सफल फ़िल्म से नहीं की? ऐसा नहीं है, उन्होंने अपने करियर की शुरूआत शक्ति और राजश्री की फ़िल्मों में छोटी छोटी सी भूमिकाओं से की. उनकी सबसे शानदार हिट फ़िल्म 'वो सात दिन' तो काफ़ी बाद में आने वाली फ़िल्म थी.

जहाँ तक मेरी फ़िल्म सांवारिया की बात है तो वो दोस्तोवोस्की की एक छोटी कहानी व्हाइट नाइट्स पर बनी थी. यह कहानी आज भी दुनिया भर के फ़िल्मकारों के बीच जिज्ञासा की तरह है. वर्ष 1845 में लिखी गई इस कहानी पर इटली के लूचिनो विन्स्कोती, फ्रांस के रॉबर्ट्स बरसन, इरान के फ़र्जाद मोतेमां और हमारे यहाँ भी मनमोहन देसाई छलिया जैसी फिल्म बना चुके हैं. यह कालजई कहानी है. आपके पिता के पास अपनी शुरुआत बाहर से करने के लिए कई कारण थे. पर आप तो अपने घर से अपनी शुरुआत कर सकती थीं? हाँ कर सकती थी, पर मेरा इरादा अभिनेत्री बनने का कभी नहीं था. मैं तो सिंगापुर में थियेटर आर्ट और चीनी इतिहास की पढ़ाई कर रही थी. जब वापस आई तो मैंने पापा से कुछ रचनात्मक करने के बारे में बात की. पापा ने कहा, जो कुछ करना है अपने आप करो. मैंने सोचा कि नब्बे किलो की लड़की से कौन बात करेगा. मैंने जब संजयलीला भंसाली के यहाँ प्रोडक्शन और कैमरे के पीछे काम सीखने की बात की तो उस समय वो देवदास बना रहे थे और ब्लैक की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने कहा कि तुम तो इतनी सुंदर हो फिर कैमरे के पीछे क्यों काम करना चाहती हो. सांवरिया के लिए मेरा चुनाव कायदे से तभी हो गया था लेकिन उसके लिए मुझे न केवल अपना वज़न कम करना पड़ा बल्कि उनका सहायक भी बनना पड़ा. आप कभी अभिनेत्री नहीं बनना चाहती थी तो फिर अब क्यों बन गई? इसे सिर्फ़ एक संयोग कहा जा सकता है. मैं सिर्फ़ अपने भविष्य की एक नई दुनिया की तलाश में थी. सांवरिया नहीं चली पर अब आपको लगता है कि दिल्ली-6 आपके करियर में सहायक सिद्ध होगी. कहा जा रहा है कि अब आप अपनी समकालीन दीपिका पादुकोण और आसिन के साथ अनुष्का शर्मा के लिए भी ख़तरा बन गई हैं? (हंसकर) मैं अपने बारे में इतना बड़ा दावा नहीं कर सकती. मैंने तो सांवरिया में भी इतनी ही मेहनत की थी, मुझे नहीं लगता कि संजयलीला भंसाली से संवेदनशील किस्म का निर्देशक हमारे यहाँ है. एक फ़िल्म के बाद किसी कलाकार के बारे कुछ नहीं कहा जा सकता. संजय एक टीचर की तरह वाले निर्देशक हैं. उनसे जो सीखा उसका इस्तेमाल मैंने राकेश मेहरा की फ़िल्म में किया. प्रायोगिक सिनेमा और कमर्शियल को मिलाकर उन्होंने रंग दे बसंती जैसी फ़िल्म में जो कथावस्तु और पात्रों का शिल्प रचा, दिल्ली-6 उसका नया विस्तार कहा जा सकता. उनके साथ काम करना रोमांच भरा है. दुबई में जब यह फ़िल्म एक समारोह में विशेष रूप से दिखाई गई तो मैं हैरान थी कि वहां लोगों के लिए यह एक नई तरह की फ़िल्म थी.

आपकी भूमिका, मसक अली जैसे बोलों वाले गीत में आपके नाच, प्रोमोज में आपकी अभिव्यक्तियों और शारीरिक भाषा के नए इस्तेमाल की आजकल ख़ूब चर्चा हो रही है?

दरअसल फ़िल्म एक ऐसे लड़के की कहानी है जो अमरीका से भारत आया है और बदलते भारत के बीच उसकी मुलाक़ात मेरी भूमिका वाली बिट्टू नाम की लड़की से होती है जो संगीत की दुनिया में चमत्कार करने जैसे सपने देखती है. यह फ़िल्म ऐसे युवाओं के बारे में भी है जो सपनों को पूरा करने के लिए ग़लतियाँ करते हैं और फिर उनसे सीखते हुए ख़ुद को साबित करते हैं.

जहाँ तक गीत की बात है तो उसमें लोग मेरे जिस नाच और शारीरिक भाषा की बात कर रहे हैं तो उसके लिए तो उन्हें मेरी कोरियोग्राफ़र वैभवी मर्चेंट और गीतकार प्रसून जोशी को शुक्रिया अदा करना चाहिए. अपनी पहली फ़िल्म में आपने एक चुपचाप रहने वाली लड़की सकीना की भूमिका की और अब एकदम चंचल लड़की की भूमिका में हैं. दोनों में क्या अंतर है?

सकीना मेरे लिए एक जटिल भूमिका थी. मैं उसकी चुप्पी के लिए अतिरिक्त प्रयास करती थी. जबकि बिट्टू मेरे वास्तविक जीवन से मेल खाने वाली है. मैं सपने देखती हूँ और कई बार मुझसे ग़लतियाँ हो जातीं हैं लेकिन मैं अपने पापा की तरह उनसे सबक़ लेकर आगे बढ़ जाती हूँ. रणबीर कपूर और अभिषेक बच्चन के बारे में क्या राय रखती हैं? दोनों ही कमाल के अभिनेता हैं. सांवारिया के समय मैं और रणबीर दोनों नए थे, लेकिन उनके मुक़ाबले अभिषेक काफ़ी परिपक्व और प्रोफेशनल किस्म के अभिनेता हैं.

आपके साथ के रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण फ़िल्मों में काम करने के मामले में आपसे आगे बढ़ गए हैं. पर आप इतनी पीछे क्यों चल रही हैं?

ऐसी बात नहीं है. जब सांवरिया रिलीज़ हुई थी तभी मैंने दिल्ली-6 साइन की थी. लेकिन मैं यहाँ किसी से मुक़ाबला करने नहीं आई. मेरे पिता कभी नंबर वन स्टार नहीं रहे लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से जो जगह बनाई वो अब तक बनी हुई है.

कहा जा रहा है कि आपके पिता ने सांवरिया के बाद आपको करियर को मैनेज करने में काफ़ी मदद की? हर पिता अपनी संतान की बेहतरी के बारे में सोचता है, लेकिन उन्होंने मेरी कभी सिफ़ारिश नहीं की. यहाँ तक कि मेरी पहली फ़िल्म के सेट पर भी वो केवल एक बार ही गए और जब उन्होंने मुझे शूटिंग करते देखा तो वो रो पड़े. उन्हें मुझ पर गर्व है कि मैंने बिना उनकी मदद लिए उन्ही की तरह अपना रास्ता बना लिया है. आपने फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड की घोषणा के समय एक बात कही कि आप मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुई हैं तो इसका मतलब क्या था? मुझसे कोई सवाल पूछ रहा था कि आपने अपने पिता की हैसियत का फ़ायदा क्यों नहीं लिया तो मैंने कहा कि मेरे पिता और उनके भाई फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में रहे और पिता ख़ुद एक बड़े सितारे. पर मैं अपने पिता की तरह संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना चाहती हूँ. मेरे ऊपर उनकी बेटी होने का तनाव ज़्यादा रहा है. मेरे पापा ने कहा कि वे नहीं चाहते कि कोई सोनम को अनिल कपूर कि बेटी कहकर पुकारे. यह अलग बात है कि जब सांवरिया रिलीज़ हुई और अब जब दिल्ली-6 आ रही तो मुझसे ज़्यादा वो नर्वस हैं. ठीक वैसे ही जैसे वे अपनी फ़िल्मों को लेकर आज तक घबराए रहते हैं. अब तो वे अंतरराष्ट्रीय सितारे हो गए हैं और उनकी स्लमडॉग अब ऑस्कर में हैं, फिर भी? हाँ! मुझे याद है जब उन्हें 'पुकार' के लिए राष्ट्रीय अवार्ड मिला था, तो लोगों ने कहा कि अब उनके करियर का सपना पूरा हो गया, तो उन्होंने कहा कि नहीं अब तो उनके करियर की नई शुरुआत हुई है. अब उन्हें पुकार से भी बेहतर काम करना होगा. स्लमडॉग में उनकी भूमिका कमाल की है. यह वो ही भूमिका है जिसे कुछ बड़े कलाकारों ने छोड़ दिया था. उनकी कौन सी फ़िल्म आपको ज़्यादा पसंद है और कौन सा सीन? वे मेरे आदर्श अभिनेता भी हैं. उनकी सभी फिल्में मुझे शानदार लगती हैं, लेकिन मुझे उनकी पुकार, ईश्वर, परिंदा, करमा, वो सात दिन और रामलखन ज़्यादा पसंद हैं. मैं पुकार में उनका एक सीन कभी नहीं भूलती जिसमें बिना किसी क़सूर के उनके मैडल उतार दिए जाते हैं. अब दिल्ली-6 के बाद कौन सी फ़िल्मों में आने वाली हैं? फिलहाल कुछ नहीं बता सकती. मैं अभी दिल्ली-6 का इंतज़ार कर रही हूँ और कुछ पटकथाएं पढ़ रही हूँ. मेरा इरादा फ़िल्मों का ढेर लगाने का नहीं है. मैं कुछ बेहतर काम करना चाहती हूँ.

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