महिला प्रधान फ़िल्में घाटे का सौदा :विद्या

  • 29 जून 2009
विद्या बालन
Image caption विद्या बालन ने परिणीता, हे बेबी और भूल भुलैया जैसी फ़िल्मों में काम किया है.

ख़ूबसूरत, प्रतिभावान..युवा फ़िल्म अभिनेत्री विद्या बालन के लिए ऐसे कई विशेषण आप इस्तेमाल कर सकते हैं.

काफ़ी कम उम्र में विद्या ने फ़िल्मी दुनिया में अपने दम पर अपने लिए जगह बनाई है.

जम्मू में एक सैनिक शिविर में समय बिताने के बाद थकान भरे सफ़र से मुंबई लौटी विद्या ने महिला दिवस के मौके पर फ़ोन के ज़रिए बीबीसी से विशेष बातचीत की.

विद्या का मानना है कि फ़िल्म आज भी व्यवसायिक स्तर पर हीरो के नाम पर ही चलती है, इसलिए फ़िल्मकार महिला प्रधान फ़िल्में बनाने से हिचकिचाते हैं और अभिनेत्रियों को पैसे भी कम मिलते हैं.

पेश है विद्या बालन से बीबीसी संवाददाता वंदना की बातचीत के कुछ मुख्य अंश.

महिला दिवस आपके लिए एक ख़ास दिन होता है या आम दिनों की तरह इसे मनाती हैं? साल का हर दिन गुज़रने के बाद हमारी उम्र एक दिन बढ़ती है फिर भी हर साल हम जन्मदिन मनाते हैं. उसी तरह से रोज़ महिला दिवस ज़रूर होता है लेकिन फिर भी एक ख़ास दिन चुना गया है जो अच्छी बात है. महिलाओं ने हर क्षेत्र में जो कुछ भी हासिल किया है उसका जश्न मनाने का दिन है.

वो कौन सी महिलाएँ रही हैं जिन्होंने आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया? सबसे पहली तो मेरी माँ जो होममेकर हैं, घर में रहती हैं. उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी ईंट पत्थरों के मकान को घर बनाने में समर्पित कर दी है. हम शायद गृहणियों की अहमियत पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं. मेरी बहन ने भी मुझे बहुत प्रेरणा दी है, वो कॉरपोरेट जगत में है. मैने बचपन से यही चाहा था कि मैं अपनी बहन की तरह बनूँ. उसने ज़िंदगी में वो सब कुछ किया जो वो करना चाहती थी. सार्वजनिक जीवन में शबाना आज़मी की मैं बहुत इज़्ज़त करती हूँ. उनके जैसी अभिनेत्री देश में ही दुनिया में बहुत कम है. उन्होंने ज़िंदगी अपने क़ायदों के मुताबिक जी है.

आम ज़िंदगी में भी कई ऐसी मिसाले हैं. जब मैं कॉलेज जाने के लिए लोकल ट्रेन में जाती थी तो देखती थी कि कई महिलाएँ काम-काज के लिए आ-जा रही हैं, कोई साथ में सब्ज़ी काट रही है. कई मुद्दों पर चर्चा हो रही है. ज़िंदगी में अलग-अलग मौकों पर कई महिलाओं ने मुझे प्रभावित किया है.

आपने बताया कि पहले आप लोकल ट्रेन में सफ़र करती थी लेकिन अब सेलिब्रटी होने के नाते ऐसी कई चीज़ों से आपको नहीं गुज़रना पड़ता जो एक आम लड़की को झेलनी पड़ती है. मुंबई में नए साल पर क्या हुआ सबने देखा. महिलाओं के ख़िलाफ़ और भी कई अपराध होते हैं. ये सब चीज़ों आपको परेशान करती हैं? बहुत परेशानी होती है और ग़ुस्सा भी बहुत आता है कि कैसे इतने सारे लड़कों ने दो लड़कियों को घेर लिया. लेकिन सच है कि ऐसा हर जगह होता है. ऐसा क्यों होता है इसके मायने भी कभी-कभी समझ में नहीं आते. लेकिन इसका मुक़ाबला इसी से किया जा सकता है कि आप चुप न रहें. सही समय पर सही मुद्दों को उठाया जाए. हम लोग ज़्यादातर चुप बैठते हैं, इसलिए ये अपराध होते रहते हैं.

अगर आज के दिन एक चीज़ बदलना चाहें जिससे महिलाओं की ज़िंदगी बेहतर हो सके, तो क्या बदलना चाहेंगी. मौके तो लड़कियों को अब काफ़ी मिल रहे हैं लेकिन मानसिकता बदलनी होगी. ख़ुद महिलाओं को भी. उनके मन में भी डर रहता है क्योंकि कई पीढ़ियों से उन्हें वैसे ही पाला-पोसा गया है. कभी-कभी हम ख़ुद पर ही शक करने लगती हैं. महिलाओं को ये समझना होगा कि कुछ भी असंभव नहीं है और वो हर चीज़ अपने क़ायदों के मुताबिक हासिल कर सकती है. क्या 10-15 सालों में ऐसा हो पाएगा? दस-पंद्रह साल पहले के मुकाबले आज चीज़ें बदली हैं, कुछ सालों बाद और बदलेंगी. इस बार बदलाव की रफ़्तार तेज़ होगी क्योंकि अब कई सारी महिलाएँ अलग-अलग क्षेत्रों में नाम कर रही हैं और इससे बाक़ी लड़कियों को प्रोत्साहन मिल रहा है कि वो अपनी मानसिकता बदल सकें.

फ़िल्मों की बात करें तो आपने परिणीता जैसी फ़िल्म से शुरुआत की जिसमें आपकी सशक्त भूमिका थी. लेकिन महिला प्रधान फ़िल्में आजकल कम बनती हैं.

दरअसल बात ये है कि व्यवसायिक स्तर पर फ़िल्म आज भी हीरो के नाम पर चलती है, इसलिए फ़िल्में भी उनके इर्द-गिर्द घूमती हैं. अभिनेत्री के लिए सशक्त रोल वाली फ़िल्म निर्माता के लिए फ़ायदे का सौदा नहीं है. लेकिन अच्छी बात ये है कि आजकल बहुत सारी छोटी बजट की फ़िल्में बन रही हैं जिनमें व्यवसायिक स्तर पर नुकसान की आशंका कम होती हैं और आप अपने तरीके की फ़िल्में बना सकते हैं. मदर इंडिया या बंदिनी के दौर के बाद ज़रूर एक तरह की गिरावट आई थी जब ऐसी फ़िल्में बननी कम हो गई. लेकिन अभिनेत्रियों को अब धीरे-धीरे ऐसी फ़िल्में मिलने लगी हैं. बहुत सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं.प्रयोग चल रहा है, उम्मीद करती हूँ कि जल्द ही चीज़ें बदलेगी. समाज में लड़के-लड़कियों में कई बार भेदभाव होता है. बॉलीवुड महिलाओं के लिए कैसी जगह है. निजी स्तर पर मुझे बहुत इज़्ज़त मिली है. मैं भाग्यशाली हूँ कि बहुत अच्छे रोल भी करने को मिले हैं- ऐसी महिलाओं के रोल जिन्होंने हर काम अपनी शर्तों के मुताबिक किया. हाँ हीरो-हीरोइन की फ़ीस में यहाँ बहुत अंतर होता है. किसी महिला निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिला है? अभी तक तो नहीं किया लेकिन उम्मीद करती हूँ कि जल्द ही वो सपना भी पूरा होगा. मैं अपर्णा सेन, मीरा नायर और दीपा मेहता के साथ काम करना चाहूँगी. आपको अब तक सबसे प्यारा कॉम्पलिमेंट क्या मिला है आज तक? ऐसे तो बहुत से लोगों ने अच्छी-अच्छी बातें कही हैं लेकिन चूँकि हम महिला दिवस पर बात कर रहे हैं तो याद आता कि किसी ने मुझसे कहा था कि 'यू आर ए वूमन फ़ॉर एवरी सीज़न एंड फ़ॉर एवरी रीज़न'..ये सुनकर बहुत अच्छा लगा था.

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