संघर्ष करके शिखर तक पहँचे सोनू निगम

सोनू निगम
Image caption सोनू निगम बचपन से ही स्टेज पर गाते रहे हैं

बीबीसी एक मुलाक़ात में इस हफ़्ते जो शख़्सियत हमारे मेहमान हैं वो जितनी ख़ूबसूरत आवाज़ के मालिक हैं उतने ही स्मार्ट ख़ुद भी हैं. कहा जाता है उनका मन भी बड़ा उज्ज्वल और आध्यात्मिक है. हम बात कर रहे हैं मशहूर पार्श्व गायक सोनू निगम की. मुझे पता चला है कि आपने साढ़े तीन साल की उम्र में ही गाना शुरू कर दिया था. इतनी कम उम्र से ही ये सब कैसे शुरू हो गया? पिताजी आपके गायक थे, तो क्या गायक बनने की बात शुरू से मन में थी? मैं यहाँ धर्म को बीच में लाऊँगा. जैसे किसी बच्चे को शुरू से बताया जाता है कि तू मुसलमान है, हिंदू या ईसाई है तो उसे लगता है कि यही दुनिया है. इसी तरह जब मैंने आँखे खोलीं तो मेरे चारों तरफ शो, कन्सर्ट थे. कभी पापा स्टेज पर गा रहे थे तो कभी मम्मी. इससे मुझे लगने लगा कि यही दुनिया है और मैं भी यही करूँगा. मुझे कभी मम्मी या पापा ने नहीं कहा कि गायक ही बनना है.

एक दिन जब मेरे पापा स्टेज पर गा रहे थे, ‘क्या हुआ तेरा वादा…’ तो मैं भी रोने लगा कि ऊपर जाकर गाऊंगा. मेरे पापा मम्मी को आँखें दिखाकर मुझे चुप कराने के लिए कह रहे थे तो लोगों ने कहा कि आने दीजिए बच्चा है, नहीं भी गा पाएगा तो क्या हो जाएगा. फिर मैं ऊपर जाकर पापा के साथ गाने लगा तो लोगों को लगा कि ये तो तैयार गायक है. उसके बाद मैं हर शो में पापा के साथ गाने लगा और फिर मुझे प्रोफ़ेशनल आर्टिस्ट के रूप में बुक किया जाने लगा.

कुछ लोगों का कहना है कि जब शुरू-शुरू में आप गाते थे तो उस पर रफ़ी साहब की गहरी छाप दिखाई देती थी.

इस सच्चाई को हम कैसे झुठला सकते हैं. जब मैं मुंबई गायक बनने आया था तो मेरी यही कोशिश होती थी कि रफ़ी साहब की आवाज़ को लेकर आऊं और उनके जैसा गाऊं. जैसे लता जी जब आईं थी तो वो नूरजहाँ जी से प्रेरित थीं और उनकी कोशिश होती थी कि नूरजहाँ के जैसा गाएँ. रफ़ी साहब जब आए थे तो वो ख़ुद बोलते थे कि वे जीएम दुर्रानी से प्रेरित थे, मुकेश जी ने तो पहला गाना ही के एल सहगल साहब के साथ गाया था.

इसलिए ये विश्वास नहीं किया जा सकता कोई किसी को सुने बिना या किसी से प्रेरित हुए बिना गा सकता है. फिर चाहे आप शास्त्रीय संगीत गा रहे हों या अंग्रेज़ी गाने, शुरू में किसी न किसी से प्रेरणा तो मिलती ही.

मोहम्मद रफ़ी साहब मेरे लिए भगवान हैं, और उनके गाने से कार्यक्रम की शुरुआत होने से अच्छी कोई बात हो ही नहीं सकती. हालांकि मैंने उनको कभी देखा नहीं लेकिन उनसे प्रेरणा लेकर और उनको सुन-सुन कर गाता रहा हूँ. इसके बाद जब काम मिलने लगता है और आँखें खुलती है और लगता हैं कि मैं ये भी कर सकता हूँ. मैंने बाद में कई इंग्लिश गाने सुने और अपनी शैली विकसित की. ‘परदेस’ फ़िल्म का ..ये दिल दीवाना... गाने से मैं वेस्टर्न स्टाइल की गायिकी को भारत में लेकर आया. इससे पहले इस स्टाइल से भारत में गाने नहीं गाए जाते थे.

आपने बचपन से काम शुरू कर दिया था लेकिन हमलोगों की यादों में आपकी पहली छवि ‘ज़ी' के 'सारेगामा’ की है. हमलोगों को हमेशा लगता था कि आप इतना अच्छा गाते हैं पर जो बात सबसे ज़्यादा दिल को छू जाती थी वो ये थी कि ये लड़का कितना विनम्र है, मेहमानों को कितना इज़्ज़त देता है. आप वास्तव में इतने विनम्र हैं कि आपने सोच रखा था ऐसे ही करना है?

सच पूछिए तो इसके सिवा मुझे कुछ पता भी नहीं था. ये तो मुझे अब समझ आता है कि लोग ये भी उम्मीद कर सकते हैं कि लड़का इतने बड़े शो में आएगा और अहम दिखाएगा जहाँ कई दिग्गज जज हुआ करते थे. मुझे लगता है कि अगर आप भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित कोई प्रोग्राम कर रहे हैं तो दूसरा कोई तरीक़ा भी नहीं है. आज भी ‘टैलेंट हंट’ प्रोग्राम हो रहे हैं पर वो गंभीरता कहीं नहीं है.

जब रविशंकर जी, गुलाम मुस्तफ़ा जी, नौशाद जी, परवीन सुल्ताना जैसे 9-10 लोग जज के रूप में हों तो उनके सामने कोई घमंडी आदमी ही अहम दिखा सकता है. ये वो लोग हैं जिनसे भारतीय शास्त्रीय संगीत की पहचान है और जिनसे फ़िल्मी संगीत की शुरुआत हुई. इसलिए मेरे पास इस शो को होस्ट करने का दूसरा कोई तरीक़ा भी नहीं था, ये मेरे दिल से ही निकलता था. अगर मैं किसी दूसरे तरीक़े से करता तो इसके लिए मुझे कुछ और बनना पड़ता.

जब ‘सारेगामा’ लोकप्रिय हो गया और लोग सोनू निगम को पहचानने लगे तो कैसा लगा?

इस ख़ुशी का एहसास मुझे सबसे पहली बार इसराइल में हुआ. वहाँ नवंबर, 1995 में मैं एक शो के लिए गया था और 'सारेगामा' मई में शुरू हो चुका था. मेरे साथ चंकी पांडे और कुछ अभिनेत्रियाँ भी थीं. जब हम एयरपोर्ट से निकले तो देखा लड़कियों ने चंकी पांडे को चूमना शुरू कर दिया, मैं पीछे सामान लेकर निकल रहा था और सोच रहा था हीरो आख़िर हीरो होता है. तभी अचानक मैंने देखा कि लड़कियों का हुजूम चंकी पांडे को छोड़कर मेर तरफ़ आ रहा था. मुझे लगा कि मेरे पीछे कोई स्टार आ रहा है. मैंने कल्पना भी नहीं की थी चंकी को छोड़कर लड़कियाँ मेरे पास आ जाएंगी. अचानक मैंने देखा कि मेरा मुँह लिपस्टिक से भर गया है और जो सामान मैं ट्रॉली में लेकर आ रहा था वो नीचे गिरा पड़ा है.

ये मेरा इस तरह का पहला अनुभव था और मुझे बहुत मज़ा आया. मैंने तो काफ़ी देर तक मुँह नहीं धोया और होटल में जाकर एक फ़ोटो खींचकर बाद में उसे माँ को दिखाया. हालांकि बाद में इस तरह के कई अनुभव हुए.

पर अगर आप इस खुशी में खो जाते हैं तो आपका काम बंद हो जाता है. शायद मेरा स्वभाव ऐसा है कि मैं जितना आगे बढ़ता गया उतना ही सतर्क होता गया, क्योंकि तेज़ी से चलते समय आपको ज़्यादा सावधान रहना पड़ता है. मैं समझ गया था बतौर गायक मेरी ज़िदगी बहुत तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है. गायक पृष्ठभूमि में रहता है और उसे उतना नहीं मिलता जितना मुझे वर्ष 1995 के बाद ही मिलने लगा था. पहली बार किसी गायक का पोस्टर गलियों में बिकने लगा था. मेरी बहन कहा करती थी कि देख भाई, तेरा यहाँ पोस्टर होगा और अक्सर ऐसा होता भी था.

मैंने इसे बरकरार रखने के लिए काफ़ी मेहनत की. 'सारेगामा' पर ध्यान दिया, रियाज़ किया, फ़िल्मी गीतों पर ध्यान दिया और पॉप एल्बम निकाले. मुझे याद है कि गुलशन कुमार की मौत के बाद जब मेरा टी-सीरीज़ से नाता टूटा तो मैंनें और ज़्यादा काम किया ताकि मेरे गाने फ़टाफ़ट सब जगह आ जाएँ.

'सारेगामा' होस्ट करने के दौरान ही फ़िल्मों में गाने का पहला मौक़ा मिला या फिर उसके पहले या बाद में?

मैं मुंबई 1991 में ही आ गया था और 'सारेगामा' 1995 में आया. चार साल तक मैंने मुंबई में बहुत धक्के खाए और मेरे पास बहुत कम काम था. हालांकि ‘अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का’ वाला मेरा एल्बम बहुत हिट था. इस पर ‘बेवफा सनम’ के नाम से फ़िल्म भी बनी. फ़िल्मों में मुझे पहला बड़ा ब्रेक बॉर्डर में ‘संदेशे आते हैं...’ से मिला और उसके बाद परदेस का गाना मिला.

मुझे शाहरुख़ ख़ान और सोनू निगम की जोड़ी कुछ-कुछ राजेश खन्ना और किशोर कुमार जैसी जोड़ी लगती है.

उतना तो नहीं है क्योंकि किशोर कुमार जी ने राजेश खन्ना के लिए निरंतर गाया है, रफ़ी जी ने उनके लिए उतना नहीं गाया है. आज का ज़माना ऐसा नहीं है. कोई किसी के लिए निरंतर नहीं गाता. शाहरुख़ के स्वभाव में जो जुनून है मैं उसके हिसाब से गाना गाता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह इस पर किस तरह से एक्टिंग करेंगे.

क्या गाने को लेकर म्यूज़िक डायरेक्टर के साथ-साथ अभिनेताओं से भी चर्चा होती है?

अगर अभिनेता वहाँ मौज़ूद हों तो चर्चा हो जाती है अगर नहीं हों तो इस पर आमूमन बात नहीं होती. कम से कम मेरे साथ तो ऐसा नहीं होता.

आपने कहा कि चार साल बहुत संघर्ष किया, कैसे थे वो दिन ?

सड़कों पर ग़रीबी में रहना जैसा संघर्ष तो पापा ने किया है. मैं जब 18 साल की उम्र में पापा के साथ 1991 में मुंबई में आया तो हम दोनों ने म्यूज़िक डायरेक्टरों के दफ़्तरों की बहुत खाक़ छानी. हम लोगों का संघर्ष मूल रूप से भावनात्मक था. मैं अपने स्कूल का टॉपर था और सभी बहुत इज्ज़त करते थे. जब मुंबई पहुँचा तो दफ़्तरों के चपरासी भी भगा देते थे और बहुत ही ख़राब तरीक़े से बात करते थे तो काफ़ी बुरा लगता था. कई संगीतकार तो आठ-आठ घंटे तक बिठाए रखते थे.

मुझे याद है कि एक बार एक आदमी ने मुझे और मेरे पापा को ऑफिस से भगा दिया था. उन्होंने मुझसे कहा कि आपकी आवाज़ में बहुत ज़्यादा विविधता है एक आवाज़ में गाकर सुनाइए. मैंने कहा कि मैं एक ही आवाज़ में क्यों गाऊं. उन्होंने कहा कि किशोर कुमार और रफ़ी साहब को देखों एक आवाज़ में गाते हैं. मैंने उनसे कहा कि क्या ये ज़रूरी है कि उन्होंने जो किया मैं वहीं करूँ. मैं गायक बनने के लिए अपना मज़बूत पक्ष लेकर आया हूँ इसे मेरी कमज़ोरी मत मानिए. तब उनको मेरी ये बात समझ में नहीं आई और वह बुरा मान गए और हम दोनों को भगा दिया.

उन दिनों जो लोग भगा देते थे आज उन लोगों से मुलाक़ात होती है?

हाँ, वैसे भी बदला लेने में विश्वास नहीं करता क्योंकि यह भावना आदमी को नकारात्मक बना देती है. मैं सफल हो गया, यही बदला था. और कुदरत ने उनके मुँह पर तमाचा मारकर इंसाफ़ कर दिया. बाद में वही लोग मेरे साथ फ़ोटो खिंचवाते हैं.

अब अपनी पसंद का एक और गाना बताएँ?

सूरज हुआ मद्धम.. चाँद जलने लगा, आसमाँ ये है.. क्यों पिघलने लगा....

आपकी आवाज़ इतनी अच्छी है, इसका एहसास आपको कब हुआ?

ये बात मुझे बचपन से ही पता थी. इसमें कोई घमंड वाली बात नहीं. आपको पता होना चाहिए कि आपका मज़बूत पक्ष और कमज़ोर पक्ष क्या है. मैं बचपन में मुख्य रूप से रफ़ी साहब और किशोर कुमार की शैली में गाने की कोशिश करता था क्योंकि उस समय यही दोनों सबसे ब़डे गायक थे. जब रफ़ी साहब नहीं रहे तो उनके स्थान पर आए गायकों की भी कॉपी करता था. किशोर कुमार की मौत के बाद आए कुमार शानू, उदित नारायण, अभिजीत भट्टाचार्य के स्टाइल में भी गा लेता था. मैं ही एकमात्र गायक था जो इतने लोगों के स्टाइल में गा सकता था और ये मैं बचपन से ही जानता था.

आप आज भी रियाज़ करते हैं या नहीं?

मेरे लिए रियाज़ बहुत ज़रूरी है क्योंकि सब जानते हैं कि मैं जन्मजात गायक नहीं हूँ. मैं रियाज़ न करूं तो मेरी विविधता ख़त्म हो जाएगी. ये अलग बात है कि मेरे लिए रियाज़ का कोई निश्चित तरीक़ा और वक़्त नहीं है. जब भी मौक़ा मिलता है रियाज़ कर लेता हूँ.

अगर आप गायक नहीं होते तो क्या होते ?

मेरे दिमाग में हमेशा विकल्प बदलते रहते थे. जब मैं पाँचवीं-छठी क्लास में था तो साइंस में मेरी बहुत रुचि थी. केमेस्ट्री में तो कम लेकिन फिज़िक्स और बॉयोलॉजी में बहुत रुचि थी. जब नौंवी में पहुँचा और आवाज़ खुलने लगी तो मैंने दिल्ली में संगीत की बहुत सारी प्रतियोगिताएँ जीतीं और बाद में तो मुझे बतौर प्रतियोगी बुलाने पर ही रोक लगा दी गई. मैं इन प्रतियोगिताओं में बतौर अतिथि गायक बुलाया जाने लगा था. इस वक़्त तक मुझे घूमना बहुत अच्छा लगने लगा था तो मैं सोचने लगा था कि आईएफ़एस में जाकर देश-विदेश की यात्रा करूँगा.

लेकिन दसवीं के बाद मैं समझ गया था कि संगीत सब पर भारी पड़ रहा है और मैंने तय कर लिया था कि गायक ही बनना है. बाद में घरवालों से विचार-विमर्श करके तय हुआ कि बारहवी के बाद मुंबई जाकर संघर्ष करूंगा और पत्राचार से ही आगे की पढ़ाई करूँगा.

मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इस तरह का फ़ैसला काफ़ी कठिन होता है. आपका परिवार इस कश्मकश से कैसे निकला?

पापा और मैं, अक्सर इस बारे में चर्चा करते थे और मैं मुंबई में चार साल पहले रह भी चुका था. पापा ने मुझसे कहा, तुम्हारे पास दो विकल्प हैं या तो अभी धक्के खा लो या फिर अभी आराम कर लो और बुढ़ापे में धक्का खाना. मुझे भी लगा कि पहला विकल्प ही बेहतर क्योंकि अभी कोई डाँटेगा भी तो मैं बर्दाश्त कर लूँगा लेकिन हो सकता है कि बाद में मैं ये सहन न कर सकूँ. मुझे लगा कि मेरा फ़ैसला अच्छा रहा और मैं मुंबई में आकर मैं काफ़ी शांत हो गया.

अभी आपके बारे में और बात करेंगे, लेकिन पहले अपनी पसंद का एक गाना बता दीजिए?

शहीद भगत सिंह फ़िल्म का एक गाना है, मेरा रंग दे बसंती चोला...राजकुमार संतोषी जी की यह फ़िल्म बहुत अच्छी बनी थी और मुझे लगता है कि यह मेरे सबसे अच्छे गानों में से है लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि इसके लिए मुझे नामांकित तक नहीं किया गया था.

आपकी सफलता का दौर शुरू हुआ और फिर आपके भी रवैये की भी चर्चा होने लगी. कुल मिलाकर सफलता के बाद आपने अपने में किस तरह का बदलाव महसूस किया?

मुझे नहीं लगता कि कभी किसी ने मेरे रवैये की शिकायत की या फिर मेरे बारे में इस तरह की बात उठी. बल्कि मुझे तो अफ़सोस है कि मेरे बारे में इस तरह की कोई चर्चा नहीं हुई. मैं आज लोगों को देखता हूँ कि एक गाना हिट हुआ और कुछ पुरस्कार मिलते ही बड़ी-बड़ी बातें करने लगते हैं. मैं तो हमेशा लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध रहा और बड़े सस्ते में काम करके दिए.

जब मेरे पास बहुत काम होता है तो कुछ काम के लिए मना तो करना ही पड़ेगा, ऐसे में जिनके साथ काम नहीं करूंगा वो तो बुरा मानेंगे ही. फिर डेट्स और वित्तीय समस्याओं की वजह से भी जब लोगों के साथ काम नही कर पाता हूँ या फिर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम साथ काम करते हैं पर किसी वजह से रिश्ते में तनाव हो जाता है. मैंने जो फ़िल्में कीं उनमें ऐसा ही कुछ हुआ लेकिन मुझे नहीं लगता है कि आमूमन मेरे बारे में लोग ऐसी बातें करते हैं.

आपने ‘संदेशे आते हैं..’ गाने के लिए ज़ी अवॉर्ड लेने से मना कर दिया था, क्यों ?

उसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण था और लोगों ने इसकी प्रशंसा ही की. उस गाने को रूप कुमार राठौड़ और मैंने मिलकर गाया था लेकिन उनको नामांकित तक नहीं किया गया था. मेरे लिए यही जीवन है, मैं स्वार्थी बनकर नहीं जी सकता था. और मुझे मालूम है कि रूप कुमार जी मेरे लिए शायद ऐसा नहीं करते. मैंने उन लोगों से भी कहा था कि ये आप लोगों ने ग़लत किया है. आप उनको भी नामांकित करते और उसके बाद अगर मेरा चयन पुरस्कार के लिए होता तो मैं अवॉर्ड ज़रूर लेता. ये चीज़ें भारत में बहुत ग़लत है, पुरस्कार प्रतिभा को उभारने का ज़रिया बनने के बजाय मार्केटिंग का खेल हो गया है.

अब आप जब नंबर एक गायक माने जा रहे हैं और आपके पिताजी का एल्बम भी काफ़ी सफल रहा है तो परिवार में तो ख़ासा जश्न का माहौल होगा?

हमारे माता-पिता देसी लोग हैं. जश्न तो अंदर ही अंदर मनता है, शैम्पेन आदि नहीं खुलते. कलाकार होने के नाते मैं समझ सकता हूँ कि मेरे पिताजी को अभी क्या खुशी मिल रही होगी. बेटा कितना भी कामयाब क्यों न हो एक कलाकार को संतुष्टि तभी मिलती है जब उसके काम को पहचाना जाता है. उन्होंने कभी भी ये नहीं कहा कि मेरी भी एल्बम निकलवा दो. टी-सीरीज़ वालों को जब पता चला कि मेरे शो में लोग पिताजी के गानों को ख़ूब पसंद करते हैं तो एक दिन भूषण कुमार ने कहा कि आपके पिताजी का भी एल्बम निकालते हैं.

पापा का पहला एल्बम आया और वो हिट हो गया. उसके बाद दूसरी एल्बम आया ‘बेवफ़ाई’ और वो ज़बरदस्त हिट हुआ. तीसरा एल्बम ‘फिर बेवफ़ाई’ तो अभी टी-सीरीज़ के हिसाब से सबसे सफल है. पापा इससे बहुत खुश होते हैं लेकिन दिखाते नहीं हैं. वैसे अभी हम लोगों की खुशी के कई कारण हैं. मैं पहले की तुलना में कम काम करने लगा हूँ. अभी मेरा बेटा हुआ है जिसका नाम हम लोगों ने निवाण रखा है. यह आयरिश नाम है जिसका अर्थ होता है छोटी पवित्र आत्मा. सबसे बड़ी बात है कि अब हम लोगों ने खुश रहना सीख लिया है.

अब तो आपको हमें यह बताना पड़ेगा कि खुश कैसे रहते हैं. आज सारी दुनिया खुशी होने की तलाश में है.

हम पढ़ते बहुत ज़्यादा हैं, लोगों के साथ बैठते हैं. दरअसल होता ये है कि हम सोचते हैं कि कभी न कभी ऐसा वक़्त आएगा कि जब सब जान जाएँगे और तब खुश रहने लगेंगे. मैं इस कभी न कभी में विश्वास नहीं करता और सोचता हूँ कि अभी क्या कमी है. मैं ज़िंदगी में छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं देता. आज मेरे पास दौलत, शोहरत सब कुछ है इसके बावजूद मैं भगवान से शिकायत करूँ तो ये तो एहसानफ़रामोशी होगी.

मैं आज एल्बम निकालूँ या फ़िल्मों में कोई गाना गाऊँ और वो व्यावसायिक रूप से सफल न भी हो तो मुझे उतना दुख नहीं होगा. मैं आपको उदाहरण दे सकता हूँ कि साठ और सत्तर के दशक में कुछ संगीतकारों ने पैसे देकर फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार ख़रीदवाए लेकिन आज उनका नाम लेने वाला कोई नहीं है. मैं सिर्फ़ अच्छा काम करना चाहता हूँ ताकि 20 साल बाद भी लोग सुनें तो याद करें कि उस गायक ने इसे गाया था.

आपने फ़िल्मों में भी काम किया है, क्या कभी मन में यह ख़याल आता है कि ज़बरदस्त स्टार भी बन जाऊँ?

मेरे पास तक़रीबन 75 फ़िल्मों की कहानियाँ आई थीं और उस समय मैंने भावनाओं में आकर और साथियों के कहने पर कुछ फ़िल्में कीं. मैं बतौर अभिनेता उन फ़िल्मों का हिस्सा बना था और अपने हिस्से के काम को बख़ूबी अंज़ाम दिया लेकिन उसके हश्र के लिए ज़िम्मेदार दूसरी चीज़ें मेरे हाथ में नहीं थीं. अगर मैं फ़िल्म बनाता तो ये सब चीज़ें मेरे हाथों मे होती.

मुझसे हर कोई पूछता है कि आपने ‘जॉनी दुश्मन’ क्यों की. यह फ़िल्म सुपरहिट थी लेकिन ये मैं भी मानता हूँ कि यह बहुत ख़राब बनी थी. तो जब भी कोई यह सवाल करता है तो मैं उनसे कहता हूँ कि ये सवाल अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, सनी देओल, मनीषा कोइराला, आफ़ताब और इसमें काम करने वाले तमाम बड़े स्टारों से पूछिए. मुझे क्या पता थी कि ये फ़िल्म बाद में ऐसी बन जाएगी. ख़राब फ़िल्म बनने का सबको नुकसान हुआ हालांकि मुझे थोड़ा ज़्यादा हुआ क्योंकि वह मेरी पहली फ़िल्म थी.

जो फ़िल्म मेरी सबसे अच्छी थी वो ‘लव इन नेपाल’ थी पर किसी ने उसे देखी नहीं है. फ़िल्म प्रमोशन शुरू होने के नौ महीने बाद रिलीज़ हुई. फ़िल्म का प्रमोशन शुरू हुआ जुलाई, 2004 में और रिलीज़ हुई मार्च, 2005 में. इसमें मेरी क्या ग़लती है? मैंने तो अपने हिस्से का काम कर दिया था. उसके बाद किसी निर्माता, निर्देशक को समझ आती है किसी व्यक्तिगत कारणों से इस फ़िल्म को देर किया जाए ताकि वो मान जाए तो मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं इससे ज़्यादा नहीं कह सकता लेकिन कुछ लोग फ़िल्म किसी को पाने और रिझाने के लिए बनाते हैं मगर फँसता वो है जो गंभीरता से काम कर रहा होता है.

इन अनुभवों के बाद मैंने फ़िल्म करने से मना कर दिया. हालांकि एक स्क्रिप्ट है जिसके लिए मेरा दोस्त छह साल से पीछे पड़ा है लेकिन मेरी एक शर्त है कि मुझे निर्माता बढ़िया चाहिए. इसलिए मेरे दिमाग में अभी तो कोई फ़िल्म नहीं है लेकिन मुझे एक बार बढ़िया फ़िल्म करनी ज़रूर है.

और कोई ऐसी इच्छा जो मन में है?

अगले 10-15 सालों में म्यूज़िक इंडस्ट्री में कंपनी खोलने जैसे कुछ क़दम उठाने की इच्छा है ताकि प्रतिभाओं को आसानी से मौक़ा मिल सके और उन रास्तों से न गुज़रना पड़े जिनसे हम गुज़रे हैं. संगीत के नाम पर जो मटरगस्ती हो रही है उससे मैं और मेरे कुछ दोस्त चिढ़े हुए हैं और हम लोग इस दिशा में कुछ न कुछ ज़रूर करेंगे.

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