कॉमिक नहीं गंभीर रोल चाहिए:अरशद

  • 14 जुलाई 2009

मुन्नाभाई फ़िल्मों के सर्किट यानी अरशद वारसी ने कॉमेडी फ़िल्मों में अपनी अलग जगह बनाई है.

1996 में अमिताभ बच्चन के प्रोडक्शन तले बनी फ़िल्म 'तेरे मेरे सपने' से अरशद ने शुरुआत की. लेकिन असली पहचान उन्हें मुन्नाभाई एमबीबीएस फ़िल्म में सर्किट के किरदार से मिली. इनदिनों वे नई फ़िल्म शॉर्टकट में नज़र आ रहे हैं.

अरशद वारसी ने बीबीसी संवादादाता वंदना से विशेष बातचीत की.

पेश है बातचीत के मुख्य अंश:

आपको लोग आमतौर पर कॉमेडी फ़िल्मों में ही देखते हैं जबकि आपके प्रशंसकों का मानना है कि अरशद हर तरह के रोल कर सकते हैं.

ये कहकर आपने मेरी हिम्मत बढ़ा दी है. पर दिक्कत ये है कि इनदिनों 10 से में आठ फ़िल्में कॉमेडी ही बन रही हैं और मजबूरी है कि ऐसी फ़िल्में करनी पड़ती हैं.

गंभीर फ़िल्में कम ही बनती हैं, अगर आप देखें तो इनदिनों ज़्यादातर हीरो कॉमेडी ही कर रहे हैं. अगर गंभीर फ़िल्में ज़्यादा बनने लगें तो वो भी करना चाहूंगा. लेकिन अभी तो चक्कर ये है कि हर दूसरी कहानी जो मैं सुनता हूँ तो कॉमेडी ही होती है.

जब इतने कॉमिक रोल करने को मिल रहे हैं, तो ये आशंका नहीं रहती कि अभिनय में एकरसता या दोहराव आने लगता है.

इस बात का मैं बहुत ज़्यादा ध्यान रखता हूँ. इसलिए मुन्नाभाई में सर्किट जैसा रोल कभी दोहराया नहीं. कोशिश करता हूँ कि नए किरदार मिलें और अगर मुझे लगता है कि कोई किरदार मैं पहले भी निभा चुका हूँ तो मैं मना कर देता हूँ बशर्ते कि वो सिक्वेल हो.

कोई ख़ास रोल ज़हन में जो करना चाहते हैं?

फ़िल्म स्कारफ़ेस में जो रोल ऐल पचिनो ने किया था, वो किरदार ज़िंदगी में कभी न कभी करना चाहूँगा.

आपने आमतौर पर नए और युवा निर्देशकों के साथ ही काम किया है- कबीर खान, रोहित शेट्टी, राजू हिरानी.. और वे सारी फ़िल्में सफल भी रही हैं.

सही बात है कि मेरा ज़्यादातर काम नए निर्देशकों के साथ है. अच्छा ही है कि मैं उनके लिए लकी रहा हूँ. मुझे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता कि निर्देशक नया है या पुराना.

लेकिन जहाँ तक सच्चाई की बात करें तो जितने बड़े निर्देशक हैं वे बड़े अभिनेताओं के साथ ही काम करते हैं. ऐसे में मुझ जैसे लोगों को नए निर्देशकों के साथ ही काम करना पड़ता है.

इसमें शायद दर्शकों का ही फ़ायदा है क्योंकि इन्हीं नए लोगों के ज़रिए कुछ अच्छी फ़िल्में निकल कर आ जाती हैं.

बिल्कुल. और किसी भी नए डाइरेक्टर के साथ अच्छी बात ये होती है कि उनमें एक जज़्बा होता है, एक अंगार होता है कि ख़ुद को साबित करना है. वो मेहनत भी थोड़ी ज़्यादा करते हैं. ये बात मुझे पसंद है क्योंकि मैं भी हर फ़िल्म इसी जज़्बे के साथ करता हूँ कि ये मेरी पहली फ़िल्म है और मुझे बहुत मेहनत करनी है.

आपकी नई फ़िल्म शॉर्टकट है और अनिल कपूर इसके निर्माता हैं. आपने भी अपना प्रोडक्शन हाउस शुरु किया है. किसी भी फ़िल्म में निर्माता का रोल कितना अहम होता है? इस पर कम ही बात होती है.

फ़िल्म बनकर कैसी तैयार होती है इसमें निर्माता का बड़ा हाथ होता है, अगर निर्माता अच्छा है तो फ़िल्म की ज़रूरतें पूरी होती हैं और उसकी डिगनिटी बरकरार रहती है. एक ख़राब निर्माता पूरी फ़िल्म को ख़राब कर सकता है.

निर्माता अनिल कपूर के साथ तालमेल कैसा रहा?

अनिल कपूर ने हमारा बहुत उत्साह बढ़ाया है. वे ख़ुद अच्छे अभिनेता हैं इसलिए जब वे निर्माता के रोल में थे तो कलाकारों की ज़रूरतों को अच्छी तरह समझते थे. हमारे लिए काम करना आसान हो जाता है.

फ़िल्म का नाम है शॉर्टकट. ज़िंदगी में सफल होने के लिए शॉर्टकट का रास्ता कितना काम आता है?

बिल्कुल काम नहीं आता क्योंकि कोई भी चीज़ जितनी जल्दी और आसानी से मिल जाती है उतनी ही जल्दी हाथ से चली भी जाती है. अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि 'सनज़ रेज़ बर्न ओनली वेन दे आर फ़ोक्सड'.

इसलिए ध्यान लगाकर मेहनत से काम करना चाहिए. इसमें वक़्त लगता है लेकिन यही सही रास्ता है.

आप कोरियोग्राफ़ी और फ़ोटोग्राफ़ी भी करते रहे हैं. अब कितना वक़्त निकाल पाते हैं?

कोरियोग्राफ़ी तो समझिए बंद ही हो चुकी है. हाँ फ़ोटोग्राफ़ी का शौक है, तो कभी-कभार कर लेता हूँ.

जाते-जाते एक बात बताते जाइए कि मुन्ना और सर्किट के कारनामे दोबारा कब लोग पर्दे पर देख पाएँगे.

जहाँ तक मेरा अंदाज़ा है मुन्नाभाई सिरीज़ की अगली फ़िल्म की शूटिंग अगले साल शुरु हो जाएगी ये तो तय है. उसके बाद पता चलेगा कि आख़िर फ़िल्म तैयार कब होती है.

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