देव आनंद के साथ एक मुलाक़ात

  • 3 सितंबर 2009

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

एक मुलाक़ात हिंदी फ़िल्मों के सदाबहार अभिनेता और निर्माता-निर्देशक देवानंद.

भारत के स्क्रीन लिजेंड्स की अगर कभी लिस्ट बनाई जाएगी तो उसमें देव आनंद साहब का नाम सबसे ऊपर शुमार होगा.

नहीं नहीं मैं खुद को इतना लायक नहीं मानता, ये तो आपकी जर्रा नवाज़ी है. लेकिन इतना कहूँगा कि मैं इस देश के साथ ही बड़ा हुआ और जो कुछ पाया यहीं से पाया. मैं तो 19-20 साल की उम्र में लाहौर से बॉम्बे आया. मैंनें लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से बीए ऑनर्स किया था और अपनी मास्टर डिग्री की पढ़ाई करना चाहता था. लेकिन पैसे की समस्या थी. पिता जी चाहते थे कि मैं किसी बैंक में नौकरी कर लूँ.

पर मैंनें मन में कुछ करने की ठानी, मैंनें इसके बारे में अपनी आत्मकथा, 'रोमांसिंग विद लाइफ़' में लिखा है. जेब में सिर्फ़ तीस रूपए थे, ट्रेन में तीसरे दर्ज़े का टिकट लेकर उस वक्त चलने वाली फ़्रंटियर मेल से 24 घंटे का सफ़र करके आ गया बम्बई. ये बात है 1943 का. यही वो वक्त था जब गांधी जी का 'भारत छोड़ो आंदोलन' अपने चरम पर था. उसके बाद मैंनें दो साल तक ख़ाक़ छानी, लेकिन मेरे पास इन दो सालों के दौरान कुछ हाथ में नहीं था, बमुश्किल 20-21 साल की उम्र थी, इसके बाद मुझे 1945 में पहला ब्रेक मिला.

आपको ये पहला ब्रेक कैसे और कब मिला?

मुझे सेना में सेंसर ऑफ़िस में पहली नौकरी मिली. उस समय लड़ाई चल रही थी. मेरा काम होता था फ़ौजियों की चिट्ठियों को सेंसर करना. लेकिन कुछ दिनों के बाद मुझे लगने लगा कि ये नौकरी मेरे मिज़ाज से मेल नहीं खाती क्यों कि सुबह से शाम तक समय बीत जाता था मैं किसी से मिल नहीं पाता था.

लेकिन फ़ौजी जो अपने घरों में चिट्ठियाँ लिखते होंगें वो ख़ासी रोमांटिक होती होंगी?

सच में एक से एक बढ़कर रोमांटिक चिट्ठियाँ होती थी. एक चिट्ठी का ज़िक्र करूँ, उसमें एक मेजर ने अपनी बीवी को लिखा कि उसका मन कर रहा है कि वो इसी वक़्त नौकरी छोड़कर उसकी बाहों में चला आए. बस मुझे भी ऐसा लगा कि मैं भी नौकरी छोड़ दूँ. बस फिर छोड़ दी नौकरी, लेकिन क़िस्मत की बात है कि उसके तीसरे ही दिन मुझे प्रभात फ़िल्म्स से बुलावा आया. किसी ने मुझसे कहा कि देखने सुनने में मैं ठीक हूँ तो मुझे कोई चांस मिल सकता है. मैं वहां गया. प्रभात के मालिक बाबूराम भाई ने मुझे बुला लिया. उन्होंनें मुझे पूना भेज दिया. 1947 में प्रभात बैनर की पहली फ़िल्म ‘हम एक हैं’ आई, ठीक उसी वक़्त देश को आज़ादी मिली, लेकिन मुल्क़ का बँटवारा भी उसी समय हो गया.

लेकिन मेरा फ़िल्मी करियर 1947 से आज 2008 तक जारी है. मैंनें अभिनेता, निर्माता और निर्देशक के तौर पर हर तरह की भूमिका निभाई. नवकेतन के बैनर तले मैंनें रिकॉर्ड 36 फ़िल्में बनाईं थीं. अभी हाल में संपन्न फ़्रांस के कान फ़िल्म महोत्सव से लौटा हूँ. मेरी 1966 में बनाई फ़िल्म ‘गाइड' को वहाँ पर फ़िल्मों के क्लासिक दर्जे में चुना गया था.

वाकई 'गाइड' बहुत ही बेहतरीन फ़िल्म थी. सुना है कि आप जब कान जा रहे थे तो इस फ़िल्म के डायरेक्टर अपने भाई विजय आनंद को बहुत मिस कर रहे थे. लेकिन माना जाता है कि उस फ़िल्म की पूरी कहानी उस समय के हिसाब से बहुत ही मॉडर्न थी. कुछ इसका विरोध भी हुआ था?

ये तो सच है. फ़िल्म इतनी मॉडर्न थी कि सेंसर ऑफ़िस में चिट्ठी भेजी गई कि देव साहब की फ़िल्म में अश्लीलता है इसलिए इस पर रोक लगनी चाहिए. गाइड किताब पर अंग्रेज़ी फ़िल्म पर कोई विवाद नहीं हुआ था और ये बाज़ार में ठीक ठाक चली थी, पर हमने किताब की कहानी में थोड़ा हेरफेर करके इसे हिंदी में बनाया था, क्योंकि हमें एडल्ट्री का ऐंगल भी दर्शाना था. लेकिन लोगों नें इसे पसंद किया था. 1965-66 की इसी फ़िल्म से ही रंगीन फ़िल्मों का सिलसिला चल निकला था.

देव साहब एक बात जो मानी जाती है कि गाइड के राजू गाइड का किरदार आपके व्यक्तित्व से काफी हद तक मेल खाता था. वही तिरछी चाल, बाकी अदाएँ डायलॉग डिलीवरी का अनोखा अंदाज़.

मुझे लगता है कि कुछ मेरे अंदर था और कुछ मैंनें खुद को राजू गाइड के किरदार में ढालने की कोशिश की थी.

लेकिन इस फ़िल्म में एक अलग चीज दिखी कि रोमांटिक देव आनंद साहब, फ़िल्म के अंत में एक साधू के रूप में दिखे, तो ये कुछ आपकी इमेज से मेल नहीं खाता था. इस पर क्या कहना है?

सच बताऊँ तो लोग ये कहने लगे थे कि देव आनंद ने ऐसी भूमिका करके एक बड़ी ग़लती की है, क्योंकि जहाँ लोग मुझे रोमांटिक हीरो मानते थे, तो वहीं फ़िल्म के आखिरी में मुझे एक दाढ़ी वाले साधू के रूप में दिखाया गया था जो मर भी जाता है. कहा गया कि अब देव आनंद साहब अपनी इमेज को ले डूबेंगे. पर मेरा शुरू से भरोसा रहा है कि जीवन में चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि हर आदमी को अकेले ही चुनौतियों का सामना करना होता है और जब वो उन पर जीत हासिल कर लेता है तो दुनिया फिर आकर उसके पीछे खड़ी हो जाती है.

देव साहब आपकी चाल आपकी अनोखी अदा और पहचान बन गई थी, क्या कहते हैं?

ये तो सच है कि मैं उस वक़्त और आज भी थोड़ा झुककर चलता हूँ, लेकिन मुझे ये गुमान नहीं कि मैं बहुत खूबसूरत हूँ. पर जब मेरी पहली फ़िल्म रिलीज़ हुई तो लोगों ने कहा था कि लड़का खूबसूरत है. मुझमें उसके बाद आत्मविश्वास आया जो लगातार बढ़ता गया. लेकिन मेरा मानना है कि हर कोई खूबसूरत होता है लेकिन ये खुद पर निर्भर करता है कि आप किस चीज़ में खूबसूरती देखना चाहते हैं.

देवसाहब की डायलॉग डिलीवरी का भी अलग ही अंदाज़ रहा है. आपका एक डॉयलॉग 'जॉनी मेरा नाम नहीं' खासा चर्चित हुआ था. ऐसा कोई डायलॉग, जो आपको बेहद पसंद हो?

मैंनें इतनी फ़िल्मों में काम कर लिया है कि शायद ये सोचने में मुझे दो घंटा लग जाएगा. लेकिन एक ज़माना ऐसा भी आया जब मैंनें फ़िल्मों में काम करना बंद कर दिया था. मैंनें उस वक्त फ़िल्में डायरेक्ट और लिखना शुरू कर दिया था. लेकिन मुझे दुनिया में किसी भी काम से फ़िल्म बनाने का काम सबसे बेहतरीन लगता रहा है.

दरअसल एक बार जब आप दर्शक के दिल में अपना घर बना लेते हैं तो दुनिया आपको देखना चाहती है. कितना खूबसूरत है कि आपके एक ख़्याल से दुनिया इत्तेफ़ाक़ रखती है. आप अगर एक ख़राब फ़िल्म बनाते हैं तो भी लोग आपको माफ़ कर देते हैं, क्योंकि आप दर्शकों के सामने किसी राजनेता की तरह शर्त नहीं रखते कि अगर वोट दोगे तो बदले में कुछ मिलेगा. ये एक एक्सपेरीमेंट की तरह है जो अगर सफल हो जाए तो दुनिया आपके पीछे चलने लगती है. पर एक्सपेरिमेंट की प्रक्रिया हमेशा चलती रहनी चाहिए.

ये तो माना जाता है कि आपकी कुछ फ़िल्में फ़्लॉप हुईं हैं लेकिन आपके उत्साह में कोई कमी नहीं हुई. शायद इसका कारण यही है कि लोगों के दिमाग़ में आपकी उन महान फ़िल्मों की इमेज बनी हुई है और उन्हें कुछ ख़राब फ़िल्मों से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता.

मैं लोगों के प्यार की वजह से खुद को बड़ा महसूस करता हूँ. मैंनें जो कुछ भी पाया है वो उन्हीं की देन है. मैने तीन पीढ़ियों के साथ काम किया है. मैं फिर कहूँगा कि मैं एक्सपेरिमेंट से नहीं डरता. हमेशा सामयिक विषयों पर फ़िल्म बनाने में यक़ीन करता रहा हूँ. उदाहरण के लिए प्रेमपुजारी जो 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध पर बनी थी. नेपाल में शूट हुई एक दूसरी फ़िल्म हरे राम-हरे कृष्णा लीक से हटकर थी. इसके लिए मुझे पहले नेपाल के किंग ज्ञानेन्द्र ने सम्मानित किया था.

अच्छा देवसाहब ये बताइए कि इस उम्र में आप अभी तक जवान नज़र आते हैं, इसका क्या राज़ है?

देखिए आपने मुझसे जो ये सवाल किया, यही मेरे अंदर जवानी को जगा रहा है. कहने का मतलब है कि जवानी आपकी सोच में होती है. जैसे अगर 'बीबीसी' मेरा इंटरव्यू कर रहा है तो इसका मतलब है कि मैं अभी भी लोगों के दिलो-दिमाग़ में ज़िंदा हूँ और यही मुझे जवान रखता है. सिर्फ़ आपकी सूरत से ही जवानी नहीं दिखती. आपको बता दूँ कि मैं एक फ़िल्म पर अभी काम कर रहा हूँ जो अगले साल तक तैयार हो जाने की उम्मीद है. और मेरा मिशन है कि कान में अगले साल इसे कम्पिटीशन सेक्शन में लेकर आऊँगा. यही जोश मुझे जवान रखता है.

देवसाहब ये बताएँ कि क्या राज है कि आप अपनी शर्ट का ऊपर का बटन नहीं खोलते. लोग ये सोचकर आपकी फ़िल्में देखने जाते हैं कि हो सकता है कि इस बार ये बटन खुल जाए?

दरअसल कुछ आदतें बचपन की पड़ जाती हैं. और सच तो ये है कि मुझे अपनी बॉडी को लेकर कॉम्पलेक्स रहा है, क्योंकि मुझे पता है कि चेहरा तो ठीक-ठाक था, पर मसल्स बिल्क़ुल नहीं थे. इसके बारे में मैंनें अपनी आत्मकथा में भी ज़िक्र किया है.

आप अपने जवानी के दिनों में बेहद हसीन अभिनेता के तौर पर गिने जाते थे, लड़कियाँ भी आपकी दीवानी थी. तो आप कैसा महसूस करते थे?

कहाँ फ़ुर्सत होती थी. एक फ़िल्म के बाद दूसरी पर लग जाता था. दिमाग़ में हज़ारों ख़्याल आते थे जिनपर अमल भी करना होता था. लेकिन कुछ नया करने और सोचने के लिए इधर-उधर ध्यान देना भी ज़रूरी है वरना नए ख़्याल कैसे आएंगे. लेकिन फिर उसके बाद मैं अपने काम में लग जाता था. दुनिया तेज़ी से चल रही है और ज़बर्दस्त प्रतियोगिता है. दरअसल मैं एक बेचैन आदमी हूँ, मुझे हर पल- हमेशा ये लगता है कि कुछ करना है, बहुत कुछ करना है. महान लोगों के बारे में पढ़ता हूँ तो लगता है कि मैंने अभी तक कुछ नहीं किया. मैं कभी भी रिटायर होना नहीं चाहता.

मैं अभी एक अंग्रेज़ी फ़िल्म बनाने की सोच रहा हूँ, अभी स्कॉटलैंड गया था. वहाँ एक फ़िल्म कंपनी खोली है, उसी में फ़िल्म चार्जशीट बनाने की योजना पर अमल चल रहा है. उसमें मैं अंग्रेज़ कलाकारों को लूँगा. मेरे पास इतना अनुभव है तो क्या मैं अंग्रेजी फ़िल्म नहीं बना सकता. स्कॉटलैंड में जब मेरी आत्मकथा रिलाज़ हुई थी तो उसी वक्त मिले प्यार और सम्मान की बदौलत जगे उत्साह से मुझे लगा कि फ़िल्म बनाई जा सकती है. अभी जब मैं नेपाल गया था तो लड़के-लड़कियाँ मुझसे कह रहे थे कि देवसाहब, हरे-राम, हरे-कृष्णा का पार्ट-2 बनाइए.

आपने 'हरेराम- हरेकृष्णा' की बात की, उसका 'दम-मारो-दम' गाना बेहद लोकप्रिय हुआ था. लेकिन एक ख़ास बात है कि अपनी फ़िल्मों में आप नए कलाकारों को मौका देकर उन्हें हिट करा देते हैं, तो कैसे आपकी नज़र इतनी पारखी है?

सच ये है कि स्क्रिप्ट के मुताबिक मैं कलाकार की तलाश करता हूँ. बस जो आपकी स्क्रिप्ट की ज़रूरत है उसी के हिसाब से लड़के या लड़कियों को तलाश करता हूँ. मान लीजिए कि एक बदसूरत लड़की की कहानी हो तो मुझे उसे तलाश करना होगा और जब वो फ़िल्म में दिखेगी तो लोग कहेंगें कि वाह क्या बात है, सोचते हैं कि बस ऐसा ही हमें भी बनना है. दरअसल अगर आपको वो चीज़ मिल जाए जो आपका दिल कहता है तो उससे बेहतर कुछ नहीं.

देवसाहब, राजकपूर के लिए कहा जाता था कि वो अपनी हर हीरोइन से प्यार करते थे.

मैं सारी दुनिया से प्यार करता हूँ. शूटिंग के दौरान अपनी पूरी यूनिट से प्यार करता हूँ. और फिर अगर अपनी फ़िल्म की हीरोइन से ये नहीं समझूँगा कि वो दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की है तो उससे बेहतर परफ़ॉर्मेंस कैसे लूँगा. ये भी प्यार की एक परिभाषा है. कौन सा आदमी है जो एक ख़ूबसूरत लड़की को या कोई लड़की स्मार्ट लड़के को पसंद नहीं करेगी. लेकिन सामाजिक दायित्व भी निभाना होता है.

तो क्या कभी सामाजिक दायित्व के दायरे से बाहर भी हुए देवसाहब ?

इस पर चर्चा करना बेकार है. इसके लिए आप मेरी किताब, 'रोमांसिंग विद लाइफ़' पढ़ लीजिए. फिर अगर मैंनें किसी से प्यार किया होगा तो कहने में कोई शर्म नहीं है, क्योंकि शायद उस वक्त बहुत अच्छा किया होगा. प्यार का हर एक पल ख़ूबसूरत होता है. मुझे अपने जीवन के एक-एक बिताए पल पर नाज़ है. फिर भला मैं किसी रिश्ते पर पछता कैसे सकता हूँ. मैं खुद में और दूसरों में एक बड़ा फ़र्क ये महसूस करता हूँ कि मैं अंधाधुंध कुछ नहीं करता, सोच समझ कर ही करता हूँ.

एक घटना बताऊँ, अमरीका ने मुझे पचास साल का फ़िल्मी करियर पूरा होने के अवसर पर सम्मानित करने के लिए बुलाया. वहाँ मुझसे मिलने के लिए एक 16 साल की लड़की कई दिनों से कोशिश कर रही थी, लेकिन मिल नहीं पा रही थी. पर मुझे पता चला तो उससे मिला. उसकी हालत ये थी कि मुझसे मिलकर कुछ बोल ही नहीं पा रही थी. बाद में कोशिश करने के बाद उसने बताया कि वो मेरे साथ फ़िल्म में काम करना चाहती थी. मैंने उसे समझाकर मना किया, और कहा कि एक-दो साल बाद ट्राई करना.

लेकिन उससे मेरे दिमाग में एक आइडिया बस गया. और फिर बाद में मैंने ‘मैं सोलह बरस की’ फ़िल्म बनाई और उसमें अटलांटा शहर की ही एक 16 साल की लड़की को लेकर फ़िल्म पूरी की. आप विश्वास नहीं करेंगे कि उस लड़की की माँ से जब मैंने पूछा कि आपको कोई आपत्ति तो नहीं तो जानते हैं कि उन्होंनें कहा कि, देवसाहब ऐसा समझ लीजिए कि मैंने अपनी लड़की को आपके लिए ही बड़ा किया है. अब बताइए अगर दुनिया मेरे बारे में ये सोचती हो तो भला किसी की परवाह क्यों करूंगा, इसी से मेरे अंदर उत्साह हिलोरें मारने लगता है.

मुझे पैसे की कोई ज़रूरत नहीं, बहुत है मेरे पास. सिर्फ़ तीस रूपए लेकर आया था. जीवन में सब कुछ देख लिया है. सारी खोखली बाते हैं. बस मुझे फ़िल्म बनानी है. कौन परवाह करता है कि लोग फ़िल्मों को फ़्लॉप कहें या हिट. लेकिन अपने पैसे से फ़िल्म बनाता हूँ, सामयिक विषय पर फ़िल्म बनाता हूँ, फ़िल्म बनाने के लिए हजारों टॉपिक बिखरे पड़े हैं. मैं इसी को अपनी ग्रोथ मानता हूँ, यही मेरा हासिल है, और मुझे इस जीवन में बड़ा मज़ा आ रहा है.

बात करते हैं दिलीप कुमार, राजकपूर और देवसाबह की लोकप्रिय तिकड़ी की. क्या यादें हैं आपकी उनके बारे में?

राजकपूर मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे, अफ़सोस की बात है कि वो दुनिया से जल्दी चले गए. दिलीप साहब महान कलाकार हैं उनकी बहुत इज्ज़त करता हूँ. लेकिन उनकी अपनी अदा है. मेरा अलग स्टाइल था.

गुरुदत्त साहब के बारे में कहा जाता है कि आप दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे. कई हिट फ़िल्में दी थीं आपने साथ-साथ.

दरअसल वो मेरे संघर्ष के समय के दोस्त थे. मुझे फ़िल्मों में ब्रेक जल्दी मिल गया था. मैंनें उनसे वादा किया था कि अगर मैं प्रोड्यूसर बना तो उन्हें अपनी फिल्म में लूँगा. मैंने बाज़ी में उन्हें शामिल किया, उनकी क़िस्मत थी कि बाज़ी हिट भी हुई. बाद में उन्होंनें अपनी कंपनी खोली उनकी फ़िल्मों में मैनें काम किया. सीआईडी हिट हुई. उनको एक्टिंग का भी शौक था. हालाँकि उनकी फ़िल्में कुछ उदास होती थीं. जैसे कागज़ के फूल. वो एक बेहतरीन फ़िल्म थी लेकिन नकारात्मक सोच वाली फ़िल्म थी. गुरुदत्त निगेटिव फ़िल्में बनाते थे. बाद में उनका जीवन उदास हो गया था. और शायद यही उनकी जल्द मौत का कारण बना था. उस समय मैं तीन-देवियाँ बना रहा था. मौत से एक दिन पहले ही उन्होंनें मुझे बुलाया था और अपनी एक फ़िल्म में काम करने की बात कही थी.

हमने आपकी इतनी यादगार फ़िल्मों जैसे गाइड, ज्वलेथीफ़ की बाद की. मुझे आपकी फ़िल्म 'हम दोनों' बहुत अच्छी लगी...

आपको बता दूँ, 'हम दोनों' कुछ ही दिनों बाद रंगीन के रूप में आपके सामने होगी. मुझे लगता है कि ये बहुत ही बेहतरीन होगी. मैं हमेशा सामयिक विषयों पर फ़िल्म बनाता आया हूँ, मुझे भरोसा है कि अगर आप रंगीन ‘हमदोनों’ को देखेंगें तो लगेगा कि ये आज की फ़िल्म है, लोगों नें अगर 'गाइड' को 42 साल बाद याद किया है तो कुछ तो होगा. इसी तरह उम्मीद है कि 'हमदोनों' को भी प्यार मिलेगा.

आपको याद होगा जब सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने को लेकर जब राजनीतिक असमंजस था तो उस वक्त मेरे दिमाग में इस विषय पर फ़िल्म बनाने का ख़्याल आया था. फिर मैंनें 'मिस्टर प्राइम मिनिस्टर' बनाई, और मुझे लगता है कि इस फ़िल्म को मैं ही बना सकता था, क्योंकि मुझे लगता है कि मैंनें देश को देखा है, सोचा है. मैंनें इस फ़िल्म को बहुत जल्दी लिखा, कैमरे के पीछे काम किया और फिर इसमें एक्टिंग भी की. मेरा मानना है कि फ़िल्म अगर अच्छी है तो वाह-वाह करिए, लेकिन अगर फ़्लॉप हो तो गाली मत दो. बस अगली फ़िल्म बनाऊँगा और कोशिश करूंगा कि वो सफल हो. इसका कारण है कि मैंनें इंडस्ट्री को बहुत सी फ़िल्में दी हैं.

आपका कोई फ़ेवरेट कोस्टार?

मैं इस बारे में कुछ नहीं बोलूँगा. मैं ख़ुद ही स्टार रहा हूँ, और आज भी हूँ. किसी फ़िल्म में बेहतरीन अदाकारी करने वाला स्टार कहलाने लगता है. स्टारडम का मतलब तो ये होता है कि आप जो करें वो अच्छा हो, लोग उसे सराहें. मुझे लगता है कि सारे टॉप स्टार एक ही दर्ज़े के लोग हैं बस ख़ास ये है कि जिसको अच्छा रोल मिल जाए वो स्टार हो जाता है. लेकिन मुझे लगता है कि कोई बादशाह या शहंशाह नहीं है, और न ही इसके पीछे भागना चाहिए. आज सारे यंगस्टर अच्छा परफ़ार्म कर रहे हैं. अमिताभ बच्चन, शाहरूख, सलमान या आमिर सभी बेहतरीन एक्टिंग कर रहे हैं.

आपकी फ़ेवरेट कोस्टार कौन रहीं. आपकी हीरोइनों में कोई खास. आज भी मुलाक़ात होती है उनसे?

मैंनें बहुत सी बेहतरीन हीरोइनों के साथ काम किया. मेरी अपनी हीरोइनों में टीना मुनीम अच्छी अदाकारा थी. मेरी आत्मकथा जब लंदन में रिलीज़ हुई तो मैंनें एक पल में निर्णय किया था कि टीना अंबानी मेरी क़िताब को रिलीज़ करेंगी. इसका कारण ये था कि देस-परदेस फ़िल्म में लंदन में टीना मेरी फ़िल्म की हीरोइन थी.

सर ये बताएँ कि आत्मकथा पूरी आपने लिखी है. माना जा रहा है कि ये किसी फ़िल्मी सितारे की सबसे बेहतरीन आत्मकथा है.

इस किताब का हर एक शब्द, हर एक वाक्य मेरा है. प्रकाशक से मेरी शर्त थी कि सिर्फ़ व्याकरण को छोड़कर कोई भी बदलाव नहीं किया जाए. इसका कारण ये था कि लोग जब इसे पढ़ें तो उन्हें लगे कि इसे खुद देवानंद बयान कर रहा है.

किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी, दोनों ने ही आपके लिए गाने गाए. आपका क्या कहना है उन गायकों के बारे में?

दोनों ही बहुत महान गायक थे. पर दोनों का कलेवर अलग था. किशोर जहाँ चुलबुले क़िस्म के गीतों के उम्दा गायक थे वहीं रफ़ी साहब की आवाज़ एक सुलझे और समझदार किरदार के लिए बेजोड़ थी. आज भी जब मैं अपनी फ़िल्मों के गाने सुनता हूँ तो लगता है कि बस इससे बेहतर कोई नहीं गा सकता था. दरअसल गाने के पीछे हमारी मेहनत भी होती थी. सभी लोग मिल बैठकर गाने को बनाते थे.

आपको गाने का भी शौक था क्या?

गाने का शौक तो था, लेकिन दूसरे कामों में मशगूल रहने के कारण समय नहीं मिलता था. फिर गाने वाले कई बेहतरीन कलाकार मौज़ूद हैं. अपनी फ़िल्मों में मैं कोई गाना तब तक नहीं लेता जब तक वो मेरे दिल को नहीं छू जाए. इसका पैमाना आदमी के अंदर मौजूद सिक्स्थ सेंस होता है. क्योंकि अच्छा संगीत दिल को छू जाता है.

देवसाहब, आप आज इतनी महान हस्ती हैं तो क्या कभी आप मुड़कर सोचते हैं कि इतना लंबा सफ़र तय कर लिया, क्या कारण रहा, वो क्या बात रही जिसने आपको यहाँ तक पहुँचाया ?

बड़ा मुश्किल है इस बारे में कोई निष्कर्ष निकालना. जब मैं काम करता हूँ तो मुझे लगता है कि अभी ये परफ़ेक्ट नहीं हुआ है लेकिन फिर एक सीमा के बाद उसे रोक देना पड़ता है, वरना परफ़ेक्शन की कोई सीमा नहीं. हालांकि अच्छा है कि आप आसमान छूना चाहें. और आगे बढ़ने के लिए यही एटीट्यूड चाहिए.

फ़िल्मों के अलावा आप और क्या करना पसंद करते हैं?

कुछ और सोचने की ज़रूरत नहीं. फ़िल्मों में सब कुछ समाया हुआ है. चाहें वो राजनीत, कला, संगीत, न्यूज़, विचार, गीत हो सब कुछ फ़िल्मों में हैं. शायद यही कारण है कि सभी लोग फ़िल्मी कलाकारों को स्टेज पर बुलाना चाहते हैं.

अच्छा ये बताइए आप खुद को फ़िट रखने के लिए खाते क्या हैं?

देखिए मैं एक एक्टर हूँ, एक्टर के लिए ज़रूरी है कि वो प्रजेंटेबल हो. आपको अच्छा लगना चाहिए. कुछ भी हो आपको खुद को साबित करने और होड़ में बनाए रखने के लिए खुद को फ़िट रखने की बहुत ज़रूरत है. हालांकि ये बहुत ही मुश्किल काम है. इसके लिए अनुशासन की बहुत ज़रूरत होती है और मैं इस मामले में बेहद अनुशासित हूँ. मैं योग नहीं करता लेकिन अंदर से योगी की तरह रहता हूँ. सादा खाना, दाल-रोटी पसंद है. शराब, सिगरेट नहीं पीता. विदेशों में भी जाता हूँ तो भारतीय खाना पसंद करता हूँ. यही कारण है कि कोई फ़ैट नहीं है और इस उम्र में फ़िट नज़र आता हूँ. मैं साधारण परिवार से आया था और आज भी साधारण हूँ, लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि देव आनंद होना वाकई मुश्क़िल है.

देव साहब, हमने बीबीसी एक मुलाक़ात के लिए आज तक कई इंटरव्यू किए लेकिन इतना कहना चाहूँगा कि आप वाकई असाधारण व्यक्तित्व हैं.

नहीं ऐसा नहीं है. लेकिन आपने ये कहा तो मेरी ज़िंदग़ी के दस साल बढ़ गए. मेरी पूरी कोशिश होगी कि अगली बार कान में मैं अपनी फ़िल्म कम्पिटीशन में लेकर आऊंगा तो फिर बात ज़रूर करूँगा.

देवसाहब आपको बहुत-बहुत धन्यवाद, आपने हमें इतना समय दिया, इतने प्यार से हमसे बात चीत की.

बीबीसी को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, और दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद बीबीसी के श्रोताओं को मेरा प्यारभरा अभिवादन.

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