हरिश्चंद्र की फ़ैक्टरी

  • 22 सितंबर 2009
हरिशचंद्राची फ़ैक्टरी

अगले साल दिए जाने वाले मशहूर ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की ओर से मराठी फ़िल्म 'हरिश्चंद्राची फ़ैक्टरी' को भेजा जाएगा. ये फ़िल्म 'सर्वोत्तम विदेशी फ़िल्म' की श्रेणी में प्रतिस्पर्द्धा में होगी. इस फिल्म का निर्देशन किया है परेश मोकाशी ने.

परेश मोकाशी पिछले 20 साल से मराठी रंगमंच से जुड़े हैं और ये उनकी पहली फ़िल्म है.

एक बातचीत के दौरान मोकाशी ने बीबीसी को बताया कि उनकी फ़िल्म को भारत की ओर से ऑस्कर समारोह में भेजा जाना एक ‘आश्चर्ययुक्त ख़ुशी’ है.

उन्होंने कहा, "किसी भी फ़िल्मकार के लिए ये एक बड़ा सम्मान है, साथ ही अब इस फ़िल्म को अमरीका तक और उसके बाद ऑस्कर की ज्यूरी कैसे पहुंचाना है इसकी ज़िम्मेदारी भी है."

परेश मोकाशी आजकल बस ये जानने में लगे हैं कि वो अपनी फ़िल्म हरिश्चंद्राची फ़ैक्टरी का अमरीका में प्रचार-प्रसार कैसे करेंगे.

मोकाशी ने बीबीसी को बताया, "हमारा कार्यक्रम ये है कि भारत से इससे पहले ऑस्कर में गई भारतीय फ़िल्मों से जुड़े लोगों के साथ सलाह-मशविरा करके हम कोई अपनी योजना बनायेंगे."

फ़िल्म

मराठी फ़िल्म ‘हरिश्चंद्राची फ़ैक्टरी’ विख्यात भारतीय फ़िल्मकार दादासाहेब फ़ाल्के के जीवन पर आधारित है. कहानी ये है कि किस तरह फ़ाल्के ने भारत की पहली फ़िल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई थी.

ये फ़िल्म 1911 में बनना शुरु हुई थी और 3 मई 1913 को रिलीज़ हुई थी. इस दौरान दादासाहेब फ़ाल्के जिन दिक्कतों और चुनौतियों से दो-चार होते रहे, ये फ़िल्म इसी की कहानी है.

Image caption हरिशचंद्राची फ़ैक्टरी के निर्देशक परेश मोकाशी की ये पहली फ़िल्म है

मोकाशी अपनी फ़िल्म की कहानी को एक इंसान की साहस कथा क़रार देते हुए कहते हैं कि दादासाहेब फ़ाल्के के पास ना तो इतने पैसे और ना ही संसाधन लेकिन उन्हें फ़िल्म बनाने का जुनून था.

इस साल के शुरु में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म के देश के अंदर कई फ़िल्म समारोहों में सराहा गया है और पुरस्कृत भी किया गया है.

राष्ट्रीय स्तर पर कई बड़े फ़िल्म समारोहों में इसे सर्वोत्तम फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के कई एवार्ड मिल चुके हैं

फ़ाल्के

दादासाहेब फ़ाल्के गजब की शख़्सियत थे. उन्होंने उस काल में चलचित्र बनाने की ठानी जब किसी को पता भी नहीं था इस कला को क्या नाम दें. मोकाशी ने उनपर ख़ूब शोध किया है.

वो कहते हैं, "1911 में फ़ाल्के जी ने मुंबई में एक अमरीकी साइलेंट फ़िल्म देखी और सोचा कि क्यों ना हम कुछ ऐसा ही बनाएं. उन्होंने फ़िल्म मेकिंग के बारे में पढ़ने के लिए किताबें घर के बर्तन बेचकर ख़रीदीं."

मोकाशी कहते हैं फ़ाल्के जी ने अपनी पत्नी सरस्वती फ़ाल्के को भी फ़िल्म कला में निपुण बना दिया और वो फ़िल्म में काम करने के बाद क़रीब 30 लोगों के लिए खाना भी बनातीं थीं.

Image caption भारतीय सिनेमा कि पितामह दादासाहेब फ़ाल्के ने तमाम दिक्कतों के बावजूद भारत का पहला चलचित्र बनाया

तो ऑस्कर में परेश मोकाशी को इस फ़िल्म से क्या उम्मीदें हैं? परेश कहते हैं, "पता नहीं, इस विषय में कुछ भी टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता. आप तो सिर्फ़ प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं लेकिन उसका यश या अपयश तो परीक्षकों के हाथों में होता है. और हमें विशेषतौर से उन्हें प्रभावित करने का कुछ प्रयत्न भी नहीं करना चाहिए."

फ़िल्म को अब इतनी प्रसिद्धि मिल गई है कि इसे अन्य भारतीय भाषाओं में भी डब करके रिलीज़ करने की योजना है. और हो सकता है कि जल्द ही हरिश्चंद्राची फ़ैक्टरी हिंदी में देखने को मिले.

आज से क़रीब 100 साल पहले की कहानी को बनाने में परेश मोकाशी को भी कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा, हालांकि मोकाशी स्वीकार करते हैं कि दादासाहेब की चुनौतियों का उनकी दिक्कतों से कोई मेल नहीं.

संबंधित समाचार