'राष्ट्रीय पुरस्कार से आश्चर्यचकित हूँ'

शेफाली शाह
Image caption शेफाली शाह को फ़िल्म 'लास्ट लीयर' के लिए सह अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है.

रितुपर्णो घोष की अंग्रेजी फ़िल्म ‘लास्ट लीयर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहयोगी अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार शेफाली शाह को दिया गया है. राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने से शेफाली आश्चर्यचकित हैं. उनका मानना है कि वे हर फ़िल्म के लिए एक जैसी मेहनत करती हैं.

आपको जिस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया उसके लिए लोग हैरान है. जबकि लोग मान रहे थे की ‘गांधी माइ फ़ादर’ की भूमिका ‘लास्ट लीयर’ की वंदना की भूमिका से ज़्यादा दमदार थी?

मैंने दोनों भूमिकाओं में बराबर मेहनत की थी. कस्तूरबा बनना आसान काम नहीं था. लेकिन सुभाष घई की ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ के बाद मैंने जब ‘लास्ट लीयर’ की भूमिका की तो मैं खुद हैरान थी. अभिनेत्री के रूप में मेरे लिए कोई भी भूमिका चुनौती से कम नहीं होती है. ‘लास्ट लीयर’ में शेक्सपियर का दीवाना एक उम्रदराज़ अभिनेता ख़ुद के लिए अभी भी जगह तलाश रहा है. हाँ, कस्तूरबा की भूमिका मैं मैंने 35 साल में अपने से दुगनी उम्र का चरित्र निभाया.

आपको लगता है कि वंदना जैसी औरत की भूमिका लोगों को पसंद आ सकती थी?

हाँ. मेरे लिए वो भूमिका व्यक्तिगत तौर पर ख़ास थी. मैं अमितजी के साथ वक्त में काम कर चुकी थी. मैं एक बार और उनके साथ काम करना चाहती थी.

जहाँ तक वंदना की भूमिका की बात है तो वह एक ऐसे पात्र में तब्दील औरत थी जो एक बार ख़ुद से जूझते आदमी का नाटक देखने जाती है. उससे प्रेम करने लगती है. वह दुनिया की चिंता किए बिना उसके साथ उसके घर में रहने आ जाती है. वंदना एक ऐसे रिश्ते को दर्शाने वाली औरत थी जो प्रेम का अर्थ जानती थी.

आपने इतनी हिंदी फ़िल्में कीं लेकिन आपको पुरस्कार मिला अंग्रेज़ी फ़िल्म के लिए. क्या अंग्रेज़ी फिल्मों का बाज़ार और लोकप्रियता किसी हिंदी सिनेमा के कलाकार को राष्ट्रीय पुरस्कार दिला सकती है?

क्यों नहीं.हमारे यहाँ अब जिस तरह से मल्टीप्लैक्सेज सिनेमा का विस्तार हुआ है, उसमें अब हर तरह के सिनेमा के लिए जगह और दर्शक हैं.यह मेरी पहली अंग्रेज़ी फ़िल्म नहीं थी. इसके साथ-साथ मैं ‘मानसून वेडिंग’, ’15 पार्क एवेन्यू’ और ‘गाँधी माइ फादर’ जैसी फ़िल्में कर ही रही थी.

पहले लोग राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद कलाकारों को नए सिरे से पहचान जाते थे. अब लोग आपके बारे में कितना जानते हैं?

जब मैंने ‘सत्या’, ‘मानसून’ या ‘वक्त’ जैसी फिल्में की थीं तो लोगों ने मुझसे उनके बारे में ज़्यादा नहीं पूछा था. लेकिन ‘गांधी माइ फ़ादर’ के बाद लोगों ने मुझसे कहा कि तुमने यह कैसे कर लिया. यह बिल्कुल ऐसा था जैसे मुझे लोगों ने ‘सत्या’ और ‘मानसून’ के बाद कहा था कि तुम क्या करने जा रही हो. जब ‘लास्ट लीयर’ के पुरस्कार की घोषणा हुई तो मैं सो रही थी . अब लोगों के फ़ोन मुझे सोने नहीं दे रहे हैं .

आपके परिवार में क्या प्रतिक्रिया हुई ?

इसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है. मेरे दोनों बेटे और विपुल सब ख़ुश हैं. मेरे पास जब समय होता है तो मैं काम करती हूं. मैं ऐसा काम नहीं करती कि मुझे घर के लिए समय न मिले .

तो क्या आप कुछ चुनिंदा फिल्में करने के बारे में ही सोचती हैं?

नहीं, मैं वैसी ही फ़िल्में करना चाहती हूं जो कभी-कभी बनती हैं. ‘सत्या’ , ‘मानसून..’ , ‘गांधी माइ फादर’ और ‘लास्ट लीयर’ ऐसी ही फ़िल्में कही जा सकती हैं.

विपुल शाह की फिल्म ‘लंदन ड्रीम्स’ इस हफ़्ते आ रही है. उनके बारे में क्या सोचती हैं ?

विपुल ने अपनी शुरुआत सोनी टीवी के सबसे लंबे चलने वाली शो ‘एक महल हो सपनों का’ से की थी. आज उनके खाते में ‘सिंह इस किंग’ जैसी लोकप्रिय फ़िल्में हैं. मैं खुश हूँ की लोग उनकी फ़िल्मों को पसंद करते हैं.

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