ऑस्कर की आस में मोकाशी

  • 8 नवंबर 2009
हरिश्चंद्राची फैक्ट्री
Image caption हरिश्चंद्राची फैक्ट्री को ऑस्कर में नामांकन मिला है.

ऑस्कर पुरस्कार के लिए विदेशी भाषाओं के वर्ग में इस वर्ष भारत से चुनी गई मराठी फ़िल्म हरिश्चंद्राची फैक्ट्री के निर्माता-निर्देशक परेश मोकाशी आजकल अमरीका में अपनी फ़िल्म की पैरवी में लगे हुए हैं.

भारतीय फ़िल्म फ़ेडेरेशन ने हरिश्चंद्राची फैक्ट्री को कोई 50 भाषाई फ़िल्मों में से ऑस्कर के लिए चुना है.

ऑस्कर पुरस्कार के विजेता की घोषणा अगले साल फ़रवरी महीने में की जाएगी.

हरिश्चंद्राची फैक्ट्री नामक यह फ़िल्म भारतीय फ़िल्म उद्योग के संस्थापक माने जाने वाले धुंधीराज गोविंद फाल्के के जीवन पर आधारित है जिन्हें दादा साहेब फाल्के नाम से ज़्यादा जाना जाता है.

वर्ष 1911 में दादा साहेब फाल्के ने भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र बनानी शुरू की थी और 1913 में यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी.

दादा साहेब को समर्पित

Image caption फ़िल्म के प्रोमोशन की ज़ोरदार कोशिश हो रही है.

दादा साहेब फाल्के ने इस फ़िल्म को कैसे बनाया और इसे बनाने में उनको किन हालात का सामना करना पड़ा इस सबको हरिश्चंद्राची फैक्ट्री नामक इस फ़िल्म में दर्शाया गया है.

फ़िल्म के निर्देशक परेश मोकाशी की यह पहली फ़िल्म है.

मोकाशी का कहना है कि ऑस्कर के लिए चुना जाना ही उनके लिए बहुत बड़ा सम्मान है.

वह कहते हैं, “मैं तो ऑस्कर के लिए तैयार हूं लेकिन वह मेरे लिए तैयार है कि नहीं यह देखना है अभी."

उनका कहना है, "आजकल बहुत ज़्यादा प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. भारत में 15-20 भाषाओं में बनने वाली करीब 50 फ़िल्मों में से हरिश्चंद्राची फैक्ट्री को ऑस्कर के लिए चुना जाना बहुत बड़ी बात है. हॉलीवुड की जो आर्थिक शक्ति है और उसके कारण विश्व भर में जिस तरह से उनका बोलबाला है वह तो हम नहीं नकार सकते. तो ऑस्कर के लिए भारत से चुना जाना ही बहुत बड़ी बात है.”

मोकाशी कहते हैं कि फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक होने के नाते वह और यूटीवी कंपनी फ़िल्म को ऑस्कर दिलाने के लिए पूरी जान लगा रहे हैं.

उनकी कोशिश है कि अमरीकी लोगों को भी यह फ़िल्म ज़्यादा से ज़्यादा देखने को मिले.

मोकाशी कहते हैं, “हम सब इसी दिशा में मिलकर प्रयत्न कर रहे हैं कि किस प्रकार हम इस फ़िल्म को हॉलीवुड या अमरीका की मुख्यधारा में पहुंचा सकें. यह फ़िल्म हॉलीवुड की ज्यूरी को अपील करेगी या नहीं हमे पता नहीं है. हमारे हाथ में तो यह प्रोमोशन ही बचता है. और ज़्यादा से ज़्यादा ज्यूरी के लोग इस फ़िल्म को देखें. बाकी निर्णय तो उनके हाथ में होगा, उसमें तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे, लेकिन फ़िल्म तो देखनी चाहिए ताकि वह सही तरीके से तय तो कर पाएं कि फ़िल्म अच्छी है या बुरी.”

मोकाशी कहते हैं कि अमरीका में न्यूयॉर्क में पहला शो अच्छा रहा और सभी लोग फ़िल्म को शुभकामनाएं दे रहे हैं. लोगों को यह बात भी उत्साहित कर रही है कि भारत की एक फ़िल्म है जो ऑस्कर के लिए चुनी गई है.

नामी कलाकार नहीं

Image caption परेश मोकाशी कहते हैं कि फ़िल्म से दादा साहेब को समझने में मदद मिलेगी.

मोकाशी कहते हैं कि उनके लिए यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह फाल्के जी पर बनी फ़िल्म है. वह कहते हैं, "लोग आजतक उनके बारे में ज़्यादा नहीं जानते. उन्होंने भारतीय फ़िल्म उद्योग के लिए क्या किया, कैसे पहली फ़िल्म बनाई भारत में, यह सब बहुत कम ही लोग जानते हैं."

अपनी पहली ही फ़िल्म में इस प्रकार की कथा के बारे में परेश मोकाशी कहते हैं, “अपनी पहली ही फ़िल्म में मैने दादा साहेब फाल्के के बारे में फ़िल्म बनाने का इसलिए सोचा क्योंकि किसी ने आज तक इस विषय पर कुछ किया ही नहीं था. किसी को पता नहीं था कि फाल्के जी ने असल में क्या किया था. हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री विश्व में सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री है जहां हर साल एक हज़ार से ज़्यादा फ़िल्में बनती हैं. लेकिन फिर भी हमें पता नहीं था कि हमारे देश में यह सब फ़िल्में बनाने का काम कैसे शुरू हुआ, तो इसीलिए यह बड़ी रोचक कहानी है.”

लेकिन फ़िल्म के लिए उनकी इस कथा के चयन पर शुरू में लोगों ने मज़ाक तक उड़ाया था और उन्हें इसके लिए प्रायोजक ढूंढने में भी मुश्किल हुई थी. इस फ़िल्म को बनाने में करीब 4 करोड़ रूपए लगे हैं.

लेकिन अब हरिश्चंद्राची फ़ैक्ट्री को भारत में राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार भी मिल चुके हैं और कुछ अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों के लिए भी चुना गया है.

इस फ़िल्म में कोई नामी कलाकार नहीं है और न ही इसमें नाच गाने शामिल हैं. मराठी रंगमंच के कलाकार नन्दू माधव ने मुख्य भूमिका निभाई है.

मोकाशी अपनी फ़िल्म की कामयाबी पर पूरी टीम के योगदान को याद करते हैं, “मेरी पूरी टीम का योगदान है इस फ़िल्म को बनाने में. मेरे सारे कास्ट और क्रू, सारे कलाकार और संशोधन की टीम, और बहुत से बड़े बूढ़े जो उस काल के बारे में परिचित हैं जिनका बहुत सारा योगदान रहा है इस फ़िल्म के लिए. सभी का इसमें योगदान है. ”

भारतीय फ़िल्म उद्योग में अपने 19 साल के करियर के दौरान दादासाहेब फाल्के ने 95 फ़िल्में बनाई थीं.

सन 1969 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की स्थापना की थी जो भारत में फ़िल्म क्षेत्र का सर्वोच्च पुरस्कार है.

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