केके मेनन के साथ एक मुलाक़ात

केके मेनन
Image caption केके मेनन ने बॉलीवुड की कई फ़िल्मों में बेहतरीन अभिनय किया है

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते है. इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं अभिनेता केके मेनन.

आपको सबसे प्रतिभावान अभिनेता के रूप में देखा जाता है. क्या आप खुद को भी ऐसे ही देखते थे या फिर ये आपके लिए एक सरप्राइज़ पैकेज की तरह था?

दरअसल, मुझे इस बारे में तो पता नहीं है, लेकिन मैं अपने काम को बहुत शिद्दत से करता हूँ. जो किरदार की डिमांड होती है, उसे निभाने की कोशिश करता हूँ.

क्या आप हमेशा इस बात पर ध्यान देते हैं कि सिर्फ़ अच्छी या अहम भूमिकाएँ ही करनी हैं?

मेरे ख़्याल से हम इस पेशे में इसीलिए आए हैं कि हम अभिनय कर सकें. वरना मैं एक मॉडल भी बन सकता था. तो इसका सीधा जवाब ये है कि क्योंकि अभिनय इस पेशे से जुड़ी डिमांड है और मैं वही कर रहा हूँ.

आपने कहा कि आप मॉडल भी बन सकते थे. तो आपको इस बात का अहसास है कि आप अच्छा दिखते हैं?

मेरे ख़्याल से मॉडलिंग के बारे में सिर्फ़ ये धारणा रखना कि अच्छे दिखने वाले लोग ही मॉडल बन सकते हैं. मेरा मानना है कि मॉडल के लिए व्यक्तित्व अच्छा होना ज़्यादा ज़रूरी है.

क्या कभी आपने सोचा था कि आप मुंबइया फ़िल्मी हीरो बनेंगे?

मेरा मानना है कि हीरो का मतलब पोस्टफैक्टो है. यानी आप हीरो तब बनते हैं जब आप हीरो लायक काम करते हैं. आप उसे मुख्य भूमिका कह सकते हैं, लेकिन हीरो तो काम करने के बाद ही मिल सकते हैं.

एक्टर बनने के बारे में आपने कब सोचा?

ये तो पता नहीं कि एक्टर बनने के बारे में कब सोचा. लेकिन काफी पहले से मैं ये कर रहा हूँ. मैं 1993 या 95 में मुंबई आया था और तब से लेकर थिएटर और फ़िल्में कर रहा हूँ.

क्या बचपन से ही आपको इस बात का अहसास था कि बड़े होकर अभिनय करना है?

मेरा मानना है कि हर आदमी इस दुनिया में किसी ख़ास के लिए आया होता है और उसमें वो ख़ास प्रतिभा होती है. वो ढूँढना बहुत ज़रूरी है. जब मैंने ये ढूँढ लिया तो मुझे लगा कि यही काम मेरे लिए है. बचपन में भी जब कभी स्टेज पर जाता था तो लगता था कि इसी काम में मुझे सबसे ज़्यादा मजा आता है.

तो आपने एमबीए भी किया है. क्या बनना चाहते थे?

मुझे नहीं पता था कि मैं क्या बनना चाहता था, लेकिन तब माना जाता था कि एमबीए कर लो तो थोड़ी बहुत लाइफ सैट हो जाती है. ये अलग बात है कि मैं आज भी खुद की मार्केटिंग करना नहीं जानता.

आपने पहले थिएटर किया फिर टीवी और बाद में फ़िल्मों में आए. सबसे ज़्यादा कहाँ मजा आया?

लोग कहते हैं कि थिएटर का आदमी थिएटर का होता है. लेकिन मैं थिएटर से ज़्यादा सिनेमा को पसंद करता हूँ. पता नहीं क्यों मुझे इस आर्ट में ज़्यादा मजा आता है.

आपने कई तरह की भूमिकाएँ की हैं. लाइफ इन मेट्रो, गुलाल, संकट सिटी, मान गए मुग़ले आज़म. आपके नज़दीक किस किस्म का इंसान ज़्यादा है?

मेरे ख़्याल से अगर कोई अभिनेता कहता है वो इस किरदार के नजदीक है और ये नहीं है, तो वो फर्ज़ी अभिनेता है. तो अगर मैं खूंखार हूँ तो वो भी मेरे भीतर का है और मजाकिया हूँ तो वो भी मैं ही हूँ. हंसना, रोना और दूसरी तमाम तरह की भावनाएँ कला की हिस्सा हैं. इनमें अंतर का काम उन लोगों पर छोड़ देना चाहिए एक्टिंग नहीं करना चाहते बल्कि इस पर पीएचडी करना चाहते हैं.

क्या कभी-कभी आपको ऐसा लगता है कि किसी ख़ास शक्ल की कद-काठी वाले लोग ही हीरो बनेंगे और बाकी चरित्र अभिनेता?

ये बात भी मेरे समझ में नहीं आती. अगर कोई चरित्र अभिनेता है तो फिर क्या हीरो चरित्रहीन है. हालाँकि आपका सवाल सही है. तो मैं तो यही कहूँगा कि हीरो चरित्रहीन हैं और हम ही असली हीरो हैं. मेरा तो मानना है कि हीरो का स्टारडम से कोई मतलब नहीं है. विजय माल्या भी हीरो हैं.

मैं अपना जीवन सामान्य तौर पर बिताना चाहता हूँ. मेरा मानना है कि हीरो बनने के मुक़ाबले एक्टिंग करना ज़्यादा मुश्किल है. एक्टिंग पर पान वाले से लेकर साइंटिस्ट तक टिप्पणी कर लेते हैं, क्योंकि इसका कोई ख़ास मापदंड नहीं है. हॉलीवुड को ही लें ब्रेड पिट और डेनिरो दोनों को ही वहाँ बराबर इज़्जत मिलती है.

मुझे आपसे बात करते हुए कुछ विद्रोही रुख़ सा दिख रहा है?

Image caption केके मेनन का कहना है कि अमिताभ के अभिनय पर बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं हुआ है

नहीं. बिल्कुल नहीं. जहाँ तक मेरी जीवनशैली का सवाल है तो मेरे लिए संतुष्टि ज़्यादा ज़रूरी है. अगर मेरी बड़ी गाड़ी सर्विस के लिए गई है तो मुझे किसी दूसरी छोटी कार से किसी समारोह में जाने में हिचक नहीं होती. आप जिस तरह से आराम और सहज महसूस करते हैं, वैसा ही रहना चाहिए.

अच्छा ये बताएँ कि फ़िल्मी दुनिया में आपके पसंदीदी फ़िल्म मेकर कौन हैं?

पसंदीदा निर्देशक, अभिनेताओं के बारे में बता पाना बहुत मुश्किल होता है. क्योंकि इतने सारे नाम हैं कि अगर एक का नाम लिया तो लगेगा कि उसका नाम छूट गया. तो हॉलीवुड, बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा में बहुत सारे नाम हैं जो बहुत अच्छे लगते हैं.

अपनी फ़िल्मों में से आपको सबसे ज़्यादा किसमें काम करने में मजा आया?

चार-पाँच फ़िल्मों में काम करने में बहुत मजा आया. सरकार, गुलाल, हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी, संकट सिटी, हनीमून ट्रेवल्स. इसके अलावा अनुराग कश्यप की एक फ़िल्म है पाँच, जो रिलीज़ नहीं हुई और शायद होगी भी नहीं, उसमें काम करने में काफी आनंद आया.

सरकार में आपकी भूमिका बहुत अच्छी थी. तो क्या बच्चन परिवार के साथ काम करने में मजा आया?

बहुत-बहुत मजा आया. अमिताभ बच्चन जिस तरह से काम करते हैं वो लाजवाब है और उनसे बहुत सीखने को मिलता है. वो एक नए अभिनेता की तरह काम करते हैं और लगातार रिहर्सल करते हैं.

और अभिषेक के बारे में आपका क्या कहना है?

मेरा मानना है कि उनकी अपनी यात्रा है. वो बच्चन परिवार से थे और उनसे बहुत उम्मीदें की जा रही थी. उनकी 16-17 फ़िल्में ख़ास नहीं चली, लेकिन अब उनकी यात्रा पटरी पर आ गई लगती है.

आपने कॉर्पोरेट में विपाशा बसु के साथ काम किया. कैसा रहा उनके साथ काम करने का अनुभव?

दरअसल, आप ये जो सवाल पूछते हैं वो सब कल्पनाओं पर आधारित होती हैं. हम लोग जब काम करते हैं तो वैसा नहीं होता कि हॉटेस्ट हीरोइन के साथ काम कर रहे हैं.

कोई ऐसी अभिनेत्री जिसके साथ काम करने की इच्छा हो?

माधुरी दीक्षित के साथ काम करना चाहता हूँ. अमिताभ के साथ काम करने की इच्छा थी तो वो पूरी हो गई. नसीरुद्दीन साहब के साथ काम करना था तो मैंने नाटक में भी काम किया और उनके साथ फ़िल्में भी की. जहाँ तक माधुरी का सवाल है तो वे भारतीय फ़िल्म इतिहास की सबसे खूबसूरत महिलाओं में से हैं.

आपकी नज़र में सबसे खूबसूरत महिला कौन है?

ऐसी महिला जिसके साथ बातचीत करने या रहने में सहज हों, वो खूबसूरत है.

जब आप कोई ख़ास तरह की भूमिका करते हैं तो इसकी तैयारी कैसे करते हैं?

मैं परंपरागत तरीके से कोई रिसर्च तो नहीं करता, लेकिन मैंने इसके लिए अपना तरीका निकाल लिया है. मैं मानता हूँ कि पटकथा को बार-बार पढ़ो और उसी में से किरदार को जीने की कोशिश करता हूँ.

‘सरकार’ में अपने किरदार की तैयारी आपने कैसे की?

मैं डायरेक्टर के साथ लगातार बात करता था. आप जब किसी किरदार को निभाते हैं तो आपको इस बात का ख़्याल भी रखना होता है कि आप डायरेक्टर के विज़न से बाहर न जाएँ.

कोई ऐसी भूमिका जिसे करने की इच्छा हो?

मुझे पता नहीं होता कि मैं कौन सी भूमिका निभाना चाहता हूँ. जैसे अभी अगर मैं कहूँ कि मैं अलेक्जेंडर का किरदार निभाना चाहता हूँ, लेकिन जब उसकी पटकथा मेरे सामने लाई जाए तो शायद मैं ये किरदार न करना चाहूँ.

आपको क्या लगता है कि अभिनय नेचुरल टैलेंट है या इसे सीखा जा सकता है?

मेरा मानना है कि कला कोई भी हो, ये आपके साथ पैदाइशी होती है. मेरे ख़्याल से ये हर पेशे में है. फिर चाहे वो क्रिकेटर हो, पेंटर हो, एक्टर हो या फिर सिंगर. जैसे सचिन का बल्ला उनके हाथ की तरह लगता है.

अगर आप एक्टर नहीं बनते तो क्या बनते?

पता नहीं क्या करता. शायद कहीँ और मेहनत कर रहा होता. मिसाल के तौर पर मुझे खेल से बहुत लगाव है. टेनिस, बैडमिंटन, क्रिकेट खेलता हूँ. मैं जानता हूँ कि मुझमें इन्हें खेलने का पैदाइशी हुनर नहीं है तो शायद इन खेलों में मेहनत कर रहा होता.

किसी बच्चे को अगर आप अपने बारे में बता रहे होते तो क्या बताते?

पहला तो, मैं बच्चे को अपने बारे में बताता ही नहीं. क्योंकि वो खुद ही भांप लेते हैं. जहाँ तक मैं कैसा हूँ और क्या हूँ, ये तो मुझे भी नहीं पता. अगर मुझे ये पता होता तो मैं भगवान होता. तो ये बाकी लोगों पर निर्भर है कि मैं क्या हूँ.

बीबीसी मुलाक़ात में अपनी पसंद के गाने बताएँ?

मुझे रफ़ी साहब का गाना ‘अभी न जाओ छोड़कर’ बहुत पसंद है. इसके अलावा ‘खोया-खोया चांद’, ‘रात कली एक ख़्वाब में आई’ और ‘सजना जी वारी-वारी’ भी मुझे पसंद हैं.

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