गुलशन बावरा ने कहा अलविदा

  • 26 दिसंबर 2009
Image caption उपकार के दो गाने गुलशन बावरा ने लिखे थे

हिंदी सिनेमा की दिग्गज हस्ती और जाने-माने गीतकर गुलशन बावरा ने अगस्त में दुनिया को अलविदा कह दिया. चार दशक से भी लंबे फ़िल्मी करियर में गुलशन बावरा ने हिंदी सिनेमा को कई बेहतरीन गीत दिए.

अपनी सादी शैली के लिए पहचाने जाने वाले गुलशन बावरा का शायद सबसे चर्चित गीत रहा 'मेरे देश की धरती सोना उगले' जो उन्होंने फ़िल्म उपकार के लिए लिखा.

अगर आज की तारीख़ में भारतवासी 'जय हो' गाकर अपनी देशभक्ति अभिव्यक्त करते हैं तो 60 के दशक में ये सम्मान 'मेरे देश की धरती को' हासिल था. देश प्रेम से ओत-प्रोत ये गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस जैसे आयोजनों पर ज़रूर रेडियो और टीवी स्टेशनों पर बजाया जाता है.

सादी शैली, अर्थपूर्ण गीत

शुरुआती दिनों में क्लर्क का काम करने वाले गुलशन बावरा ने मुंबई का रुख़ किया और काफ़ी संघर्ष किया. 1959 में आई सट्टा बाज़ार में उन्हें कुछ सफलता हाथ लगी.

फिर मनोज कुमार की फ़िल्म उपकार ने उनके करियर को नई ऊँचाई दी. मेरे देश की धरती के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला.

इसके बाद तो उनकी कलम से कई ख़ूबसूरत गीत निकले. सत्ते पे सत्ता, अगर तुम न होते, कसमे वादे, हाथ की सफ़ाई, रफ़ू चक्कर, जंज़ीर जैसी फ़िल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे.

दोस्ती, रोमांस, मस्ती, ग़म- जीवन के हर रंग के गीतों को उन्होंने अलफाज़ दिए. जंज़ीर का 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी' दोस्ती की दास्तां बयां करता है तो मस्ती के आलम में डूबा 'दुक्की पे दुक्की हो या सत्ते पे सत्ता' भी उन्होंने लिखा.

बिंदास प्यार करने वालों के लिए 'खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे' हो या प्यार की कसमें खाते दिलों के लिए ' कसमे वादे निभाएँगे हम' हो, उनके पास हर मौके के लिए गीत था.

यारी है ईमान के लिए उन्हें दूसरी बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया.

पाकिस्तान से आकर भारत बसे गुलशन बावरा ने अपने लंबे फ़िल्मी करियर की तुलना में कमोबेश कम ही गीत लिखे लेकिन उनके सादे और अर्थपूर्ण गीत हमेशा पसंद किए गए.

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