लेखिका कमला सुरैया का निधन

अंगेज़ी और मलयालम की जानी मानी लेखिका कमला सुरैया का मई 2009 में निधन हो गया.

केरल में जन्मी सुरैया करीब दस साल पहले इस्लाम धर्म ग्रहण करने से पहले कमला दास के नाम से जानी जाती थीं.

कविताओं और कहानियों पर समान अधिकार रखने वाली सुरैया की ‘माई स्टोरी’ का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका है.

सुरैया ने मलयालम में माधवीकुट्टी के नाम से कई लघु कथाएँ भी लिखीं हैं.

प्रबंधन विशेषज्ञ वीएम नायर और जानी मानी कवयित्री बालामणियम्मा की पुत्री सुरैया का जन्म त्रिसूर ज़िले के पुन्नायारकुलम के नलप्पड़ परिवार में हुआ था.

उनके दिवंगत पति माधवदास रिजर्व बैंक में अधिकारी थे. उनके परिवार में प्रसिद्ध पत्रकार एम डी नलप्पड़ समेत दो पुत्र हैं.

नारीवादी लेखिका

कमला जब आठ वर्ष की थीं तभी उन्होंने विक्टर ह्यूगो की रचना का मलयाली में अनुवाद किया था.

वो साहित्य जगत में पहली कविता संग्रह 'समर इन कलकत्ता' से सुर्ख़ियों में आईं और उनकी छवि कांतिकारी कवयित्री के रुप में बनीं.

उनकी रचनाओं में रुढिवादी समाज में महिलाओं पर लगी बंदिशों का चित्रण होता था.

उनकी कविताओं में 'ऐन इंट्रोडक्शन, द डिसेंडेंट, अल्फ़ाबेट ऑफ़ लस्ट और ओनली सोल नोज़ हाऊ टु सिंग' काफी लोकप्रिय हुईं लेकिन उनकी कई रचनाओं की आलोचना भी हुई.

लेकिन सबसे ज़्यादा आलोचना उनकी आत्मकथा 'माइ स्टोरी' को लेकर हुई जिसका प्रकाशन वर्ष 1976 में हुआ. उन पर विवाहेतर संबंधों को सही ठहराने के आरोप लगे.

वर्ष 1999 में उन्होंने इस्लाम अपना लिया और इसको लेकर भी काफी विवाद हुआ.

कभी अपनी लेखनी में भगवान कृष्ण का ज़िक्र करने वाली और अपने को राधा बताने वाली कमला के उस बयान पर काफी हंगामा मचा जिसमें उन्होंने कहा था, 'मैंने अपने कृष्ण को अल्लाह में रुपांतरित कर दिया.'

उन्होंने वर्ष 1984 में साहित्य के नोबल पुरस्कार के दावेदारों की सूची में भी जगह बनाई. हालांकि उन्हें सफ़लता हासिल नहीं हुई.

लेकिन अपनी रचनाओं के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिले जिनमें एसियन पोएट्री प्राइज़, केंड अवार्ड फ़ॉर इंग्लिश राइटिंग फ़्रॉम एसियन कंट्रीज, साहित्य अकादमी और केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार शामिल है.