फ़िल्मकार भी आधा पत्रकार: रामगोपाल वर्मा

राम गोपाल वर्मा
Image caption राम गोपाल वर्मा ने अमिताभ के साथ सरकार, सरकार राज, निशब्द जैसी फ़िल्में की हैं

नए साल की शुरुआत फ़िल्मकार रामगोपाल वर्मा अपनी नई फ़िल्म 'रण' से कर रहे हैं. फ़िल्म मीडिया के इर्द-गिर्द घूमती है.

इसमें अमिताभ बच्चन का मुख्य रोल है, जिनके साथ रामगोपाल वर्मा सरकार, सरकार राज, निशब्द जैसी फ़िल्में कर चुके हैं.

रामगोपाल वर्मा ने बीबीसी से ख़ास बातचीत की और अपनी फ़िल्मों और मीडिया पर बेबाक राय दी.

मीडिया पर आधारित फ़िल्म रण बनाने का फ़ैसला क्यों किया आपने?

अब तक भारत में मीडिया को लेकर जो फ़िल्में बनीं हैं वो सारी प्रिंट मीडिया पर बनीं हैं, वो भी 25-30 साल पहले. भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर फ़िल्म नहीं बनी. मुझे लगता है कि शायद रण पहली फ़िल्म है. इसलिए मैं मीडिया पर फ़िल्म बनाना चाहता था.

क्या आप उन लोगों में से हैं जो निष्ठापूर्वक हर रोज़ न्यूज़ चैनल देखते हैं?

मैं उन लोगों में से नहीं हूँ लेकिन आज की तारीख़ में न्यूज़ चैनलों को नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं है. आप सुबह टीवी चलाओ तो घर में कोई न कोई न्यूज़ चैनल दिख ही जाता है. बाहर भी जाओ तो भी न्यूज़ चैनल चल ही रहे होते हैं.

तो क्या ये फ़िल्म मीडिया का पर्दाफ़ाश करने की कोशिश है?

मीडिया सबका पर्दाफ़ाश करता है, मैं रण के ज़रिए मीडिया को एक्सपोज़ कर रहा हूँ.

आपके हिसाब से मीडिया का रोल क्या होना चाहिए?

कोई भी संस्था या संस्थान हो, उसे वही काम करना चाहिए जिसके लिए उसकी स्थापना हुई है.

मीडिया का काम लोगों को सच बताना है, ये जानकारी देना है कि देश-दुनिया में क्या हो रहा है, लोगों को जागरुक करना है कि क्या सरकार उनसे किए वादों को निभा रही है.

लेकिन आज की अर्थव्यवस्था ऐसी है कि प्रतिस्पर्धा बहुत है. चैनलों को व्यावसायिक पहलू देखना होता है और फिर टीआरपी का भी खेल है. इसलिए चैनल पूरी ज़िम्मेदारी के साथ काम नहीं कर पाते. चैनलों की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं. रण इन्हीं सब बातों को उठाती है.

कई साल पहले आपने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि फ़िल्मकार का काम पत्रकार के समान हैं. आज भी आपका यही मानना है या मीडिया के बदलते माहौल में आपकी सोच भी बदल गई है.

मैं अब भी मानता हूँ कि फ़िल्मकार ज़्यादा नहीं तो आधा पत्रकार होता है. फ़िल्मकार अपनी प्रेरणा कहीं न कहीं असल घटनाओं से ही लेता है. लेकिन फ़िल्मकार इन घटनाओं को लोगों के सामने थोड़ा नाटकीय ढंग से पेश करता है.

असली मकसद यही होता है कि किसी विशेष मुद्दे की ओर लोगों का ध्यान खींचा जाए और ये काम एक फ़िल्म बख़ूबी कर सकती है. लेकिन हो सकता है कि एक न्यूज़ रिपोर्ट उतना असर न डाल पाए.

अमिताभ बच्चन के साथ आपने चार-पाँच फ़िल्में की हैं. उनके साथ कैसा अनुभव रहा है आपका.

अमिताभ बच्चन की ख़ास बात ये है कि काम करने का उनका ज़ज्बा या कहें कि हुनर ऐसा है कि वो आपको हर बार हैरत में डाल देते हैं.

आप उन्हें किसी भी परिस्थिति में डाल दो, वो उस कसौटी पर हमेशा खरे उतरते हैं. और अपने अभिनय से सबको हैरान कर देते हैं.

26/11 के हमलों के बाद आप ताज होटल गए थे और मीडिया में इसे लेकर आलोचना भी हुई थी. क्या रण में मीडिया को दिखाना उसी आलोचना का जवाब देने की कोशिश तो नहीं?

जब 26/11 के हमले हुए थे तो रण की स्क्रिप्ट पहले ही पूरी हो चुकी थी. लेकिन फिर मीडिया में ये ख़बरे उड़ने लगीं कि मैं 26/11 पर कोई फ़िल्म बना रहा हूँ. जब इस बात को लेकर विवाद हुआ था मैने तभी स्पष्ट कर दिया था कि मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है.

फ़िल्मकार होने का सबसे अच्छा पहलू या सबसे अच्छी बात कौन सी लगती है आपको.

फ़िल्म अंतत: आपसी संवाद करने की तरह है. अगर मेरे पास कहने के लिए कोई दिलचस्प बात है या मुझे लगता है कि कोई मुद्दा दिलचस्प है जिस बर बात हो सकती है तो मैं फ़िल्मकार होने के नाते उस पर फ़िल्म बना सकता हूँ.

अपनी बात कहने के लिए फ़िल्मकार कई माध्यमों का इस्तेमाल कर सकता है- कलाकार, संगीत, संवाद, नृत्य.

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