विकलांगों को समर्पित फ़िल्म फ़ेस्टिवल

फ़िल्म फ़ेस्टिवल
Image caption विकलांगों को समर्पित फ़िल्म समारोह उनके प्रति संवेदनशीलता लाने की कोशिश है

भोपाल में एक अलग तरह का अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह का आयोजन किया गया. इसका आयोजन विकलांगों के बीच काम करने वाली एक संस्था ने किया था.

तीन दिन तक चले इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में देश-विदेश की अंतरराष्ट्रीय स्तर की उन फ़िल्मों का प्रदर्शन किया गया जिनमें किसी न किसी रुप में विकलांगों को दर्शाया गया है.

प्रसिद्ध अमरीकी फ़िल्म ‘वार्म स्प्रिंग’ को भी दर्शकों को दिखाया गया, जिसमें पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति फ्रेंकलीन डी रुज़वेल्ट को दिखाया गया है. फ्रेंकलीन डी रुज़वेल्ट पोलियो से प्रभावित थे जिसकी वजह से उन्हें काफ़ी दिक्क़तों का सामना करना पड़ा था.

विकलांगों में काम करने वाली संस्था अरुषि के अनिल मुदगल कहते है, “ हमारी कोशिश लोगों के मन में सभी तरह के विकलांगों के लिए संवेदनशीलता पैदा करने की है. लोग उन्हें अलग न मानें बल्कि अपने बीच का ही इंसान मानें”.

उनका कहना है कि जब लोग संस्था के बच्चों को कहीं देखते है तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि इन्हें कहां से पकड़ लाए हैं.

वे कहते है, “लोगों के मन में इनके प्रति सम्मान और अपनेपन का भाव पैदा करने की ज़रुरत है. इसलिए सभी फ़िल्में इसी तरह का संदेश दे रही है”.

एक लड़की कहानी

इन फ़िल्मों के अलावा संस्था ने अपनी ख़ुद की फ़िल्मों का भी प्रदर्शन किया.

इन्हीं में से एक फ़िल्म ‘टीना’ थी.

ये फ़िल्म मध्यप्रदेश के शाजापुर ज़िले के एक गांव की आठ वर्षीय लड़की टीना की है, जिसके दोनों हाथ बचपन से ही नहीं हैं. इसके बावजूद ये लड़की अपने दोनों पैरों से हर काम करती है.

टीना आम बच्चों की तरह स्कूल भी जाती है और पैरों के ज़रिए लिखती है. वही स्कूल में मिलने वाले मध्यान भोजन में वह अपने पैरों के ज़रिए रोटी और पूड़ी तोड़कर खाती है. इस बालिका की कहानी ने दर्शकों को हिला कर रख दिया.

फ़िल्म देखने आए पंकज द्विवेदी ने कहा, "मुझे यहां आकर पता चला कि विकलांगता क्या होती है. समाज को अपना नज़रिया इनके प्रति बदलना चाहिए.”

एक अन्य फ़िल्म ‘तीन विकलांग’ सोफ़िया, रामू और राजा की थी. ये तीनों ही अलग अलग तरह की विकलांगता का सामना कर रहे है. इसमें इन लोगों की दिक्क़तों के साथ इनकी हिम्मत को भी दिखाया गया है.

इसमें काम करने वाला रामू पैरों से विकलांग है उसके बावजूद हर तरह के काम करता है. वो लोगों की फ़ीज़ियोथेरेपी करता है, उसके साथ ही वो विकलांगों के लिए फ़र्निचर भी बना रहा है.

रामू कहते है, “ काफ़ी हद तक मैंने अपने आप को बदल लिया है. भले ही मेरे पैर सही न हों पर मुझ में हिम्मत तो है.”

संस्था देश के विभिन्न स्कूलों में विकलांगों से संबंधित फ़िल्म दिखाने वाली है ताकि बच्चों में विकलांगों के लिए संवेदनशीलता पैदा की जा सके.

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