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विद्या बालन और अरशद वारसी
Image caption विद्या बालन और अरशद वारसी फ़िल्म 'इश्क़िया' के एक दृश्य में

इस सप्ताह रिलीज़ हो रही फ़िल्म ‘इश्क़िया’ अपनी भाषा के लिए काफ़ी चर्चा में रही है. फ़िल्म में उत्तर भारत में प्रचलित गालियों का प्रयोग किया गया है.

फ़िल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे फ़िल्म में इस्तेमाल भाषा का बचाव करते हैं.

चौबे ने बीबीसी से कहा, “ये वही भाषा है जिसमें आम लोग बात करते हैं, अगर मैं ये कहूं कि लोग ऐसे बात नहीं करते तो मैं झूठ बोल रहा होउंगा. और अगर लोग अपने जीवन ऐसे ही बात करते हैं तो वो फ़िल्मों में क्यूं नहीं कर सकते.”

चौबे कहते हैं कि ‘इश्क़िया’ अपराधियों के बारे में कहानी है जो एक पिछड़े गांव में घटती है जहां जाति संघर्ष चल रहा है और ऐसे में भाषा एक छोटा मुद्दा है.

उनका कहना था, “भाषा इसलिए मुद्दा बन जाती है क्योंकि हम में कहीं ना कहीं हिचक है, हम कैसे हैं इसका सामना करने के लिए तैयार नहीं होते.”

चौबे ज़ोर देकर कहते हैं कि ऐसी भाषा इस कहानी की मांग थी और इसे फ़िल्म में ज़बरदस्ती इस्तेमाल नहीं किया गया है क्योंकि बॉक्स ऑफ़िस पर इसका कोई फ़ायदा नहीं होता है.

कहानी

अभिषेक चौबे निर्देशित हिंदी फ़िल्म ‘इश्क़िया’ प्रेम की तमाम मानवीय कमज़ोरियों के ऊपर जीत की कहानी है.

इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन हैं.

अभिषेक चौबे जाने-माने फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज के सहायक रह चुके हैं और विशाल भारद्वाज इश्क़िया से एक निर्माता के तौर पर भी जुड़े हुए हैं.

नसीरुद्दीन शाह ख़ालूजान का किरदार कर रहे हैं और अरशद वारसी बने हैं बब्बन हुसैन.

विद्या बालन ने बीबीसी को बताया कि ये दोनों किरदार एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं. विद्या ने कहा, “ख़ालूजान उम्र के उस पड़ाव हैं जहां वो किसी के प्यार में पड़ने की कल्पना नहीं कर सकते और बब्बन दिलफेंक किस्म का किरदार है जिसकी प्यार में कोई रुचि नहीं लेकिन ये दोनों आख़िरकार मेरे किरदार को दिल दे बैठते हैं.”

अपने रोल के बारे में विद्या बालन कहती हैं कि ये एक पूर्वी उत्तर प्रदेश की महिला का किरदार है जो चटकीले रंग वाली सिंथेटिक साड़ियाँ पहनती है और आम सी लगती है लेकिन उसका जीवन के प्रति नज़रिया उसे अपने परिवेश से अलग बनाता है.

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