ग्रैंमी न मिलने से निराश नहीं हैं अमजद

अमजद अली ख़ान
Image caption कोलकता में पेंटिंग प्रदर्शनी में अमजद अली ख़ान

जाने-माने सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ख़ान इस साल ग्रैमी की दौड़ में पिछड़ जाने से निराश नहीं हैं. वे कहते हैं कि एआर रहमान ने ग्रैमी जीत कर पूरे देश का नाम रोशन किया है. वे कहते हैं कि मेरे लिए सबसे बड़ा अवार्ड तो संगीतप्रेमी श्रोताओं से भरा हॉल है.

एक निज़ी समारोह में शिरकत करने कोलकाता आए अमजद अली ख़ान ने ग्रैमी अवार्ड, अब तक के अपने सफ़र, भारतीय शास्त्रीय संगीत के भविष्य और भावी योजनाओं पर पीएम तिवारी के साथ बातचीत की. पेश है बातचीत के प्रमुख अंश-

नामांकन के बावजूद आपको ग्रैमी अवार्ड नहीं मिला. क्या इससे निराश हैं?

मैं ग्रैमी नहीं जीतने की वजह से कतई निराश नहीं हूं. मुझे बेहद खुशी है कि यह अवार्ड एआर रहमान जैसे एक प्रतिभावान और बेहतरीन संगीत निर्देशक को मिला है. एक भारतीय के नाते मुझे इस पर गर्व है. मेरे लिए तो संगीत प्रेमी श्रोताओं से भरा हॉल ही सबसे बड़ा अवार्ड है.

भारतीय शास्त्रीतय संगीत अपने अस्तित्व के लिए विदेश की ओर ताक रहा है. क्या भारत में ही इसके संरक्षण और इसे बढ़ावा देने के लिए कारगर क़दम नहीं उठाए जा सकते?

भारतीय शास्त्रीय संगीत कभी आम लोगों के लिए नहीं था. यह उनके लिए है जिनको अपनी परंपरा और संस्कृति से प्यार है. शास्त्रीय संगीत को चाहने वाले पूरी दुनिया में हैं. यही वजह है कि ज़्यादातर संगीतकार पूरी दुनिया में कार्यक्रम पेश करने में व्यस्त हैं. भारत में भी अक्तूबर से मार्च के बीच आयोजित कार्यक्रमों में संगीत प्रेमियों की खासी भीड़ जुटती है. बीते दिनों बंगलूर में मेरे कार्यक्रम में पूरा हॉल संगीत प्रेमियों से खचाखच भरा था.

भारतीय शास्त्रीय संगीत का भविष्य कैसा है? क्या विदेशी संगीतकारों के सहयोग से ही इसे समृद्ध किया जा सकता है?

Image caption अमजद अली ख़ान चाहते हैं कि सरोद भी वायलिन और गिटार जैसी लोकप्रियता हासिल करे.

सैकड़ों टीवी चैनलों के सांस्कृतिक हमलों के बावजूद इसका भविष्य काफी उज्ज्वल है. हमारे ज़्यादातर चैनल भारतीय नहीं लगते. यह निराशाजनक है. हर चैनल को पहनावे और संगीत के ज़रिए भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहिए. इसके उलट पाकिस्तान या जापान के चैनल पाकिस्तानी और जापानी लगते हैं. मुझे उम्मीद है कि एक दिन भारतीय चैनल भी इस बात का महत्व समझते हुए भारतीय पहचान के संरक्षण का प्रयास करेंगे. जहां तक विदेशी संगीतकारों के साथ सहयोग की बात है, यह पूरी दुनियां तक अपनी बात पहुंचाने का बेहतरीन ज़रिया है. मेरे पिता हमेशा कहते थे कि व्यक्ति को पूर्ण संगीतकार होना चाहिए. दुनियां की हर संस्कृति की अच्छाइयां देखने और उनको आत्मसात करने पर ही पूर्णता हासिल हो सकती है.

आपको कैसा संगीत पसंद है?

मैं यूरोपियन शास्त्रीय संगीत के अलावा बीथोवेन और मोज़ार्ट की सिम्फनी सुनता हूं. डेढ़ सौ संगीतकार जिस तरह एक साथ सामूहिक संगीत रचते हैं, वह अद्भुत है.

शास्त्रीय संगीत के उभरते कलाकारों के बारे में आपकी क्या राय है?

भारतीय शास्त्रीय संगीत का भविष्य उज्ज्वल है. मेरे बेटे अमन और अयन के अलावा सितार और तबला में कई बेहतरीन कलाकार उभरे हैं. दक्षिण भारत में भी कई प्रतिभाएं अपनी ख़ास पहचान बना रही हैं.

भावी योजनाएँ क्या हैं ?

इस साल काफी व्यस्तता है. जर्मनी और इंग्लैंड में कई कार्यक्रम होने हैं. मार्च में स्कॉटलैंड में स्कॉटिश चैंबर आर्केस्ट्रा के साथ रिकार्डिंग करनी है. यह अलबम इसी साल तैयार हो जाएगा.

हिंदी फिल्मों में संगीत की मौजूदा हालत के बारे में क्या सोचते हैं ?

हिंदी फिल्मों में संगीत का स्तर लगातार निख़र रहा है. मैंने गुलज़ार के गीतों के लिए धुनें तैयार की थीं. इसके अलावा गुफ्तगू नामक एक धारावाहिक के लिए भी संगीत तैयार किया था. बढ़िया फिल्में या एलबम मिलने पर उनके लिए भी संगीत तैयार कर सकता हूं.

सरोद का भविष्य कैसा है ?

मैं चाहता हूं कि सरोद को भी वायलिन और गिटार जैसी लोकप्रियता हासिल हो. मैं लोकप्रिय होने के लिए सरोद नहीं बजाता. मेरे लिए मेरा काम पूर्ण समर्पण, निष्ठा और लगन है, नंबर वन पर बने रहने की होड़ नहीं.

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