बेजान है फूंक-2 और पाठशाला

  • 17 अप्रैल 2010

वर्ष 2000 में आशुतोष गोवारीकर ने ‘लगान’, फ़रहान अख़्तर ने ‘दिल चाहता है’ और मधुर भंडारकर ने ‘चाँदनी बार’ देकर हम लोगों में एक उम्मीद जगाई थी. ऐसा लगा कि उभरते हुए लेखक और निर्देशक अपनी नई सोच और हुनर से जैसे हिंदी सिनेमा को एक नए मोड़ पर ले जाएँगे.

कुछ वर्षों के लिए ये सच भी रहा, लेकिन धीरे-धीरे हमारी फ़िल्में तक़नीकी रूप से बेहतर होती गई और कहानी पीछे रह गई. खासतौर पर वर्ष 2010 हिंदी सिनेमा के असफल और बुरी फ़िल्मों के लिए याद किया जाएगा.

मेरा मानना है कि इसके लिए कॉरपोरेट ज़िम्मेवार है. आज कॉरपोरेट ने न सिर्फ़ हमारे मनोरंजन बाज़ार पर कब्ज़ा किया हुआ है बल्कि उनके मार्केटिंग डिपार्टमेंट फ़िल्मों में क्रिएटिव यानि रचनानात्मक निर्णय भी लेते हैं, जिसका अंजाम है आज के दौर की बेजान फ़िल्में.

इस हफ़्ते दो और बेजान फ़िल्मों का जन्म हुआ. पहली फ़िल्म इरोज़ इंटरनेशनल की ‘पाठशाला’ और दूसरी राम गोपाल वर्मा की ‘फूंक-2’.

पाठशाला

‘पाठशाला’ एक पुराने स्कूल सरस्वती विद्या मंदिर की कहानी है, जहां बदलाव की ज़रूरत है. स्कूल का मैनेजमेंट एक प्रकार का बदलाव चाहता है जबकि शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक दूसरी तरह का बदलाव चाहते हैं. कहानी उसूलों की है मगर दुःख की बात ये है कि हमें इसमें से कोई प्रेरणा नहीं मिलती.

फ़िल्म का कोई भी किरदार- प्रिंसिपल-नाना पाटेकर, शिक्षक-शाहिद कपूर या आयशा टाकिया या फिर कोई भी बच्चा हमारे मन को नहीं छूता. हां कुछ लम्हे हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं मगर इस विषय पर हमने इसके पहले बेहतर फ़िल्में देखी हैं. जैसे सिडनी पोयटर की ‘टू सर विद लव’ या हमारे अपने विनोद खन्ना की ‘इम्तहान’ या प्रकाश झा की ‘हिप हिप हुर्रे’ जिन्होंने शिक्षक और विद्यार्थी के रिश्तों को नए मायने दिए थे. ‘पाठशाला’ में न रस है न राग.

हमें याद आती है 60 के दशक की ‘ब्रह्मचारी’ जहां शम्मी कपूर अपने उदास बच्चों को गाना गा के बहलाते हैं और साथ में दर्शकों को भी रुलाते हैं. पाठशाला में ऐसा कुछ नहीं होता बल्कि जब घर जाने की घंटी बजती है तो जान में जान आती है.

मैं पाठशाला को सिर्फ एक स्टार दूंगी.

फूंक-2

राम गोपाल वर्मा का हॉरर फ़िल्मों से एक खास रिश्ता रहा है. वर्ष 1980 में उन्होंने दक्षिण की सुपरस्टार रेवती को लेकर अपनी पहली हॉरर फ़िल्म बनाई थी जो बोनी कपूर ने प्रोड्यूस की थी. वो फ़िल्म थी ‘रात’.

तब से आज तक उनके प्रोड्क्शन हॉउस ने 20 वर्षों में कुछ तेलगू और सात हिंदी फ़िल्में बनाई है जिसमें ‘कौन’ ‘वास्तुशात्र’ ‘भूत’ ‘डरना मना है’ ‘डरना ज़रूरी है’ ‘फूंक-1’ और ‘फूंक-2’ शामिल है.

फ़िल्म के पोस्टरों पर लिखा है, ‘अकेले मत जाना’. मैं कहूंगी ‘दोस्तों के बैगर मत जाना’ तभी तो मनोरंजन का पूरी तरह से आनंद मिलेगा.

कहानी एक परिवार की है जो एक वीरान घर में रहने जाता है जहां उनके पीछे लगती है एक डरावनी आत्मा. ये आत्मा कभी खिड़कियों से गुज़रती है और कभी शरीर में प्रवेश करती है. एक खाली झूला हवा से बार-बार झूलता है और लकड़ी का दरवाजा अपने आप बंद हो जाते हैं.

क्लाइमेक्स में अजीब-अजीब आवाज़ें आती है, सब लोग बगीचे से छत्त और घर से जंगल की ओर भागते हैं रहते हैं. एक ही घर में रहते हुए परिवार के सदस्य एक दूसरे से मिल नहीं पाते. अजीब बात ये है कि सब के पास फ़ोन होते हुए कोई कीसी को फ़ोन नहीं करता और सात खून के बावजूद पुलिस को परिवार या उनके रिश्तेदारों पर शक़ नहीं होता.

फ़िल्म में डर कम और साउंड इफेक्ट ज़्यादा है. फ़िल्म देख सकते हैं मगर हॉरर फ़िल्म के रोमांच के ख्याल से नहीं बल्कि मनोरंजन के लिए.

मैं फूंक-2 को सिर्फ एक स्टार दूंगी.

(लेखिका जानी-मानी फ़िल्म समीक्षक हैं और फ़िल्मों पर कई किताबें भी लिख चुकी हैं)

संबंधित समाचार

संबंधित इंटरनेट लिंक

बीबीसी बाहरी इंटरनेट साइट की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है