अच्छी हैं अपार्टमेंट की नीतू

नीतू चंद्रा
Image caption अपार्टमेंट में नीतू चंद्रा का अभिनय अच्छा है

पिछले कुछ हफ़्तों से आईपीएल के कारण सिर्फ़ छोटी फ़िल्में रिलीज़ हो रही हैं.

अब जबकि आईपीएल ख़त्म होने वाला है, सभी बड़े बैनर अपनी फ़िल्मों को लेकर तैयार हैं. इन बड़े बैनर की फ़िल्मों पर क़रीब 350 करोड़ रुपए लगे हुए हैं.

इस शुक्रवार छोटी नॉन स्टारर फ़िल्मों का आख़िरी कारवाँ निकला है और अजीब बात ये है कि सारी फ़िल्में मुंबई शहर के बारे में हैं.

इस सप्ताह की सबसे बुरी फ़िल्म मुस्कुरा के देख ज़रा है, जिसमें मुस्कुराने जैसी कोई बात नहीं है, बल्कि आप थियेटर से बोरियत से रोते हुए निकलेंगे.

कुछ करिए

Image caption अभिनेता के रूप में सुखविंदर नहीं चल पाए

कुछ करिए गायक सुखविंदर सिंह की पहली फ़िल्म है. सुखविंदर उन तमाम प्लेबैक सिंगर्स में हैं, जिन्होंने अभिनेता बनने की कोशिश की और नाकाम रहे.

जैसे- शैलेंद्र सिंह, सोनू निगम या हिमेश रेशमिया.

आज तक सिर्फ़ एक ही गायक/संगीतकार अभिनेता के रूप में कामयाब रहे हैं और वो हैं हमारे सदाबहार किशोर कुमार.

सपनों के देश में एक विद्यार्थी की कहानी है और पिछले सप्ताह रिलीज़ हुई शाहिद कपूर की पाठशाला से थोड़ी बेहतर है. बस.

सिटी ऑफ़ गोल्ड

सिटी ऑफ़ गोल्ड कुछ दिनों पहले लालबाग परेल के नाम से मराठी में रिलीज़ हुई थी. और मेरी समझ में नहीं आता कि ये फ़िल्म दो भाषाओं में क्यों रिलीज़ हुई.

क्योंकि सिवाय हिंदी डायलॉग के ये फ़िल्म पूरी तरह से अब भी मराठी ही लगती है.

निर्देशक महेश मांजरेकर जो सामाजिक (अस्तित्व) और पारिवारिक (विरुद्ध) फ़िल्मों के लिए जाने जाते हैं.

इस बार वे हमें मिल वर्कर्स के दिल और दुनिया में ले जाते हैं. जहाँ हड़ताल के बाद उनकी ज़िंदगी नरक बन जाती है.

कहानी निराली है और फ़िल्म में संदेश भी है. लेकिन 1982 में लालबाग में क्या हुआ था, उसमें सिर्फ़ मुंबई और मुंबईवालों को दिलचस्पी हो सकती है, मुंबई के बाहरवालों को नहीं.

अपार्टमेंट

अपार्टमेंट एक और हॉलीवुड से चुराई हुई देशी कपड़ों में लिपटी बॉलीवुड थ्रिलर है. इसमें हिंदुस्तानी मसाला यानी थोड़ा सेक्स, थोड़े गाने और थोड़ा ड्रामा मिलाया गया है.

जब हम अपने घर में कोई किरायेदार रखते हैं तो क्या हम उनके बारे में पूरी तरह से छानबीन करते हैं?

क्या ये किरायेदार हमे किसी मुश्किल में डाल सकते हैं या ये हमारी ज़िंदगी भर के साथी बन सकते हैं? ऐसे ही कुछ सवालों का जवाब देती है अपार्टमेंट.

कुछ फ़िल्में बनती हैं निर्माता के मिज़ाज की और कुछ निर्देशकों के मिज़ाज की. अपार्टमेंट निर्माता नरी हीरा के मिज़ाज की ज़्यादा और जगमोहन मुंदड़ा के मिज़ाज की कम लगती है.

जगमोहन मुंदड़ा ने इसके पहले बहुत सारी बेहतरीन फ़िल्में बनाई हैं, जैसे- कमला, बवंडर और प्रोवोक्ड.

इन सबके मुक़ाबले में अपार्टमेंट कहानी और तकनीक में फींकी लगती है. स्कित्ज़ोफ़ेनिया बीमारी के लक्षण पर ज़्यादा रिसर्च नहीं किया गया है.

इसके बावजूद नीतू चंद्रा का अभिनय अच्छा है. ट्रैफ़िक सिगनल, ओए लकी और रण के बाद नीतू ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वो एक भरोसेमंद कलाकार हैं.

बर्ड आइडल

बर्ड आइडल एक एनिमेशन फ़िल्म है. पुराने ज़माने में हमें ज़्यादा एनिमेशन फ़िल्में नहीं देखने को मिलती थी, लेकिन अब समय बदल गया है.

Image caption बर्ड आइडल में अच्छा एनिमेशन है

पिछले महीने गणेश और मारुति के एनिमेशन के बाद इस फ़िल्म में हम पंछियों की दुनिया में जाते हैं.

अगर पंछी इंसान होते तो कैसे होते....? क्या वो वही सोचते और महसूस करते, जो हम सोचते हैं और महसूस करते हैं..?

बर्ड आइडल एक ऐसे ही पंछी के परिवार की कहानी है. हम्मी नाम का एक पंछी मुंबई शहर में रहता है और एक रियलिटी शो में शामिल होता है.

वो आगे चलकर रॉक स्टार बनता है और आश्चर्य की बात ये है कि वो पंछियों की नहीं, बल्कि इंसानों की भाषा में गाता है.

कहानी सुनी-सुनाई है और बहुत बार हिंदी फ़िल्मों में हमने देखी है. लेकिन बात सिर्फ़ कहानी की नहीं है, बात किरदारों की है, अहसानों की है और सबसे अहम नज़रिए की है.

निर्देशक ज्योतिन गोयल हमें अपने ख़्यालों की दुनिया में ले चलते हैं, जहाँ पंछियों को हम कभी शान....कभी कैलाश खेर....और कभी जूही चावला...की आवाज़ में मिलते और सुनते हैं.

फ़िल्म का एनिमेशन काबिले तारीफ़ है और प्रशांत नारायण की आवाज़ लाजवाब है.

बर्ड आइडल में रंगीले और रसीले संगीत से भरपूर दृश्य हैं, जो थोड़ी देर के लिए गर्मी का मौसम बदल देते हैं.

(लेखिका जानी-मानी फ़िल्म समीक्षक हैं और फ़िल्मों पर कई किताबें भी लिख चुकी हैं)

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