केवल उगते सूरज को सलाम

दादा साहेब फाल्के ने भारत की पहली कथा फ़िल्म बनाकर एक ऐसे उद्योग की आधारशिला रखी जो बाद में बहुत फलने फूलने वाला था. भारत में फ़िल्म संस्कृति का विकास उनका मूल उद्देश्य बन चुका था. वे चाहते थे कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग लोग इस व्यवसाय से जुड़े.

उनके सिनेमा पर राजा रवि वर्मा के चित्रों का गहरा प्रभाव रहा.धार्मिक फ़िल्मों के लिए विशेष प्रभाव वाले दृश्य शूट करने में उन्हें महारत हासिल थी.

बिना साधनों के उन्होंने हनुमान के उड़ने के दृश्य विश्वसनीय बनाए. दादा फाल्के ने कहा कि पर्दे पर दिखने वाले हैरतअंगेज़ दृश्य दरअसल प्रकाश और छाया के खेल से उत्पन्न होते हैं और यही फिल्म माध्यम का जादू है.

यह एक अलग बात है कि 1900 में उन्होंने एक जर्मन जादूगर से कई ट्रिक सीखे थे. प्रोफ़ेसर केल्फा फाल्के के नाम से जादू के व्यवसायिक प्रदर्शन भी किए थे.

जल गई सारी फ़िल्में

सिनेमा में ध्वनि के आने पर दादा फ़ाल्के ने अपनी फिल्म ‘सेतुबंधन’ को सिंक्रोनाइजिंग पद्धति से आवाज़ दी. कोल्हापुर सिनेटोन के लिए बनाई ‘गंगावतरण’ छह अगस्त 1937 को उनकी अंतिम फिल्म थी.

ध्वनि के साथ ही तीस चालीस गानों वाली फिल्में बनने लगीं और दादा फाल्के इसके सख्त खिलाफ़ थे.

फ़िल्म उद्योग में आए नए लोगों के तौर तरीके उन्हें पसंद नहीं थे. आर्थिक मजबूरी के कारण उन्होंने अपने लगभग सौ मैडल बेच दिए और अपनी आंखों से अपनी कुछ फिल्मों को आग दुर्घटना में जलते हुए देखा. ( राजा हरिश्चचंद्र एक मात्र फ़िल्म थी जो ज्वलनशील नहीं थी. उन दिनों कच्ची फिल्म में ज्वलनशील नाइट्रेट बहुत मात्रा में होता था)

गिरती हुई सेहत और टूटते सपनों के बीच उनकी दशा वेदव्यास सी थी जो युद्ध के पश्चात कुरूक्षेत्र में भारी विध्वंस देखता है.

1939 में फिल्म उद्योग की रजत जयंती के अवसर पर दादा फाल्के के लिए पचास हज़ार की रकम जुटाने का प्रयास असफल रहा.

शांताराम और गौहरबाई के सात हज़ार रूपयों में नासिक में दादा के लिए हिन्दू सिने जनकाश्रम नामक मकान बनाया गया था.

अंतिम दिनों में इतने महान सृजक का स्मृति पटल मिट गया, मानो स्वाइप शॉट लिया गया हो. इन सब मुश्किलों के बीच उन्हें कभी- कभी राजा हरिश्चंद्र के निर्माण के समय का कठोर संघर्ष याद आ जाता था.16 फरवरी 1944 को सुबह पांच बजे धुंडिराज गोविंद फाल्के ने प्राण त्याग दिए.

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