सिनेमा के पारखी

Image caption सिनेमा एक नशा है जिसके पीछे हर भाषा, हर संस्कृति, हर देश में दीवानगी है.

आप भारत के किसी गली-नुक्कड़,चौपाल चौराहे,मेट्रो या मॉल में चले जाएँ..चाय की चुस्कियों या पेप्सी-कोक के बीच राजनीति,सिनेमा और क्रिकेट पर गर्मा-गर्म चर्चा करते लोग आपको ज़रूर मिल जाएँगे.

सिनेमा एक ऐसा नशा है जिसका शायद ही कोई तोड़ है. और ये सिर्फ़ भारत तक ही सीमित नहीं है, हर भाषा, संस्कृति, हर देश में लोग इसके दीवाने हैं. ये एहसास मुझे भारत में ही नहीं विदेशों में भी हुआ.

कुछ साल पहले का किस्सा है. ब्रिटेन के ली़ड्स शहर में अमिताभ बच्चन और धमेंद्र का इंटरव्यू करना था. इंटरव्यू करते-करते काफ़ी देर हो गई.

काम ख़त्म होने के बाद जैसे-तैसे एक टैक्सी पकड़ी ताकि लंदन वापस जाने के लिए ट्रेन न छूट जाए. बातों-बातों में ट्रैक्सी ड्राइवर को जैसे ही पता चला कि मैं अमिताभ-धर्मेंद्र जी से मिलकर आ रही हूँ, बस वो मानो सातवें आसमान पर पहँच गया.

अफ़ग़ानिस्तान के रहने वाले उस चालक ने मुझसे पैसे लेने से इनकार कर दिया...मैने लाख समझाया लेकिन वो तो बस इसी बात से अभिभूत था वो एक ऐसे भारतीय पत्रकार को टैक्सी में बिठाकर लाया था जो अमिताभ से मिली हैं.

मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि ऐसी दीवानगी भी होती है.फ़िल्मी सितारों के लिए दीवानगी के कितने ही किस्से हमने आपने सुने भी होंगे.

ये सवाल कई बार मन में आता है कि आख़िर क्या कशिश है सिनेमा में जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती आई है. क्या भारत का सिनेमा विश्व सिनेमा के समकक्ष खड़े होने की क्षमता रखता है.....या फिर ये तुलना करना ही अनुचित है?

ऐसे ही सवालों का जवाब जानने के लिए बीबीसी इस हफ़्ते एक विशेष श्रृंखला चलाएगी. इस हफ़्ते बीबीसी पर आप सिनेमा से जुड़ी कुछ हस्तियों के अनुभव पढ़ पाएँगे- सिनेमा के बारे में उनकी सोच, उम्मीदें और आलोचनाएँ. ये अनुभव बीबीसी से हुई बातचीत पर आधारित हैं.

तो सोमवार से लेकर शनिवार तक पढ़िए श्रृंखला सिनेमा के पारखी...और अपने विचार भी लिख भेजिए.

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