स्टार कल्चर ने छीनी हमारी जगह: समीर

  • 9 मई 2010
Image caption समीर आशिक़ी, हम हैं राही प्यार के और दीवाना के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीत चुके हैं.

गीत-संगीत हिंदुस्तानी फ़िल्मों का ही नहीं बल्कि हिंदुस्तानी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है.इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि भारतीय फ़िल्मों में गीतकार की बहुत अहम जगह है.

फ़िल्म बनाना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं..ये टीम वर्क है जिसमें बहुत सारे लोग पर्दे के पीछे रहकर सहयोग करते हैं.

लेकिन दुख की बात है कि गीतकार को वो रुतबा नहीं मिल पाया है जो उसे मिलना चाहिए. आजकल ऐसा लगता है कि पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री स्टारडम पर आकर ठहर गई है, उसी के इर्द-गिर्द घूमती है.

(समीर तीन बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीत चुके हैं.ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से हुई बातचीत पर आधारित है. सिनेमा पर चली श्रृंखला की रविवार को अंतिम कड़ी है. इस हफ़्ते आपने बीबीसी पर सिनेमा से जुडी चुनिंदा हस्तियों के अनुभव पढ़े. बाकी के लेख पढ़ने के लिए अंत में दिए लिंक पर क्लिक करें)

पहले ऐसा कभी नहीं था. इस सब के कारण हुआ ये है कि फ़िल्मों से जुड़े तमाम तकनीकी लोगों, गीतकारों, संगीतकारों और यहाँ तक कि निर्देशकों को भी समाज में वो जगह नहीं मिल पाती जिसके वो हक़दार हैं. फ़िल्म स्टारों ने पूरी तरह से उस जगह पर कब्ज़ा किया हुआ है.

जबकि उन्हें भी ये पता है कि हम लोगों के बग़ैर वे कुछ भी नहीं. शायद उन्हें थोड़ा वक़्त लगेगा ये समझने में....

गीतकार और संगीतकार जैसे पति और पत्नी

Image caption समीर ने कई हिट फ़िल्मों के लिए गीत लिखे हैं

गीत-संगीत की बात करें तो अच्छे बोलों को अगर अच्छा संगीत मिल जाए तो क्या कहने. कल्याणजी आनंदजी कहा करते थे कि गीतकार-संगीतकार का रिश्ता पति-पत्नी की तरह होता है. किसी ने मज़ाक में उनसे पूछा कि ये तो बता दीजिए कि पति कौन और पत्नि कौन है.

इस पर कल्याणजी आनंद बोले थे कि गीतकार पति है क्योंकि वो तो गाना लिखकर चला जाता है लेकिन उसे सजाने,संवारने, संगीत देने, गायक से गवाने का सारा काम संगीतकार करता है, इसलिए वो पत्नी है. कहने का मतलब ये कि बहुत करीबी रिश्ता होता है. जब तक ये नज़दीकियाँ नहीं बनतीं, क्रिएटिवीटी बाहर नहीं आती.

शायद इसीलिए कुछ संगीतकारों के एक साथ अलग तरह की जुगलबंदी हो जाती है तो कुछ सितारों के साथ गहरा नाता बन जाता है.

ऐसे ही मेरे पिता और गीतकार अंजान जी का नाम बच्चन साहब से जुड़ गया था. उनका गाना खाइके पान बनारस वाला आज भी लोग याद करते हैं.पिता जी बनारस के रहने वाले थे. गीत के बोलों में बनारस की खुशबू थी.

फिर बच्चन साहब भी उसी मिट्टी के थे. मैं आज भी हैरान होता हूँ कि किस ढंग से किशोर कुमार जी ने ये गाना गाया था जबकि उनका बनारस से कोई लेना देना नहीं था.

ख़ैर बात गीतकारों की हो रही है. गीतकार पर्दे के पीछे काम करता है,इसलिए उनकी मेहनत और जद्दोजेहद लोगों के सामने नहीं आती. मैं कई बार रियालिटी शो वालों से कह चुका हूँ जैसे गायकों या डांसरों को लेकर रियालिटी शो होता है वैसा ही कोई शो गीतकारों को लेकर बनाएँ.

मैं इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखता है कि आजकल गीतों का स्तर गिर चुका है. जिस तरह के गीत आज के बच्चों को पसंद है, जितनी शायरी लोग सुनता चाहते हैं उतना इन्हें मिल रहा है.ये बात मैं मानता हूँ कि ये गीत पहले से अलग है, इनकी दिशा अलग है.

केवल दो शब्दों को जोड़ देने से गीत नहीं बन जाता. हमारी फ़िल्मों के गीत केवल गीत नहीं है ये जीवन दर्शन हैं.जो गीतों की इस दुनिया का हिस्सा बनना चाहते हैं वो ये न समझें कि डगर आसान हैं. पहले इस विधा को समझें, महसूस करें और फिर इस दुनिया में आएँ और छा जाएँ.

पहली कड़ी- शेखर कपूर

दूसरी कड़ी-विद्या बालन

तीसरी कड़ी-अतुल कुलकर्णी

चौथी कड़ी-गुरिंदर चढ्डा

पाँचवी कड़ी-शम्मी कपूर

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