सात ब्रेक-अप्स से सात फेरों तक

अनुराग बासु
Image caption अनुराग बासु द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'काइट्स' इस सप्ताह रीलीज़ हुई है.

निर्देशक अनुराग बासु का अपनी प्रेमिका के साथ सात बार प्यार और सात बार ब्रेक अप हुआ जिसके बाद ये रिश्ता सात फेरों यानि शादी में बदला. अनुराग का पसंदीदा साहित्यिक किरदार शरतचंद्र का देवदास है.

शायद इसलिए इंसानी रिश्तों का ताना-बाना उनकी फ़िल्मों के केंद्र में होता है. अनुराग ये भी मानते हैं कि निजी ज़िंदगी का असर भी फ़िल्मों पर पड़ता है.

अनुराग कहते हैं, “तानी के साथ मेरा प्रेम विवाह है. लेकिन इससे पहले हमारा रिश्ता सात बार बना और टूटा. हर बार ब्रेक-अप होने पर हमारा किसी और के साथ रिश्ता बना और हम फिर वापिस एक-दूसरे के पास आए और फिर हमारी शादी हुई.”

अनुराग बासु निर्देशित फ़िल्म 'काइट्स' इस सप्ताह रीलीज़ हुई है. बीबीसी ने हाल ही में उनसे एक ख़ास बातचीत की.

अनुराग ने 'मर्डर', 'गैंगस्टर' और 'लाइफ़ इन ए मेट्रो' जैसी फ़िल्मों का निर्दशन किया है और इनमें से कुछ की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है.

अनुराग कहते हैं, “मैं कहानी को हीरो की नज़र से नहीं देखता, बल्कि हमेशा लड़की के दिल में झांक कर कहानी ढूंढता हूं. तो अपने-आप फ़िल्म में भावनाएं आ जाती हैं. मुझे लगता है लड़के थोड़े रुखे होते हैं और अगर आप उनके नज़रिए से कहानी देखें तो कहानी भी रुखी हो जाती है.”

टीवी से शुरुआत

अनुराग ने अपने करियर की शुरुआत टेलिविज़न से की. उन्होंने सबसे पहले ‘तारा’ का निर्देशन किया जो 90 के दशक में बहुत लोकप्रिय हुआ. अनुराग कहते हैं, “ग्रैजुएशन के बाद मुझे सिर्फ़ छह-सात महीने ही संघर्ष करना पड़ा. मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे इतनी जल्दी मौक़ा मिल गया.”

अपने फ़िल्मी करियर के लिए अनुराग टेलिविज़न को श्रेय देते हैं. वो कहते हैं, “टेलिविज़न की वजह से ही मुझे फ़िल्में मिली. मैंने हमेशा टीवी को बहुत संजीदगी से लिया है. मुझे हमेशा लगता था कि कोई न कोई टीवी पर मेरा काम देख कर फ़िल्म ज़रुर देगा. टेलिविज़न हमेशा से मेरा प्यार रहा है और आज भी है. मैं आज भी टेलिविज़न कर रहा हूं.”

अनुराग कहते हैं, “मेरा टेलिविज़न सीरियल ‘अजीब दास्तान’ बहुत लोकप्रिय नहीं था लेकिन मेरा पसंदीदा था. महेश भट्ट इस सीरियल के दीवाने थे और हमेशा कहते थे तुम्हें फ़िल्में करनी चाहिए.”

महेश भट्ट ने ही अनुराग बासु को पहला मौक़ा दिया.

पिछले कुछ सालों में भारतीय फ़िल्में कान जैसे कई अंतर्राष्ट्रीय महोत्सवों में दिखाई जा रही हैं. इस बारे में अनुराग कहते हैं, “आज सभी भारतीय फ़िल्म-मेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान चाहते हैं. फ़िलहाल हमारी फ़िल्में सिर्फ़ एनआरआई ही देखते हैं. हम उसी वक़्त ग्लोबल बनेंगे जब अहिंदी भाषी हमारी फ़िल्में देखने आएंगें.”

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