ज़रूर कीजिए ब्रिक लेन की सैर

फ़िल्म ब्रिक लेन उन हज़ारों एशियाई आप्रवासियों की कहानी है जो अपना शहर और देश छोड़कर परदेस में अपनी किस्मत आज़माते हैं.

इसी नाम की किताब पर आधारित ये एक बांग्लादेशी दंपत्ति की कहानी है जो 16 साल पहले ईस्ट लंदन की ब्रिक लेन में आकर बस जाते हैं.

इतने सालों बाद भी वे अपने घर और गाँव जाने का ख़्वाब देखते हैं. कहा जा सकता है कि निर्देशक साराह गोवरॉन ने सैंकड़ों एक्टरों के ऑडिशन के बाद सतिश कौशिक और तनिष्ठा चटर्जी को मुख्य किरदारों के लिए इसलिए चुना ताकि फ़िल्म की कहानी के हिसाब से दोनों के बोलने की शैली बिल्कुल सही बैठे.

कनाडा, अमरीका और यूरोप में ये फ़िल्म 2007 में रिलीज़ हुई थी और वहाँ के फ़िल्म आलोचकों ने इसे काफ़ी सराहा था.

अब करीब तीन साल बाद ये फ़िल्म भारत में लोग देख पाएँगे और वो भी सिर्फ़ कुछ बड़े शहरों के गिने चुने सिनेमाघरों में.

बेहतरीन अभिनय

सतिश कौशिक बहुत ही सधे हुए अभिनेता हैं और उन्होंने अपने करियर में सब तरह के किरदार निभाए हैं. इन सब में से ब्रिक लेन में उनका किरदार सर्वश्रेष्ठ है जो उनके नाटक सेल्समैन रामलाल की याद दिलाता है.

छोटी उम्र की बीवी के किरदार में तनिष्ठा चटर्जी दिप्ती नवल की याद दिलाती हैं. स्मिता पाटिल के बाद सबसे फ़ोटोजनिक हिंदुस्तानी चेहरा हैं तनिष्ठा.

कम बजट में बनाई गई ब्रिक लेन एक बहुत ही बुलंद और आकर्षक फ़िल्म बनी है जो बहुत सारे नैतिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक मुद्दे उठाती है.

फ़िल्म के दृश्य बहुत सुंदर हैं. कोई विशेष जगह, सेट, लिबास न होते हुए भी कैसे कोई निर्देशक अपनी कल्पना से साधारण बातों को असाधारण बनाता है ये फ़िल्म उसकी मिसाल है.

ऐसा लगता है कि निर्देशक का प्रकृति के साथ एक ख़ास रिश्ता है और ये बाहर फ़िल्माए गए पेड़ पौधों, फूलों और बारिश के दृश्यों में नज़र आता है.

जो कोई अपने देश की परवाह करता है, समाज के लिए सोचता है, अच्छे सिनेमा के बारे में सोचता है उसके लिए ये फ़िल्म देखना ज़रूरी है.

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