'इसे राजनीति से अलग रखें'

  • 5 जून 2010
आईफ़ा

श्रीलंका में आइफ़ा समारोह के आयोजन को लेकर दक्षिण भारतीय फ़िल्म उद्योग ने कई सवाल उठाए हैं.

नौबत तो यहाँ तक आ गई है कि जो भी अभिनेता या फिर फ़िल्मकार इस आइफ़ा समारोह का हिस्सा बनता है, उसकी फ़िल्में दक्षिण भारत में नहीं दिखाई जाएंगी. आसार हैं कि हृतिक रोशन की फ़िल्म 'काइट्स' इस विवाद का पहला निशाना बने.

श्रीलंका में चल रहे है इस आइफ़ा समारोह से हिंदी और दक्षिण भारतीय फ़िल्म जगत के कई बड़े नाम नदारद हैं.

भले ही किसी भी हस्ती ने ये बात नहीं मानी हो लेकिन ये कहा जा रहा है कि भारत में चले रहे विवाद इसकी एक बड़ी वजह हैं.

इस सब के बावजूद तीन दिन के इस आइफ़ा समारोह में बॉलीवुड के कई सितारों ने भाग लिया और ज़्यादातर हस्तियों का मानना है कि श्रीलंका में आइफ़ा का आयोजन करना कुछ ग़लत नहीं है.

दरअसल तमिल फ़िल्म उद्योग का कहना है कि श्रीलंका में तमिलों पर जिस तरह से अत्याचार हुए हैं उसे देखते हुए श्रीलंका में आईफ़ा का आयोजन ही ग़लत है.

उम्मीद

अभिनेता बोमन ईरानी जो आइफ़ा अवार्ड्स को होस्ट कर रहे हैं उनका कहना है कि कोई भी मुद्दा स्थायी नहीं होता है और उम्मीद है कि स्थिति बेहतर हो जाएगी.

उन्होंने कहा "हम लोगों के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं कर सकते कि वो हमें और हमारे मक़सद को समझें और अगर उन्हें लगता है कि ये सही है तो उन्हें अपनी बात रखने का पूरा हक़ है."

शर्मन जोशी का मानना है कि श्रीलंका में जो कुछ भी हुआ वो कभी नहीं भुलाया जा सकता है लेकिन ये बहुत ज़रूरी है कि रिश्तों को फिर से बेहतर किया जाए.

शर्मन का कहना था, "इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करते हैं और जहां तक हो सके राजनीति को इस सब से अलग रखना चाहिए."

वहीं अभिनेत्री बिपाशा बासु कहती हैं कि आइफ़ा समारोह में उनकी उपस्थिति ही ये दर्शाती है कि इन सब विवादों का उन पर कोई असर नहीं पड़ा है.

इस मंच पर अपनी फ़िल्म 'लम्हा' का प्रचार करने पहुंचे संजय दत्त का मानना है कि आइफ़ा के ज़रिये शांति और अमन का पैग़ाम दिया जा रहा है.

उन्होंने कहा, "बॉलीवुड के हम सभी सितारे अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों से होते हुए भी एक परिवार जैसे हैं. हमारा मकसद सिर्फ़ लोगों का मनोरंजन करना है. हम किसी भी धर्म या जाति के लोगों के लिए फ़िल्में नहीं बनाते और यहां भी हम शांति का पैगाम देने आए हैं."

साउंड डिज़ाइनर रसूल पोकुट्टी का कहना है, "फ़िल्मों के ज़रिये हम मानवीय संबंधों को दर्शाते हैं और हमारा मक़सद दूरियों को कम करना है और ऐसे में दूरियां बढ़ाना सही नहीं है."

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