माओवादी आंदोलन पर एक गंभीर फ़िल्म

रेड अलर्ट में भाग्यश्री
Image caption फिल्म को रियल लोकेशन पर शूट किया गया है

इस हफ़्ते दो फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं- बोनी कपूर निर्मित, सतीश कौशिक निर्देशित 'मिलेंगे मिलेंगे' और टीपी अग्रवाल निर्मित, अनंत महादेवन निर्देशित रेड अलर्ट.

रेल अलर्ट नक्सलवाद के मुद्दे को उठाती है- क्या वो आतंकवादी हैं या क्रांतिकारी हैं?

एक नामचीन निर्देशिका और फ़िल्म रिहाई के लिए चर्चित अरुणा राजे ने इस फ़िल्म को लिखा है. पटकथा बहुत परतदार है और छोटी छोटी बातें जैसे, भाषा, चरित्रांकन पर ध्यान दिया गया है.

माओवादी आंदोलन पर शायद यह पहली गंभीर फ़िल्म है जो हमारे आज के हालात और अत्याचार पर आवाज़ उठाती है. फिल्म को रियल लोकेशन पर शूट किया गया है और बहुत सारे दृश्यों में ग्रामीणों को शामिल भी किया गया है.

फ़िल्म का संगीत (ललित पंडित) और गाने (जावेद अख़्तर) बिलकुल सुर और ताल में हैं. एक्शन बढ़िया है और कलाकारों के अभिनय- सीमा बिसवास, आयशा डारकर, समीरा रेड्डी, आशीष विद्यार्थी- भूमिका के हिसाब से हैं. नक्सलवादी नेता विनोद खन्ना मध्यांतर के बाद आते हैं लेकिन अपनी आभा से प्रभावित करते हैं. नसीरुद्दीन शाह सिर्फ़ एक दृश्य में आते हैं लेकिन दिल ख़ुश कर जाते हैं.

ये फ़िल्म बहुत सारे समारोह में जा चुकी है और कई पुरस्कार जीत चुकी है. इसमें कोई शक नहीं कि रेड अलर्ट निर्देशक अनंत महादेवन की अब तक की सारी फ़िल्मों में सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म है.

यदि आप मनोरंजन की तलाश में हैं तो ये फ़िल्म आपके लिए नहीं है, आप कोई और दरवाज़ा खटखटाएँ. लेकिन यदि आप कुछ सोचना चाहते हैं, कुछ समझना चाहते हैं और सुनील शेट्टी/ नरसिम्हा की मेहनत को सराहना चाहते हैं तो आप रेड अलर्ट को 'लाल सलाम' कर सकते हैं.

मैं इस फ़िल्म को तीन स्टार देती हूँ.

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Image caption फ़िल्म में रस है शाहिद और करीना की जोड़ी की वजह से

जब बोनी कपूर ने मिलेंगे मिलेंगे शुरू की थी तब शाहिद कपूर और करीना कपूर एक साथ काम करने वाले प्रोफ़ेशनल थे.

फ़िल्म की शूटिंग के दौरान दोनों दोस्त बने, फिर प्रेमी और रिश्ता टूटने के बाद दोनों अलग हो गए.

मिलेंगे मिलेंगे देर से रिलीज होने की बहुत सारी वजह है. कुछ शाहिद और करीना के आपसी बदलते रिश्ते, कुछ निर्माता की अपनी मजबूरी और कुछ बदलते हुए हालात.

अब जब कि फ़िल्म रिलीज़ हो रही है सभी को पता है कि शाहिद-करीना साथ नहीं हैं और फिर भी सब को उनकी प्रेम कहानी में दिलचस्पी है. मतलब अप्रत्यक्ष रूप से सबको मिलेंग मिलेंगे में दिलचस्पी है.

इस कहानी में प्रिया मल्होत्रा यानि करीना कपूर किस्मत को नहीं मानती बल्कि अपनी किस्मत को आज़माती हैं. कहानी में ट्विस्ट यह है कि किस्मत प्रिया को कैसे आज़माती है और हमेशा के लिए बदल देती है.

फ़िल्म दो-तीन हॉलीवुड की फ़िल्मों पर आधारित है और कुछ हद तक भारतीय संदर्भ में असंगत है. शाहिद कपूर पर फ़िल्माया गया एक-आध गाना फ़िट नहीं बैठता. लेकिन ये छोटी-मोटी बातें मायने नहीं रखतीं क्योंकि वैसे भी प्यार में कुछ नया नहीं होता.

निर्देशक सतीश कौशिक इस बात को मानते हैं और इस पर मेहनत नहीं करते. उनका ध्यान हमें एक मज़ेदार जोड़ी को लेकर भरपूर मसालेदार फ़िल्म देना है जो वो देते हैं. फ़िल्म में रस है शाहिद और करीना की जोड़ी की वजह से..... उनकी स्टार वैल्यू की वजह से.

आम तौर पर दो साल पुरानी फ़िल्म बासी हो जाती है लेकिन मिलेंगे मिलेंगे में अब तक ख़ुशबू है. मतलब...कुछ तो बाक़ी है.

मैं मिलेंगे मिलेंगे को तीन स्टार देती हूँ.

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