फ़िल्म न खट्टी है न मीठी

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Image caption अक्षय मनोरंजन करने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन फ़िल्म में कई ख़ामियाँ हैं

सत्तर के दशक में बासु चैटर्जी ने बहुत ही हटकर और मज़ेदार फ़िल्म बनाई थी खट्टा मीठा जो खट्टी भी थी और मीठी भी.

अब इसी टाइटल को लेकर निर्देशक प्रियदर्शन एक और फ़िल्म लेकर आए हैं जो न खट्टी है, न मीठी.

फ़िल्म में समस्या ये है कि वो तय नहीं कर पाती कि वो किस तरह की या किस जॉनर की फ़िल्म है- कॉमेडी है, एक्शन है, पारिवारिक ड्रामा है, सामाजिक संदेश देने वाली फ़िल्म है या कुछ और.

अस्सी के दशक की फ़ॉर्मूला फ़िल्मों की तरह खट्टा मीठा में सब कुछ बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है- कहानी स्टीरियोटाइप में चलती है.

फ़िल्म में बहुत सारे मुद्दे हैं और बहुत सारे कलाकार हैं जैसे असरानी, जॉनी लीवर और राजपाल यादव. फ़िल्म में दृश्य इतने लंबें हैं कि न उनमें हँसी आती है और न ही किरदारों की उलझनों से हमें कोई सहानुभूति होती है.

फ़िल्म के डायलॉग दकियानूसी सोच वाले हैं- जैसे पिता कुलभूषण खरबंदा एक दृश्य में अपने बेटे अक्षय कुमार से कहते हैं कि ग्रहण में पैदा हुआ था इसलिए मनहूस है.

एक अन्य दृश्य में राजपाल यादव बाथरूम में नहाती हुई हीरोइन को झाँकता है और पकड़े जाने पर कहता है- मैं पता लगा रहा था कि वो औरत है कि नहीं. सेंसर बोर्ड कहाँ हो आप?

दक्षिण भारत की हीरोइन त्रिशा अपने किरदार में फ़िट नहीं बैठतीं. लगता है कि अपने झुमकों के अलावा उन्हें किसी चीज़ में दिलचस्पी नहीं है.

अक्षय का परिवार-कुलभूषण खरबंदा, अरूणा ईरानी, बहनें, जीजा, भाई और भाभी पूरी फ़िल्म में बेमतलब पृष्ठभूमि में काम करते रहते हैं. जबकि निर्देशक प्रियदर्शन ऐसे पारिवारिक दृश्यों को फ़िल्माने में राजा माने जाते हैं.

इस फ़िल्म में कई दृश्य सच्चे नहीं लगते और दिल को नहीं छूते. कुछ दृश्यों में तो सुविधा के लिए रसोई घर के आँगन में भी चली जाती है.

आज की 21वीं सदी में जब हम वास्तविक सिनेमा की ओर बढ़ रहे हैं और गाने भी कहानी के मुताबिक ही होते हैं तो प्रियदर्शन की फ़िल्म में सब कुछ सतही लगता है.

आधे मन से बनाई फ़िल्म

फ़िल्म में किरदार मराठी हैं मगर सिर्फ़ नाम के लिए. उनके रहन-सहन, कपड़े और बोलने- चालने में इसकी कोई भी झलक नहीं है.

फ़िल्म के आख़िर तक हम ये नहीं समझ पाते कि फ़िल्म गाँव की है या शहर की. फ़िल्म का क्लामेक्स मुंबई जैसे बड़े शहर की झुग्गियों में शूट किया गया लगता है मगर वो हमें समझाते हैं कि ये छोटा सा गाँव ही है.

ऐसी आधी-अधूरी कहानी और आधे मन से बनाई गई फ़िल्म का पूरा भार हीरो अक्षय कुमार के कंधों पर पड़ता है.

अक्षय पूरी लगन से हमारा मनोरंजन करते हैं मगर वो कितने ही बड़े सुपरस्टार क्यों ने हों पर उन्हें कॉलेज छात्र के रूप में स्वीकार करना नामुमकिन ही नहीं ज़्यादती है.

खट्टा मीठा न खट्टी है और न मीठी है बल्कि हमें मिर्ची की तरह तीखी बना देती है. फ़िल्म के क्रेडिट्स में अक्षय कुमार ने एक रैप अप नंबर किया है और इस गाने के हवाले से मैं प्रियदर्शन जी से यही कहना चाहती हूँ कि हमें ऐसी वाहियात फ़िल्मों से दूर ही रखें. हम ऐसी फ़िल्मों के प्रति एलर्जिक हैं- या तो विरासत और कांजीवरम जैसी फ़िल्में बनाइए या तो हमें माफ़ कीजिए.

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