क्या 'हम' से लौटेगा 'हम लोग' का जादू

  • 4 अगस्त 2010
Image caption क्या चलेगा 'हम' का जादू

लेखक मनोहर श्याम जोशी की कलम से निकली रिश्तों की महागाथा- ‘हमलोग’ भारतीय टेलीविज़न इतिहास का पहला और बेहद सफल धारावाहिक था.

अब निर्देशक संजय त्रिपाठी इतिहास को दोहराने की चाहत के साथ ला रहे हैं नया धारावाहिक 'हम'.

कहा जा रहा है कि धारावाहिक 'हम', 'हमलोग' का नया अवतार होगा.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में निर्देशक संजय त्रिपाठी ने बताया कि ‘हमलोग' की निर्माता शोभा डॉक्टर और दूरदर्शन की महानिदेशक के बीच सहमति बनी थी कि गांव पर आधारित एक धारावाहिक बनाया जाए जिसकी प्रेरणा और प्रभाव हमलोग जैसा हो. मुझे यह विचार अच्छा लगा.’

दिलचस्प बात ये है कि हम में न तो हमलोग की कहानी आगे बढ़ाई जा रही है, न वो बसेसर, बड़की, छुटकी और नन्हें हैं और न ही वो सरोकार.

निर्देशक संजय त्रिपाठी कहते हैं ‘हम का शरीर नहीं आत्मा हम लोग से प्रेरित है. आज के धारावाहिक हमलोग से बुनियादी तौर पर अलग हैं क्योंकि उनके किरदारों में वो गहराई नहीं है जो हमलोग में थी. लेकिन हमारी पूरी कोशिश है कि हम के किरदार और कथानक वास्तविकता के धरातल पर हमलोग के बहुत नज़दीक हों’.

'हम 'की कहानी पांच औरतों के इर्द गिर्द घूमती है और उनकी जीवन यात्रा और संघर्ष की कहानी है.

'हम-लोग' में कहानी के सिरों को आपस में पिरोने वाले सूत्रधार थे अभिनेता अशोक कुमार. ' हम' में वो भूमिका निभाएंगी 'हम-लोग' की दादी- अभिनेत्री सुषमा सेठ.

इस तरह पुराने और नए के बीच सुषमा एक कड़ी हैं और अपनी इस भूमिका से वो काफ़ी ख़ुश और उत्साहित हैं. सुषमा सेठ ने बीबीसी से कहा कि ‘हम की कहानी हमलोग से बिल्कुल अलग, ग्रामीण किरदारों के ज़रिए गांवों के जीवन और वहां पलने वाले सपनों की दास्तान है. ये किसी के लिए भी प्रेरणादायी होगा’.

भारतीय टेलीविज़न की बदली सूरत और सीरत को देखते हुए एक बड़ा सवाल ये है कि रिऐलिटी शो और सास-बहू की ज़ोर आज़माइश के बीच क्या हम अपनी जगह बना पाएगा?

Image caption 'हमलोग' से प्रेरणा क्या काम आएगी?

संजय त्रिपाठी कहते हैं कि माना कि ‘माना लोग आज फास्ट फूड के दीवाने हैं लेकिन घर में तो अब भी दाल चावल ही खाते हैं. अगर सुंगंधित चावल-दाल पर शुद्ध घी डाला जाए तो क्या कोई भारतीय इंकार कर सकता है’.

ऐसा लगता है बदली हुई सच्चाईयों को देखते हुए निर्देशक ने मूल स्रोत से उस रस को खोजने की सोची है जिसके असर पर आधुनिकता का हर पेंच और चकाचौंध बेअसर, बेदम है.

शायद यही इस रास्ते पर चलने की सबसे बड़ी चुनौती भी है.

चुनौती

'हमलोग' का एक बेहद लोकप्रिय किरदार नन्हे को जीवंत करने वाले अभिनव चतुर्वेदी नए हम का हिस्सा नहीं हैं लेकिन कहते हैं कि ‘मनोहर श्याम जोशी जैसे लेखक के जूते में पांव रखना और पी कुमार वासुदेव जैसे निर्देशक की टोपी पहनना एक चुनौती है लेकिन अगर खिड़की से कोई ताज़ा हवा का झोंका आए तो अच्छा है. मौका मिलना चाहिए’.

यादें धुंधली पड़ जाएं, चीजें बेरंग हो जाएं तो कोई नई बात नहीं लेकिन पुरानी रोशनी की चमक अगर नए रास्ते दिखाए तो पीछे मुड़कर देखना शायद अक्लमंदी की मिसाल बन जाए. देखना ये है कि यह कोशिश कितनी सफल होती है.

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