उर्दू में इसके लिए शब्द है 'लफ़ंगी'

इस्मत चुग़्ताई
Image caption उर्दू की बड़ी साहित्यकार हैं जिन्हे उनके अंदाज़ के लिए याद किया जाता है.

उर्दू की प्रगतिशील लेखिका इस्मत चुग़ताई को लीक से हटकर जीने वाले लोगों में शुमार किया जाता है और उनपर अश्लील लिखने का आरोप भी लगा.

कुछ लोग कहते हैं कि उनकी कहानियां 'टेढ़ी लकीर' और 'ज़िद्दी' उनका अपना ही चित्रण है. पिछले दिनों दिल्ली में उर्दू के प्रगतिशील लेखक सआदत हसन मंटो और इस्मत चुग़ताई को याद किया गया.

बहुत से लोग मंटो और इस्मत को एक सिक्के के दो पहलू की तरह देखते हैं. मंटो ने भी एक बार कहा था 'अगर मैं औरत होता तो इस्मत होता या इस्मत अगर मर्द होती तो वह मंटो होती.'

आप बीबीसी पर मंटो के बारे में गुलज़ार के विचारों को पढ़ चुके होंगे.

गुलज़ार ने याद किया मंटों ने

आज पेश है हिंदी और डोगरी की कहानीकार और कवियित्री पदमा सचदेव के हवाले से इस्मत चुग़ताई की कुछ झलकियां.

इस्मत चुग़ताई जिन्हें इस्मत आपा के नाम से भी जाना जाता है उनके साथ अपने रिश्ते को बयान करते हुए पदमा सचदेव ने ग़ालिब के शेर का एक टुकड़ा 'ज़िक्र उस परिवश' का उधार लिया और फिर अपना बयान शुरू किया.

पदमा सचदेव ने कहा कि इस्मत आपा का घर मुंबई में उनके अपने घर से 'ऑल इंडिया रेडियो' जाने के रास्ते में पड़ता था और इसलिए वे अकसर वहां उनसे मिलने जाती थीं.

पदमा की ज़बानी

Image caption पदमा सचदेव हिंदी और डोगरी की चर्चित साहित्यकार हैं.

जब मैं लंदन गई तो वहां बीबीसी वालों ने मुझसे कहा कि बंबई में तो बहुत शायर और अदीब लोग रहते हैं उनका इंटरव्यू करके हमें भेजा करें तो मैंने ये बात अपने पति से कही और उन्होंने घर पर ही एक कवि गोष्ठी का आयोजन कर लिया.

मेरा ज़िम्मा था इस्मत आपा को लाने का. मैं उन्हें अपने घर लेकर आई. रास्ते में बातें होती रहीं. हम घर पहुंचे तो दरवाज़ा मेरे पति ने खोला. मैंने इस्मत आपा से कहा कि ये मेरे पति हैं. इस्मत आपा ने ध्यान नहीं दिया और इधर उधर देखती रहीं. मुझे अजीब सा लगा. फिर वह बोलीं कि ये फ़्लैट किसका है. तो मैंने अपने पति की ओर इशारा करते हुए कहा कि जी ये इन्हीं का है.

तो वह कहने लगीं...., "अगर फ़्लैट के साथ है तो क्या बुरा है."

फिर खाने पीने का दौर शुरू हो गया और थोड़ी देर बाद जब उनकी नज़र मेरे पति पर पड़ी तो वह कहने लगीं, "अरे तुम यहां हो तो पकौड़े कौन तल रहा है."

इस्मत चुग़ताई अपनी ज़िंदा दिली और अपनी बाग़ी मानसिकता के लिए जानी जाती हैं. उन्हें उर्दू फ़िक्शन के चार स्तंभों में से एक माना जाता है. वह बचपन से ही बाग़ी थीं.

'कहानी के शीर्षक का अर्थ'

एक बार उनके यहां पूणे से कुछ लोग आए हुए थे इसी बीच मैं आ गई, इस्मत आपा उन्हें टालना चाहतीं थीं. मेरे बारे में उनसे कहने लगीं कि ये डोगरी की अच्छी शायरा है और मुझसे कहा कि कुछ सुनाओ, मैं उनके झांसे में नहीं आई और कह दिया कि मैं उन्हें उसी समय कुछ सुनाउंगी जब वह मेरी ताज़ा कहानी के शीर्षक का अर्थ बता दें.

उन्होंने कहा कि भई इसका मतलब तो बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा और न ही ये लफ़्ज़ हमने कभी सुना है. बहरहाल वे लोग जा चुके तो उन्होंने कहा कि इसका मतलब क्या होता है तब मैंने बताया कि इसका अर्थ होता है 'ऐसी लड़की जो अपने प्रेमी से छुप-छुप कर अंधेरे में मिलती हो.'

उन्होंने कहा ऐसा तो हमारे यहां नहीं होता, मैंने कहा और आप शाहिद भाई से जुहू में नहीं मिलती थीं? कहने लगीं हम तो खुलेआम मिलते थे.... फिर कहने लगीं अरे हां उर्दू में इसके लिए एक लफ़्ज़ है. है क्यों नहीं....ज़रूर है.... हमने पूछा क्या है तो कहने लगीं इसके लिए उर्दू में है शब्द----'लफ़ंगी'.

अपने बेबाक अंदाज़ और कहानियों में उनकी प्रस्तुति के लिए वह विवादित भी रहीं और बहुत से लोगों की आवाज़ भी बन गईं. 'लिहाफ़' उनकी काफ़ी चर्चित कहानी है.

'खुला अंदाज़'

Image caption मंटो और इस्मत ने गुलज़ार और पदमा सचदेव ने एक प्रोग्राम में याद किया.

इस्मत आपा एक इमारत से बाहर आईं तो एक व्यक्ति ने कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा, 'चलें'... तो इस्मत आपा ने कहा...'चलो'... फिर वह कार में बैठ गईं.

थोड़ी देर बैठी रहीं और गाड़ी मैरीन ड्राईव पर पहुंची तो उस आदमी ने कहा किसी होटल में चलें.... इस्मत आपा ने कहा 'अरे होटल क्यों, घर चलते हैं. बेकार होटलों में पैसे ख़र्च होंगे. उस व्यक्ति ने समझा बड़ी पहुंची हुई है.'

वह ख़ुशी ख़ुशी आया. घर पहुंचे तो पूरा घर भरा हुआ था... सरदार जाफ़री और अन्य शायर और साहित्यकार मौजूद थे... इस्मत आपा सबसे मिलीं और अपने काम वाले से उस व्यक्ति की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि साहब को कुछ ठंडा पिलाओ.... वह आदमी चुपके से खिसक लिया.

इस्मत की उनके खुले अंदाज़ के लिए जहां आलोचना हुई वहीं लोगों ने उन्हें छुप-छुप कर पढ़ा. उनकी बहुत-सी कहानियों को अश्लील कह कर नकार दिया गया और आज भी उनकी कुछ कृतियों पर पाकिस्तान और बांग्लादेश में प्रतिबंध लगा हुआ है.

'हराम की औलाद'

एक बार मैं उनसे मिलने गई तो उनके घर से कुछ महिलाएं बाहर आ रही थीं उन्होंने मुझे बड़ी अजीब नज़रों से घूर कर देखा. मैं अंदर गई और आपा से पूछा कि ये औरतें कौन थीं? आपा ने पूछा, 'क्यों क्या हुआ?'

मैंने कहा, मुझे बड़ी अजीब नज़रों से देख रही थीं. आपा बोलीं अरे वो मुझसे पूछ रही थी कि तुम कौन हो जो हमेशा मुझसे मिलने आती हो तो मैंने कह दिया कि मेरी हराम की औलाद है. शादी से पहले पैदा हो गई थी. मैंने अपनी एक सहेली को पालने के लिए दे दिया था. जबसे उसे पता चल गया है मुझसे मिलने चली आती है. देखो मुन्नी (इस्मत आपा की बेटी) से इसकी कितनी शक्ल मिलती है. बिल्कुल बड़ी बहन लगती है ना?

इस्मत चुग़ताई ने फ़िल्मों में भी काम किया जिनमें 'जुनून' यादगार हैं. फ़िल्म 'गर्म हवा' उनकी कहानी पर आधारित है. इसके अलावा उनके उपन्यास 'ज़िद्दी' पर फ़िल्म बनी है. उन्होंने कई स्क्रीनप्ले भी लिखे. इस्मत चुग़ताई का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूँ में हुआ था और निधन 24 अगस्त 1991 में मुंबई में हुआ. उनकी बरसी के मौक़े पर दिल्ली के 'इंडिया हैबिटैट सेंटर' में 27 और 28 अगस्त को इस्मत और मंटो के जीवन और साहित्य पर गोष्ठी आयोजित हुई और कुछ फ़िल्में भी दिखाई गईं.

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