रोमांटिक कवि साहिर की याद में

  • 13 सितंबर 2010
साहिर की याद में
Image caption साहिर एक सफल शायर और गीतकार थे

प्रेम में बार बार मिली असफलता ने साहिर के व्यक्तित्व पर कुछ ऐसे निशान छोड़े जिसके नीचे उनके जीवन के अन्य दुःख दब कर रह गए.

अपनी प्रेमिका की झुकी आखों के सामने बैठ साहिर उससे मासूम सवाल कर बैठते हैं – "प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं"

लंदन के नेहरू सेंटर में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यूके ने इस कवि को एक बार फिर याद किया.

साहिर लुधियानवी मूलतः एक रोमांटिक कवि थे. 'साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक क्रांतिकारी' शीर्षक के तहत इस गोष्ठी में चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन, फिल्म अध्येता नसरीन मुन्नी कबीर और फ़िल्मकार मुज़फ़्फ़र अली सहित काफी लोग मौजूद थे.

बीबीसी उर्दू सेवा के रज़ा अली आबिदी ने साहिर लुधियानवी (मूल नाम अब्दुल हई) के बचपन, जवानी, साहित्यिक शायरी और फ़िल्मी नग़मों की चर्चा की.

साहिर के मुंबई में बसने पर आबिदी ने कहा, "किसी शहर के रंग में रंग जाना बहुत सहज होता है मगर साहिर ने बंबई को अपने रंग में रंग दिया. "

उन्होंने साहिर के गीत “हम आप की ज़ुल्फ़ों में इस दिल को बसा दें तो?” में 'तो' शब्द की अलग से व्याख्या करते हुए कहा कि उर्दू शायरी में इस शब्द का ऐसा प्रयोग कभी इससे पहले या बाद में नहीं किया गया.

साहिर के शायरी की विशेषता है कि वे सत्ता से सवाल भी करते हैं, हालात पर टिप्पणी भी करते हैं, और दुनिया को जला कर बदलने की बात भी करते हैं.

साहिर ने फ़िल्मों में जो भी लिखा वो अन्य फ़िल्मी गीतकारों के लिये एक चुनौती बन कर खड़ा हो गया. उनका लिखा हर गीत जैसे मानक बन गया. कव्वाली- न तो कारवां की तलाश है (बरसात की रात), हास्य गीत- सर जो तेरा चकराए (प्यासा), देशप्रेम गीत- ये देश है वीर जवानों का (नया दौर), सूफ़ी गीत- लागा चुनरी में दाग़ छिपाऊं कैसे (दिल ही तो है), इसका सबूत हैं.

साहिर का प्रेम

साहिर के प्रेम प्रसंगों में सुधा मल्होत्रा और अमृता प्रीतम का नाम शामिल है.

एक बार अमृता और साहिर दोनों मॉस्को गये थे जहां साहिर को सोवियतलैण्ड पुरस्कार मिलना था. वहां एक अफ़सर की ग़लतफ़हमी से दोनों के नाम के बिल्ले बदल गए.

साहिर ने अमृता से बिल्ले वापिस बदलने के लिये कहा, लेकिन अमृता ने कहा कि वह बिल्ला वापिस नहीं करेगी, इस तरह साहिर अमृता के दिल के क़रीब रहेगा.

भारत वापिस आने पर साहिर की चन्द ही दिनों में मृत्यु हो गई. अमृता ये सोच कर रोती रही कि दरअसल मौत उसकी अपनी आई थी, मगर उसके नाम का बिल्ला साहिर के सीने पर था, इसलिए मौत ग़लती से साहिर को ले गई.

हर बड़े शायर की तरह ही साहिर की शायरी भी आम आदमी को नए नए मुहावरे दे गई.

साहिर, शैलेन्द्र और शकील अपने समय के फ़िल्मी गीतों की ऐसी त्रिमूर्ति थे जिन्होंने फ़िल्मी मुहावरे में उत्कृष्ठ साहित्य की रचना की. साहिर संगीतकार से एक रूपया अधिक पारिश्रमिक लेते थे और इस बात को लेकर वह बेहद जिद्दी थे.

साहिर ने ही ऑल इण्डिया रेडियो में गीतकार का नाम शामिल करने की परंपरा शुरू करवाई.

जुहू इलाक़े के जिस क़ब्रिस्तान में साहिर को दफ़न किया गया था वहीं मुहम्मद रफ़ी, मधुबाला, नौशाद, तलत महमूद, नसीम बानो, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, जान निसार अख़्तर और सरदार जाफ़री जैसी हस्तियां भी दफ़नाई गई थीं.

हाल ही में क़ब्रिस्तान को चलाने वाले बोर्ड ने बिना किसी को बताए इन क़ब्रों पर लगे कुतबे और छोटे छोटे मक़बरे तोड़ दिये और ज़मीन को समतल कर दिया. वहां मिट्टी डाल कर नई क़ब्रों के लिये जगह बनाई गई है.

उनका कहना है कि इस्लाम में मक़बरे बनाने की इजाज़त नहीं है. यह उस देश में हुआ जिस देश की पहचान एक मक़बरा है. पूरी दुनिया से लोग उस ताजमहल को देखने आते हैं.

शायद इसीलिए साहिर ने अपने जीवन में ताजमहल के बारे में कहा था, “इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर / हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक / मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ से."

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