लंदन में गुलज़ार के साथ एक शाम

Image caption गुलज़ार को सम्मान देते भारत के उच्चायुक्त नलिन सूरी

लंदन के नेहरू केंद्र में गीतकार, कवि, पटकथा लेखक और फ़िल्मकार गुलज़ार को साउथ एशिया सिनेमा फ़ाउंडेशन की तरफ़ से 'ऐक्सिलैंस इन सिनेमा' पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

फ़ाउंडेशन के गठन की दसवीं वार्षिकी के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में गुलज़ार की फ़िल्मों की झलकियों पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री प्रस्तुत की गई और उनसे खुलकर बात की फ़ाउंडेशन के निदेशक और फ़िल्म इतिहासकार ललित मोहन जोशी ने. गुलज़ार अपने उसी चिरपरिचित अंदाज़ में सफ़ेद कुर्ता-पाजामा और सफ़ेद शॉल ओढ़कर आए थे और अपने ऊपर बरसाए जा रहे विशेषणों को विनीत भाव से ग्रहण करते रहे.

जिस व्यक्ति को ऑस्कर मिल चुका हो उसके लिए 'ऐक्सिलैंस इन सिनेमा' पुरस्कार की क्या अहमियत है ये पूछे जाने पर उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, "भले ही आप सुप्रीम कोर्ट के जज हों लेकिन घर में बीवी कुछ नहीं समझती, घर में पूछ होना ज़रूरी है, शुक्र है कि घर वालों ने पूछा है."

इस कार्यक्रम में साउथ एशिया सिनेमा फ़ाउंडेशन के निदेशक और फ़िल्म इतिहासकार ललित मोहन जोशी की एक डॉक्यूमेंटरी भी दिखाई गई जिसमें गुलज़ार के गीतों और फ़िल्मों की झलकियाँ थीं.

दर्शकों से खचाखच भरे नेहरू केंद्र के हॉल में ललित मोहन जोशी ने गुलज़ार के साथ एक लम्बी बातचीत के दौरान जब ये पूछा कि किसी गीत की सफलता का क्या राज है तो उन्होंने कहा, "दौड़ने वाली चीज़ तो धुन है, वो किस तरह लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाती है यह तो नहीं मालूम, अल्फाज़ जो हैं वो एक काठी है, लग़ाम है जो अगर मज़बूत हो तो देर तक चलता है, टिका रहता है."

समय के साथ बदलाव

फ़िल्म आंधी के गीतों से लेकर ओमकारा का 'बीड़ी जलाई ले' तक का सफ़र बड़ा ही रोचक रहा है. कुछ लोगों का मानना है कि गुलज़ार ने आधुनिक फ़िल्मों की मांग के साथ समझौता कर लिया है.

लेकिन वो कहते हैं कि आज फ़िल्मों की विषय-वस्तु बदल गई है दृष्टि बदल गई है और समय के साथ चलना ज़रूरी है, "जो लड़की बात-बात में गाली देती है वो बीड़ी जलाई ले ही गा सकती है, जो बात-बात पर गोली चलाता है वह 'गोली मार भेजे में'ही गाएगा, कैरेक्टर को देखिए, वो 'दिलेनादाँ तुझे हुआ क्या है' नहीं गा सकता."

गुलज़ार का कहना है कि फ़िल्में अपने समय का प्रतिबिम्ब होती हैं. उन्होने अपनी फ़िल्मों में हमेशा ये दिखाने की कोशिश की है कि राजनीति आम आदमी के जीवन को किस तरह प्रभावित करती रही है.

वे कहते हैं, "मेरे अपने में जो नौजवान हैं उनका राजनीतिक इस्तेमाल होता है, उनके हाथों में डंडे हैं, साइकिल की चेन है जबकि माचिस में भी ऐसा ही होता लेकिन वक़्त बदल गया है इसलिए नौजवानों के हाथ में गन है, एके-47 है, रॉकेट लॉंचर है, लेकिन पूरा का पूरा थीम वही है."

गुलज़ार ने 1963 में विमल रॉय की फ़िल्म 'बंदिनी' के मशहूर गाने 'मेरा गोरा अंग लइ ले...' से हिंदी फ़िल्मों में प्रवेश किया था.

उन दिनों गुलज़ार एक मोटर गैरेज में काम किया करते थे लेकिन शायर की हैसियत से उस समय के कई शायरों से उनका परिचय था.

विमल रॉय को याद करते हुए उन्होंने कहा, "उन्होंने मुझसे कहा कि मैं एक फ़िल्म बना रहा हूँ काबुलीवाला, तुम उसमें मेरे असिस्टेंट बन जाओ लेकिन उस मोटर गैरेज में काम करने वापस मत जाना, वहाँ अपना वक़्त बर्बाद मत करो. उस दिन मेरी आँखों में आँसू आ गए."

ललित मोहन जोशी ने उनके निजी जीवन पर सवाल किया और राखी से उनके रिश्ते के बारे में पूछा तो उन्होने बेबाक होकर कहा, "मैंने उन्हें चाहा, उनसे प्यार किया, ये नहीं है कि आज नहीं करता हूँ, आज भी करता हूँ. हाँ, कुछ दुनिया की रवायतें और रस्में हैं जिनकी वजह से लोग समझते हैं कि हम अलग हो गए हैं, लेकिन हम आज भी साथ ही हैं."

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